रचनाकार हनुमन्त सिंह

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जीवन परिचय: हनुमन्त सिंह जी का जन्म २ फरवरी १९६७ को उत्तर प्रदेश के जनपद मैंनपुरी के टिन्डौली ग्राम में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही इनका रुझान सेनाओं की तरफ था। सौभाग्य से १९८५ में भारतीय नौसेना में आपका चयन हो गया। वर्तमान में आप मास्टर चीफ पेटी आफीसर के पद पर कार्यरत रहकर देश की सेवा में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। आपकी रचनाएँ नौसेना की पत्रिकाओं में समय – समय पर प्रकाशित होती रहती है। आपकी कविताएँ आकाशवाणी विशाखापट्टनम से भी प्रसारित हो चुकी हैं।

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“दोहे”

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पर्यावरण

1

पर्यावरण रक्षा करो, धरा न दूषित होय।
वायु जल प्रदूषित हुए, जग बीमारी रोय।।
2
जल हवा जीवन जानो, इनके बिन कुछ नाहिं।
यह दोनों दूषित भये, सांसे आयिं न जाहिं।।
3
उद्देश्य यहाँ जीव का, सब भेजे भगवान।
तेरा मेरा कुछ नहीं, सब दाता का मान।।
4
वृक्षन को नहीं काटिए, जानो धरा लिबास।
नग्न धरा ही पाप जन, लज्जा रही न पास।।
5
धरती के सब आवरण, वृक्ष वायू जल जान।
यह सब नाहीं सृष्टि में, कित रहिंहैं नादान।।
6
पहाड़ धरोहर प्राकृति, धरा सन्तुलन होय।
पहाड़ धरती ना रहे, जीव बचे नहिं कोय।।
7
बहती नदियां धरा पर, करें सदा उपकार।
धोये तूने पाप सब, भयी विषैली धार।।
8
मानुस निजहि स्वार्थ में, किया बड़ा नुकसान।
धरती को घायल किया, रुदन करे असमान।।
9
वृक्षारोपण कीजिए, धरती का श्रृंगार।
हरियाली धरती जहां, बरसा बारम्बार।।
10
वृक्षों ने कछु नहीं लिया, अपना सबहि लुटाय।
जन जानो पापी अधम, पेड़न हरा कटाय।।
11
हरी भरी धरती जहाँ, उसे स्वर्ग ही जान। धूरि उड़ति टीलन जहाँ, समझो नरक समान।।
12
बरसा जल संचित करो, भरे पुखरिया ताल।
पानी है सब चैन में, बिन पानी बेहाल।।
13
सब पेड़ों की खासियत, अलग अलग गुणवान।
तरह तरह के फल लदे, पककर शहद समान।।
14
गाय भैंस जन पालिए, उपयोगी है खाद।
बढ़ती फसलें उपज में, खाना बड़ा सवाद।।
15
जल बहाना ठीक नहीं, बूंद बड़ी अनमोल।
बिन पानी सूखत गला, मुख बोले नहिं बोल।।
16
जल ही जीवन सब कहे, जानो जल को खास।
भोजन छप्पन प्रकार के, जल की एक पियास।।
17
जीव जन्तु जन जगत में, अपना अपना ठौर।
हमने किसको क्या दिया, दाता सब पर गौर।।
18
प्लास्टिक जन अच्छी नहिं, मत करिए उपयोग।
जबसे इसका चलन है, तरह तरह के रोग।
19
तन कपड़े पानी धुले, गूंथा पानी चून।
आंखों में पानी भरा, मिलता पानी खून।।
20
पेड़ लगाना पुण्य जन, फल खाये सन्तान।
आशीष मिलें अनगिनत, धरती का कल्याण।।
21
पहाड़ को मत काटिए, नहिं घातक विस्फोट।
धरती मात रुदन करे, लगे पहाड़न चोट।।
22
वन उपवन मत काटिए, धरती करे न माफ।
गुस्से में कम्पन हुई, करे सूपड़ा साफ।।

