सूरजपाल “सूर्यवंशी”

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जीवन परिचय: कवि सूरजपाल सूर्यवंशी स्वयं को बहुजन साहित्यकार कहते हैं और साहित्य के द्वारा दलितों के हित के लिए लिखते हैं | इस बहुजन साहित्यकार का जन्म ०५ जून १९९४ को उत्तर प्रदेश ,बरेली जनपद के नबावगंज तहसील के समूहा गांव में हुआ । प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से की ।स्नातक की पढ़ाई एशिया के सबसे बड़े कॉलेज बरेली कॉलेज से की ।इसी कॉलेज से एम0ए0 हिन्दी साहित्य से किया| अपने गुरुदेव डॉ0 श्यामपाल मौर्य”शशितोष “जी के सानिध्य में एक लधुशोध कार्य पूर्ण किया। जिसका शीर्षक था “सुर साहित्य में अप्रस्तुत विधान”। बरेली कॉलेज बरेली के महोत्सव में आप हिंदी साहित्य की ६ विधाओं में उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत किये गए । आपका रुझान प्रगतिशील है । आप शोषित वर्ग की उन सूक्ष्म संवेदनाओ को मुखरित करते हैं जो सामान्य पाठक ध्यान नहीं देते । आपके द्वारा रचित ५६ कविताएँ हैं जो अप्रकाशित हैं। आप हिन्दी के अनेक विधाओं में लिखते हैं ।

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“कविता”

एक नदिया है मजबूरी की
उस पार हो तुम इस पार हैं हम,
अब पार उतरना है मुश्किल
मुझे बेकल बेबस रहने दो।

कभी प्यार था अपना दीवाना सा
झिझक भी थी एक अदा भी थी,
सब गुजर गया एक मौसम सा
अब याद का पतझड़ रहने दो।

तुम भूल गए क्या गिला करें
तुम, तुम जैसे थे हम जैसे नहीं,
कुछ अश्क़ बहेंगे याद में बस
अब दर्द का सावन रहने दो।———————- ११ अगस्त २०१९ |

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“गजल”

अपने होंठों पे मेरा नाम सजाने बाले ।
दिल में मेरे अपना प्यार जगाने बाले ।।
टूट सा गया हूँ तेरे जाने के बाद,
लौट के आ जा मुझे छोड़कर जाने बाले ।।

वेबफा हूँ मैं यह मुझको ओ कहने बाले।
प्यार से मेरे अपना घर ओ सजाने बाले ।।
सांसे थम सी गयी हैं तेरे जाने के बाद,
अब लौट आ जा ओ मुझे रुलाने बाले ।।

मेरी धड़कन में अपने सुर बजाने बाले ।
मेरे दिल से अपने दिल को मिलाने बाले ।
क्या था बस इतना ही “प्यार” तेरा,
अब तो आ जा ओ मेरी नीदें चुराने बाले ।।————०२ अगस्त २०१९ |

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