साकेत ठाकुर

सीतामढी,बिहार |

-तब तुम लौट आना-

जा रहे हो जाओ तुम्हारा है मन अगर तो,
पर लगे की तुम्हें होने लगा मुझसे प्यार,
तब तुम लौट आना।

है अभी यह वक्त शापित मेरे लिए
और तेरे लिए है खुशनुमा सा,
जीवन में मेरे पसरा हुआ है घोर अमावश
और तेरी जिन्दगी में पूर्णिमा सा,
जब लगे की मेरी सारी गलतियाँ है स्वीकार,
तब तुम लौट आना।

किरण कितना भी दूर हो जाये परंतु
सूर्य से कहाँ कभी वह रूठ पाता,
जानता हूँ ऐसी बातें तुम्हें ना भायेगी किन्तु
सोंचा की जाते जाते तुम्हें यह जाऊँ बताता,
जब तन्हाँ जीवन लगे तुम्हे बेवश और बेकार,
तब तुम लौट आना।

है बहुत ही मुश्कील तुमसे दूर रहना
पर तुम्हारी खुशी के लिये यह भी सहा करुँगा,
तुम रहो बेफिक्र सदा मेरी तरफ से
जुबाँ से ना दूँगा उपराग नैन से भी ना कुछ कहू़ँगा,
जब लगे कि मुझपर तेरा भी है कुछ अधिकार,
तब तुम लौट आना।

-शायद तुम हो-

वर्षों वर्षों की मौन प्रतीक्षा में मन
मेरा जिसके खड़ा था, शायद तुम हो।

ये अमावश की फैली चादर जो हटाई
मुझ पर से कोई, शायद तुम हो।

इस जीवन के अनजाने पथ पर मुझे
सम्भल कर चलना सिखाई,शायद तुम हो।

मैं अपना सुध खोया खड़ा था अभिशप्त
इससे मुक्ति दिलाई,शायद तुम हो।

नासमझ मैं तो कुछ भी जान पाया नहीं
हौले से प्रीत लुटाई,शायद तुम हो।

मेरे दुखमय हलाहल को पी करके जो
मुझको अमृत पिलाई, शायद तुम हो।

मीठे स्वर में कोई मुझे रही है पुकार
जाकर देखें जरा की, शायद तुम हो।

इस पावन अवसर पर भी मैं जो दे ना सका
वो सब करली स्वीकार, शायद तुम हो।।

-एक मेरा बावला स्वप्न-

यह मेरा एक स्वप्न बडा ही बावला सा है,
किशोर है,नादान है,पर बडा ही भोला है।
जग के फेंके विष बाण इसनें दृढ़ता से है सहा,
मैनें बहुत समझाया इसे क्या क्या नहीं कहा-
बिना सहारे किसी के इतनी ऊँचाई पर कोई चढ़ता है क्या?
बिना सोंचे और समझे इस तरह कोई राह में बढ़ता है क्या?
छोड़ दो यह जीद्द वर्ना टूट जाओगे।
तुम पानी में उठे एक बुलबुला हो फुट जाओगे।
पर भय कहाँ इसको सताता हार जाने का,
तनिक भी ना घबराता ये गिर जाने से।
बढा दिया है कदम अब चाहे लाख बाधा हो,
रोज आगे,तेज आगे बढ़ रहा है ये।
इसको नहीं परवाह अब मेरी या जमाने की,
लापरवाह होकर चुप्पी इसकी कह रही मुझसे,
तुम इंसान हो तो ऊँचे चढ़ने से डरो,
हार के भय से झुकाकर शीश तुम धरो।
संवेदना औ भाव की सोंच में जलो,
किसी की हँसी और रूदन की परवाह कर गलो।
यदि सच में इंसान हो तो अब भी तुम सम्भलो,
जीवन रण में जीत लो या मृत्यु को वरण करो ।

-कविता-

जो कभी लफ्जों में ना भाव बयाँ कर पाया,
उसको मैने एक लय दिया है कविता में।
जो हो सका ना आजतक हासिल मुझको,
उस दूरी को मैने तय किया है कविता में।
जिस बाग में हुकूमत रहा काँटों का सदा,
उसी बाग से गंध लिया है कविता में।
उमर बंधी है पूरी कई दृश्य- अदृश्य बंधन से,
पर मैने हर पल को स्वच्छंद जिया है कविता में।
जहर जीवन में घुला है तो तय है मर जाना,
पर शब्दों के संग मैने अमृत पिया है कविता में ।

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