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योग

योगा अचूक औषधी, मिटते सबही रोग।
जो नित योग करत हैं, वही सुखी हैं लोग।।

योग प्राणायम नित कर, काया राखि निरोग।
शैली जीवन सरल जन, योग बने उपयोग।।

कपालभाति सब ही करो, बाहर वायू फूँक।
गांठें खुले कपाल की, खूब लगेगी भूख।।

कर तू अनुलोम विलोम, भरकर सांसे छोड़।
सबल सकल मनकी गती, भ्रम के बन्धन तोड़।।

भोर होत जल्दी उठो, खुली हवा में सैर।
तन मन में हो ताजगी, सदा रहेगी खैर।।

योग अलख जगाओ सब, राह मुक्ति आसान।
सब में सम भाव एकहि, मानव की पहचान।।

कष्ट व्याधि सब ही मिटै, करो योग व्यायाम।
दुर्गुण मन मैला हटे, नव नूतन आयाम।।

रोग विनाशक योग है, नित्य करो उठि भोर।
दुर्बलता तन की मिटै, लगै राम घट डोर।।

कुटुम्ब जन सब बैठिए, आपस योग सनेह।
मंडुक आसन शुलभ है, दूर भगे मधुमेह।।

बीमारी जड़ से कटति, नित योगा अभ्यास।
पहले कीजै व्यायाम, फिर योगा में वास।।

भरो निकालो सांस को, कर जन बारम्बार।
कष्ट मिटै बाधा हरै, सुखी होय संसार।।

सांस खींच रोको क्षणिक, धीरे देउ निकार।
बार – बार अभ्यास से, मिटता दमा विकार।।

वज्र आसन नित बैठिए, जन भोजन पश्चात।
खाना पीना हजम सब, दूरि कब्ज आघात।।

तन तेरा काया नगर, जामें हरि को वास।
और नगर में ना मिलें, खोजो अपने पास।।

गुंजन भौंरा भ्रामरी, खोलो दसवां द्वार।
नजर तेज आंखिन हुई, मिटते रोग हजार।।

पैसा कौड़ी खर्च नहीं, बैठि भुरारे शाम।
सारा दिन आनन्द में, भजौ हरी का नाम।।

आतम परमातम मिलन, योग इसी का नाम।
जन्म मरण छूटत सभी, सदा साथ हैं राम।।

आसन में आसन बड़ा, जन सूर नमस्कार।
उत्तम बिधि आसन भला, जीवन का आधार।।

लाभ योग के अनगिनत, सब रोगों का नाश।
पावन काया नगर में, करो रामहिं विश्वास।।

योग जुड़े योगी बने, बदला मन का भाव।
मांसाहारी छोड़ि के, शाकाहारी चाव।।

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दुर्घटना

जल्दबाजी ठीक नहीं सदा गलतियां होंय।
खुद पर दुर्घटना घटे. परिजन सारे रोंय।।

हरदम काबू राखिए, वाहन की रफ्तार।
मात पिता चिन्ता करें, बेटों का इंतजार।।

बेल्ट कसकर बैठिए, रहिए सदा सतर्क।
भूले बिसरे मत कहो, क्या पड़ेगा फर्क। ।

नशा किए वाहन चले, वह अपराधी मान।
उसका मरना तय हुआ, खतरा औरन जान।।

वाहन चालक नशे में, भेजो उसको जेल।
लाइसेंस निरस्त करो, एक साल नहिं बेल।।

फोन लगाए कान में, चलती बाइक बात।
इतना तो तू जान ले, मौत लगाए घात।।

वाहन कबहुँ न दीजिए, काहु अनाड़ी हाथ।
कब काहू में ठोंक दे, या फिर छोड़े साथ।।

विलम्ब कबहुँ न कीजिए, हो वाहन की जाँच।
वाहन से धोखा नहीं, खतरे की नहिं आँच।।

कानून सदा मानिए, अनुशासन की रीत।
अनुशासित जन जानिए, शासन होए प्रीत।।

नम्बर का चक्कर बुरा, लालच बुरी बलाय।
तेज गती अच्छी नहीं, औरन जान गंवाय।।

चालक इतना जानिए, मुठ्ठी सबकी जान।
लापरवाही एक की, खो सकते सब प्राण।।

दारू की लत है बुरी, सब कछु नशा नशाय।
खुद ही खुद को लूटता, जग में होत हंसाय।।

वाहन चालक सफर में, कबहुँ न दिखला जो़श।
मौत नहीं, फिर भी मरे, परिजन बिगड़ें होश।।

दुर्घटना देरी भली, सत्य इसे तू मान।
तेज गती अच्छी नहीं, बिना वजह की शान।।

नियमों का पालन नहीं, झूठा करे गुमान।
पल भर की नासमझ में, अपना ही नुकसान।।

दोस्त सब जमकर पिए, नशा चढ़ा परवान।
हालत गंभीर एक की, दो पहुँचे श्मशान।।

भाँग नशा होली चढ़ा, बैठे अपनी कार।
घटना कछु ऐसी घटी, चलेउ छोड़ि संसार।।

यात्री यातायात में, मत तोड़ो कानून।
लापरवाही जरा सी, बहे सड़क पर खून।।

सड़कों पर अच्छा नहीं, वाहन संग रोमांस।
जीवन बड़ा अमोल है, मिले एकहि चान्स।।

बाइक पर जब बैठिये, सिर हैलमिट होए।
जीवनदान रक्षा समझ, कवच सुरक्षित तोए।।

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भ्रष्टाचार

भ्रस्ट आचरण जन हुआ, नहिं अच्छा आचार।
मानव से मानव दुखित, कहलाय भ्रस्टाचार।।

भ्रस्टाचार फैला हुआ, ज्यों वटवृक्षन छांव।
नगर शहर छोड़ा नहीं, बचा न एकहु गांव।।

भ्रस्टाचार में लिप्त हैं, अस्सी फीसद लोग।
मर्ज बड़ी असाध्य जन, लाइलाज है रोग।।

भ्रस्टाचार फूला फला, अपना भारत देश।
मानव मन का भेड़िया, धरे आदमी भेष।।

भ्रस्टाचार की सोच में, करता गंदे काम।
पाप घड़ा भरता जभी, होता चैन हराम।।

भ्रस्टाचार में जो बड़े, किया देश बदनाम।
ऐसे दुष्टन पकड़ि कर, जेल मजूरी काम।।

पढ़ा लिखा या अनपढ़ा, लगा भ्रस्टता दंश।
जाति पांति नहिं देखता, नहिं काहू को अंश।।

भ्रस्ट घुटाला कीजिए, कौन देखता तोय।
देखन वाला संग है, बिरला जाने कोय।।

भ्रस्टाचार के जाल में, फंसते सारे लोग।
एक बार जो फसि गया, मुश्किल बड़ा वियोग।।

नित घोटाला होत है, अपने प्यारे देश।
कोई दोषी जेल में, काहू चलता केस।।

अच्छी सब से भूख में, रोटी कौरा भूख।
जाय भूख पैसा लगी, मुख नहिं जाता टूक।।

मन जाके भयी अशांति, समझो पैसा भूख।
देखन में चंगा भला, गयी आत्मा सूख।।

भ्रस्ट आदमी नीयत में, रहे सदा ही खोट।
चंद टकन की ओट में, कब किसको दे चोट।।

करि मिलावट खानपान, भरेउ व्यंजन जहर।
स्वार्थ लालच लाभ में, ढायें अपने कहर।।

चौथ दलाली खेल में, काले सबके हाथ।
मन आत्मा मारी गयी, गिनता पैसा रात।।

मन कालिख से पुत चुके, काले इनके काम।
आपन दागी बनि गये, पेशा है वदनाम।।

चपरासी खूबहि चलति, बबुआ हिस्सेदार।
सांठगांठ है सभी की, दफ्तर भ्रस्टाचार।।

बाहुबली भू माफिया, बड़ेहि चर्चित नाम।
जो चाहें इनकी चले, भर भर पेटी दाम।।

पैसा पदवी प्रेयसी, सबको इनकी भूख।
करता जो भी सामना, देते जिन्दा फूंख।।

घपले बाजी धांधली, सुनते रहते कान।
जिस दिन होगा खात्मा, भारत ऊंचा स्थान।।

सही गलत के भेद को, मन में सोच विचार।
समझ गयी जन आत्मा, सुधर गया आचार।।

पढ़ा लिखा पदवी मिली, सौंप दिए अधिकार।
पद गरिमा धूमिल भयी, जुड़ गये भ्रस्टाचार।।

करना था वह ना किया, करे धांधली काम।
जेल सलाखों कैद है, नाम हुआ वदनाम।।

मानव पैसे के लोभ में, तू हुआ चरित्र हीन।
मन भ्रस्ट सन्तोष नहीं, औरों का हक छीन।।

दिल दुखाकर होय खुश, नाजायज सब काम।
लिया दिया सब रह गया, काम न आया दाम।।

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शिक्षा

विद्या मन में ग्रहण करो, पढ़ो खूब चितलाय।
समय बड़ा ही कीमती, छूट हाथ नहिं जाय।।

धर्म कर्म पढ़ना तेरा, मकसद अपना जान।
मन में तेरे सब भरा, उसको तू पहचान।।

मात पिता आशा लगी, उसको कभी न तोड़।
पढ़ना पहला कर्म है, इधर उधर की छोड़।।

खुद खाया पहना नहीं, तोय मुहैया चीज।
फिर भी बेटा पढ़े नहीं, मात पिता को खीझ।।

संगति असर सबहि पड़े, बड़ी सत्य है बात।
पानी लोहा साथ में, काई लोहा खात।।

माता पिता पढ़े नहीं समझत शिक्षा मोल।
बार बार समझात है, नहिं समझे सुत बोल।।

पिता पूत समझात है, समझ न आयी बात।
बात समझ में आ गयी, पूत बना जब तात।।

इच्छा हर माँ बाप की, बेटा आगे जाय।
पढ़ना लिखना ठीक हो, अपना खाय कमाय।।

पिता बतायी राह को, नहिं समझे औलाद।
समय वापसी फिर नहीं, जीवन में अवसाद।।

बच्चे भविष्य देश का, कल के जिम्मेदार।
बहुत जरूरी बाप माँ, अच्छे हों संस्कार।।

प्रथम गुरू माता पिता, सही राह संतान।
इक बार जो भटक गया, जीवन का नुकसान।।

बेटा बेटी समझिए, ज्यों वीणा का तार।
ढीला छोड़े स्वर नहीं, कसते ही बेकार।।

मेहनत मजूरी बाप की, बेटा मौज उड़ाय।
स्कूल बहाना पढ़न का, देखि सिनेमा आय।।

बच्चे अपने देश के, कल का हैं निर्माण।
कोशिश अपनी यही हो, जागे आतमज्ञान।।

अच्छी हो जन परवरिस, सही दिशा का ज्ञान।
अपने बच्चे आज के, कल का हिंदुस्तान।।

बालक दृढ़ संकल्प ही, छुए सफलता छोर।
असफलता हाथों लगी, निष्ठा है कमजोर।।

विद्यार्थी मन में सदा, भले बुरे का ज्ञान।
लालच चंद स्वार्थ में, नहीं डिगे ईमान।।

परिस्थितियां कठिन भली, कभी न मानो हार।
खुद का तेरा हौसला, दरिया मांझी पार।।

विद्यालय मंदिर तेरा, गुरुजन देव समान।
शिष्य पुजारी ज्ञान का, जग में सकल महान।।

विद्या सबसे बड़ा धन, चोरी करे न चोर।
बांटन से यह बढ़त है, फैले चारों ओर।।

रुपया पैसा सब बटा, विद्या बटे न बांट।
सीखन में तेरा भला, भले पड़े जो डांट।।

शिक्षा उन्नति देश निज, प्रेम परस्पर होय।
जहाँ अभाव शिक्षा हुआ, सबकछु अपना खोय।।

शिक्षा सभ्य समाज की, कड़ी बहुत मजबूत।
देश हित अनिवार्य है, पढ़े मात हर पूत।।

शिक्षा पध्दति समानता, मूल भूत है आधार।
भेद भाव की रीति से, सिमट गया आकार।।

मंता विद्या मोल विकी, खूब चले व्यापार।
मोटी रकम ऐंठ रहे, अभिवावक लाचार।।

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मित्रता

मीत प्रीति की महक है, खुशियों का प्रतीक।
भले बुरे में साथ है, सत्य राह की सीख। ।

अच्छा मित्र तोकूं मिले, धन वैभव ही जान।
साथ खड़ा विपदा घड़ी, हरदम राखे ध्यान।

हितू हितैषी सगे जन, कछु मतलब के यार।
इनका मतलब हल हुआ, देखत नाहिं निहार।

मित्र की मित्रताई भली, करें न नीची बात।
अपना सब कछु छोड़कर, रहें मीत के साथ।

मीतन के मीत सब ही, झूठा इनका प्यार।
आफत आयी मीत पर, चुपके खिसके यार।

मीत भरोसा अटल जन, उचित बताए राय।
गलती पर टोके भला, हित के करे उपाय।

मित्र मतलबी ठीक नहीं, सदा राखिए दूर।
तू तेरा सब भाड़ में , अपना लाभ जरूर।

दिल से दिल का मेल ही, सखा सुदामा सार।
हरी नीर नैनन बहे, तलवन देखि दरार।

रामायण सब जन पढ़ी, मित्रता पतित प्रसंग।
सुग्रीव मित्रता राम की, सदा रहे वह संग।

मौला मित्रता जग भली, बसे प्रेम का राग।
धुला मैल मन मीत का, रहा न एकउ दाग।

मित्रता सज्जन ते भली, दुरजन मित्र न होय।
मित्र भला नहीं काम का, तेरी खुशियन रोय।

मीत परखना जटिल जन, बड़ा हि दुर्लभ काम।
मीत फरेबी मिल गया, तेरा काम तमाम।

निज स्वार्थ मनहि बसा, बड़ी कुटिल है चाल।
ऐसे लोगन दूरि भले, तोहि करें कंगाल।

मीत बुराई ना करे, कबहुं न पीछे पीठ।
जो कहना वह सामने, पीछे बकता ढीठ।

निस्वार्थ प्रेम ही होय, मीतन की पहचान।
जहां स्वार्थ हि भावना, मीत न सच्चे मान।

मन से मन का मीत जन, खुशी खजाना जान।
तेरे दिल का हौसला, मुश्किल सब आसान।

कुटुम्ब सगे अपने नहिं, साथ न छोड़े मीत।
दुख तेरा अपना लगे, यही फर्ज की रीत।

बड़ी पुरानी दुश्मनी, आज भये वे यार।
दगा मित्र का मित्र से, गर्दन रखी कटार।

जग सारा दुश्मन हुआ, हम मित्रों का प्यार।
आखिर विजय प्यार की, जग ने मानी हार।

मित्रन मिलन साझे करो, तुम मन अपनी बात।
बोझिल मन हल्का हुआ, चैन कटति है रात।।

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पैसा

पैसा हि माता लक्ष्मी, पूजन बारम्बार।
महारानी कृपा करें, चरणन शीश हमार।।

पैसा जाके पास है, ऐंठ रहा वह मूँछ।
पैसा बिन घूमत फिरो, कहाँ तुमारी पूँछ।।

छोरा ब्याहन को फिरें, सब पैसा की बात।
साठ साल की उमर में, बूढ़े की बारात।।

धनीराम पैसे बिना, धनियां जन कहलाय।
पैसा बदले नाम सब, पैसा सबको बहलाय।।

पैसा बड़ी ठसक लगे, पैसा सीख सहूर।
पैसा बदले आदमी, पैसा बदला नूर।।

पैसा की ही वजह सब, उल्टे सीधे काम।
गुण औगुण पैसा हुआ, पैसा नमक हराम।।

पैसा बहुत बड़ी बला, जात सभी मन रीझ।
बड़े सूरमा डिग चुके, उगा वासना बीज।।

पैसा भले बुरे किये, मंता अपने दूर।
प्रेम मिटा पैसा वजह, पैसा से सब मजबूर।।

पैसा नाम गुमान है, पैसा ही चित चोर।
पैसा ने मारी अक्ल, पैसा मन की खोर।।

पैसे में मानव बिका, बिकती पैसा लाज।
मंता पैसा सब बिका, पैसा छिपता राज।।

पैसे का चढ़ता नशा, लोग नशे में चूर।
अपनों से अपने छुटे, पैसा बड़ा गुरुर।।

पैसा सब अंधे किये, पैसा बिगड़ी रीत।
पैसा परछाईं बुरी, पैसा झूठी प्रीत।।

पैसा घर खुशहाल है, पैसा मिला मलाल।
मंता पैसा क्रूरता, अपने किये हलाल।।

पैसा सब का पेट भरे, पैसा पेट कटाय।
पैसा ही नजदीकियां, पैसा दूर हटाय।।

पैसा ही जन दुशमनी, पैसा धोखे बाज।
पैसा नियत बुरी जन, पैसे में है राज।।

शौक मौज पैसा कहो, पैसा ही है गुमराह।
पैसा सबका प्यार है, पैसा सबकी चाह।।

भेंट नेग पैसा समझ, शादी को व्योहार।
जो पैसा ज्यादा लिखे, खूब होय सत्कार।।

पैसे की महिमा बड़ी, पैसा जय जयकार।
जिन्दा पै जेबें भरीं, मरतहि लिये निकार।।

पैसा लम्बे हाथ हैं, पैसा चैन सुकून।
पैसा जन चाकू छुरी, पैसा करता खून।।

पैसा ही मन की खुशी, पैसा दुख का शूल।
पैसा हाथन मैल है, पैसा सबकी भूल।।

पैसा दहेज लाडली, दे नहिं पाया बाप।
बिटियां जिन्दा जल गयीं, हुए हजारों पाप।।

पैसा रिश्ता टूटता, आपस में तकरार।
पैसा पैसे की जगह, रिश्तन पड़ी दरार।।

पैसा परदेशी भये, गये समंदर पार।
पैसा घर की आस है, पैसा सिर पर भार।।

अति पैसा पागल करे, बिन पैसा पगलाय।
सिक्का पहलू दो समझ, बात अकल में आय।।

पैसा पीछे भागना, ठीक नहीं है बात।
दिन में चैन हराम है, नींद न आती रात।।

चीज बेच पैसा मिला, पैसा मिलती चीज।
दोनों में इक ना मिले, मानव मन में खीझ।।

रीझ खीझ पैसा बिना, पैसा बड़ा विकार।
बजह असल अपराध की, जग में अत्याचार।।

पैसा उड़ता हवा में, जिनके घर भरमार।
मंता घर पाई नहीं, कौड़ी को लाचार।।

पैसा परिश्रम से मिले, घर में बरकत होय।
सुख में जन की आत्मा, नींद चैन की सोय।।

पैसा हराम फले नहीं, बिगड़े जन औलाद।
कमा कमा कर मर गया, बच्चों में बर्बाद।।

पैसा पानी सा बहे, मंता बची न जान।
पैसा आया काम नहिं, चला गया इंसान।।

दाता इतना दीजिये, जामे रोटी दाल।
दिया लिया सब आपका, जग है मायाजाल।।

पैसा जड़ें फसाद की, पैसा लगता दाढ़।
पैसा आया बीच में, बेटा बाप बिगाड़।।

पैसा सब पहचानते, शिशु रो रो कर लोट।
मंता बच्चा चुप हुआ, रखा हाथ पर नोट।।

पैसे में ताकत बड़ी, रिश्वत दूजा नाम।
उल्टे को सीधा करे, मुंह पर मारो दाम।।

पैसा काला धन कहो, जान चुकी आवाम।
मंता धन परदेश में, सूची में सब नाम।।

पैसा जन आया गया, सदा न काहू संग।
जन अभिमान न कीजिए, पैसा से सब तंग।।

पैसा पैसा रट लगी, पैसा नाहीं हाथ।
पैसा राम भुलात है, सबका छोड़े साध।।

पैसा खूब कमाइये, खुद पै करो यकीन।
पाप बड़ा संसार का, काहु का हक छीन।।

पैसा बिस्तर मखमली, कीमत पलंग हजार।
मंता पैसा नींद नहिं, करबट रात गुजार।।

पैसा जन घूमत फिरै, पैसा चलता पांव।
आज मिला था शहर में, कल पहुँचेगा गांव।।

                    (मात-पिता)

मात पिता भगवान में, तनिक भेद मत जान।
मात पिता साकार हैं, निराकार भगवान।।

मात पिता के चरण में, नित्य झुकइयो शीश।
मन बुद्धि शुद्धि होत है, ढेर मिलें आशीष।।

मात पिता औलाद को, पालें बड़ेहि नाज।
बेटा बेटी कदर नहिं, गिरी बुढ़ापे गाज।।

मात पिता संतान हित, घूमत बनें मजूर।
कोठी माँ कपड़े धुलति, पिता कमाते दूर।।

पाला पोसा मात पित, सब कुछ देत लुटाय।
दर दर की हैं ठोकरें, सुत सब लेत छुटाय।।

पिता बिठाये पीठ सुत, घोड़ा चलते चाल।
बापू बोली तोतली, खूब हंसत है लाल।।

बैठ पिता के कंधों पर, लला चले बाजार।
जूता पैरों पूत के, खुद नंगे लाचार।।

वदन पिता कपड़े फटे, बच्चन कपड़ा थान।
मात पिता हर्षित भये, खुशी देखि संतान।।

मात पिता अनपढ़ भले, बेटा भेजत स्कूल।
जो गलती हमसे भयी, बच्चा करैं न भूल।।

पाई पाई जोड़ि कर, पक्का बना मकान।
वाहू छीन अलग किए, बेटा बहु शैतान।।

बुजुर्ग आंखिन अश्रु भरे, दूरि भयी संतान।
पालन पोसि बड़े किए, भूलि गये नादान।।

मल मूत्र बिस्तर हि करे, माँ धोती हर बार।
माता का जग ऋणी सब, नहिं कोई उद्धार।।

मात पिता सेवा करो, इन से बड़ा न और।
इनका सिर पर हाथ हो, मिले स्वर्ग में ठौर।।

मात पिता दिल ना दुखे, जायि न खाली श्राप।
धर्म कर्म बेकार सब, सिर पै गठरी पाप।।

पूतन ताप बुखार में, कोरी आंखिन भोर।
माँ सुत लेकर गोद में, चली वैद्य की ओर।।

खेत टपरिया बेचिकें, विदेश पठये लाल।
मरे बाप कंधा नहीं, तनिक न होत मलाल।।

मल मूत्र माँ बटोरती, रखी कोख नौ मास।
पूत अभागे बात नहिं, पिता टूटती आस।।

हाथन मुंह कजरा करै, मैल छुटाती पांव।
बेटा माँ के शहर बसत, दुखड़ा रोती गांव।।

माँ काम काज घर करै, खेत बटाती हाथ।
फिरहुं माँ से बहू लड़े, गाली देकर बात।।

माता पिता भाव विह्वल, कान सुनत सुत टेर।
लाड प्यार में क्या कमी, जो मुख लेता फेर।।

तूने जो कुछ भी किया, मात पिता के संग।
वापस मिलना तय हुआ, शिथिल पड़ेंगे अंग।।

मात पिता तीर्थ समझ, चरणन माथा टेक।
मन विकार सारे मिटैं, सबकी नजरन नेक।।

जीवित जाके मात पिता, वही धनी धनवान।
सेवा भाव जगा मन में, तेरा जग कल्याण।।

मात पिता से बड़ा नहिं, ऊंँचा जग में स्थान।
दोनों हैं भगवान सम, लगा चरण में ध्यान।।

भार उठाती कोख माँ, थैला लेकर स्कूल।
बूढ़ी माँ का ध्यान नहीं, गया लाल अब भूल।।

                       ( कवि)

मंता रवि पहुंचे नहीं, कवि पल भर में जाय।
तेरी मेरी बात क्या, कवि से यम घबराय।।

कवि की कोरी कल्पना, मन के झूठे पंख।
उड़त फिरत जे हवा में, फूंके शब्दन शंख।।

कर कविता तारीफ कवि, फूला नहीं समाय।
जो तुम कछु बोले नहीं, मन में दांत चबाय।।

कवि पागल सुधरा हुआ, सही बात तू मान।
बाहर जख्म दिखें नहीं, भीतर घायल जान।।

मंता कवि उल्लू समझ, कछु तोसे नादान।
दिन में इनकी नींद है, करें रात गुणगान।।

मंता कवि दिल कांच का, हाथ न जाए छूट।
हाथ प्यार से चमक है, दाब पड़े ही टूट।।

कवियों में कवि बहुत हैं, कोई न कालिदास।
मेघा कवि के दूत सब, घूमत झूमत पास।।

मंता कवि कवि ना रहे, कवि हैं जुमलेबाज।
बिना भाव के चुटकुले, कविता गिरती गाज।।

कछु कवियों को छोड़कर, सब हैं धंधेगीर।
कविता कछु संदेश नहीं, ना कविता में पीर।।

कवियों के गुट अलग बने, गठबंधन कवि होय।
कविता कवि अच्छी पढ़े, बिन गठबंधन रोय।।

एक चुटकुला मंच पर, कवी सुनाते चार।
को झूठा को सही है, मंता मानी हार।।

कवि कविता पढ़ते नहीं, करे तालियन मांग।
कविता सुन ऐसा लगे, पीकर आये भांग।।

कवि कविता ऐसी लिखो, बदले मन की रीत।
कविता मन प्रभाव नहीं, मत पढ़ कविता गीत।।

कवि की ताकत कलम में, पीछे है तलवार।
कलम तोड़ कर फेंक दो, बदला नहिं संसार।।

कवियों की कविता अमर, तुलसी केशव सूर।
कविता बदले भाव मन, भरती करुणा क्रूर।।

मंता अच्छा सुन रहे, कहत कवि अधिकांश।
कविता कोई सुर नहीं, पढ़त टूटती सांस।।

कवि कविता ऐसी लिखो, सबके मन भर जाय।
श्रोता कछु सीखे सबक, ताली खूब बजाय।।

कविता रोगों की दवा, कविता जन एहसास।
उनके मन कविता खुशी, जिनकी कविता खास।।

गरिमा गौरव देश कवि, जन मानस में मेल।
कवि की महक गुलाब सी, कविता तेल फुलेल।।

कविता मानव मन धुले, रहे न मन में मैल।
कविता जन की प्रेरणा, सही दिशा की गैल।।

नामहि पहले कवी तुम, दर्पण जा संसार।
कविता शोला शबनमी, कविता धार कटार।।

कविता मन की आस्था, कविता आंसू धार।
कविता मुख मुस्कान है, कविता प्रेमी प्यार।।

कविता जन की चेतना, कविता मन का वेग।
कविता सबका हौसला, कविता शब्दन तेग।।

कविता मन की वेदना, कविता जन की पीर।
कविता ही उपचार है, कविता जगे जमीर।।

कविता आजादी लड़ी, कविता फूंके प्राण।
सोते जन कविता जगे, जागा हिन्दुस्तान।।

कविता कवि को जोड़ती, कवि कविता पहचान।
कविता कवि समझा नहीं, कवि समझो नादान।।

कविता है जन क्रांती, कविता ही आगाज़।
कविता फूंके न्याय बिगुल, कविता जन आवाज।।

मंता कविता तुम पढ़ो, मिले सभी को सीख।
श्रोता की ताली मिले, जो कविता हो ठीक।।
“रोता धरती पूत”

दाता किसान जानिए, रहा अनाज उगाय।
जग सारा खाता फिरै, खुद भूखा रह जाय।।

लगा आसरा फसल पर, साधन कछु है नाहिं।
खुद के तन कपड़ा नहीं,कर्ज लेन कित जाहिं। ।

रात – दिना देखा नहीं, परिश्रम करें अकूत।
पककर फसल नष्ट हुई, रोता धरती पूत।।

खाद बीज मंहगे हुए, खेती में नुकसान।
लागत वापस ना मिली, हत्या करे किसान।।

पहले खेती जीविका, अब जीवन को खाय।
पिता हमारे खा लिए, खेती हमें न भाय।।

धूप घाम देखी नहीं, लहसुन रहे निराय।
वदन पसीना से हने, रहे दाद खुजलाए।।

पिता मेरे मेहनती, तड़के ही उठ जायं।
पशुओं की सानी करें, फिर खेतन पे जांय।।

फसलें सब सस्ती बिकें, मंहगे भये बजार।
बिटिया घर सयानी अब, बबुला है लाचार।।

खेतन में लागत लगत, बचता है कछु नाहिं।
छोड़ि किसानी खेत सब, शहरन भागे जाहिं।।

रहे ध्यान सरकार को, कृषकों का हो हेत।
घर घर सब खुशहाल हों, फसलें झूमें खेत।।

भूमि पर कृषक ना रहे, उपजै नहीं अनाज।
जन सारे भूखन मरें, गिरे सभी पर गाज।।

कृषक को सुदृढ़ कीजिए, भरें नाज भण्डार।
कर निर्यात विदेश में, जग फैले व्यापार।।

अषाढ में सूखा विकट, बदरा रहे निहार।
फसल सूख तिनका भयी, धरती रुदन पुकार।।।

बादल बरसे इस कदर, खेत भये सब ताल।
पशुअन को चारा नहीं, सब जन हैं बेहाल।।

झड़ी लगी बरसात की, गये लोग सब ऊब।
मक्का फसल मरी पड़ी, गया धान सब डूब।।

अति सूखा बारिश अती, बेमौसम की मार।
चौपट फसल किसान की, जीते जी है हार।।

गाय भैंस कुचैन भये, बैल भये कमजोर।
सीलन सब घर में लगी, घटा घिरी घनघोर।।

रुपया पैसा घर नहीं, कैसे होय बजार।
बिटिया के बेटा हुआ, कौन जाय ससुरार।।

सरकारों की नीति से, वंचित रहे किसान।
उनका हक उनको नहीं, दफ्तर में बेईमान।।

फसल रबी मारी गयी, शेष लयी बरसात।
गाय खरीदन दाम नहिं, रोटी सूखी खात।।

बड़ाहि व्यथित किसान है,जीवन भर दुख पाय।
दाता है वह अन्न का, चिन्ता सदा सताय।।

किसान पर कर्जा लदा, रोज तगादे होंय।
जेवर सब गिरवी पड़े, दुखड़ा किन से रोंय।।

खारा जल धरती मिले, पानी साधन नाहिं।
बरसा है तो फसल है, सूखा सूखे जाहिं।।

                      (मन) 

मन सबके मनही बसत, नहिं कोई गतिमान।
मन की गति मनहि समझे,कर तू क्षणिक ध्यान।।

चलायमान चंचल मन, भागत चारों ओर।
मन काबू रहता नहीं, खूब मचाता शोर।।

मन मिजाज अच्छा हुआ, करता अच्छी बात।
जब बिगड़े मन की दशा, नींद न आये रात।।

मन शान्ती कभी नहीं, करता हरदम उत्पात।
जा मन को है शान्ती, सब कुछ उसके साथ।।

मन कबहुं नहीं ठहरता, हरदम चलती नाव।
जाके मन ठहराव है, उसका जग प्रभाव।।

मन ही तेरा दर्पणा, पल पल उसमें झांक।
और न दूजा आयिगा, खुद ही खुद को आंक।।

मन हराए हार गये, जीवन अपनी जंग।
जन जो मन को जीतता, दुनिया उसके संग।।

मन ही तेरा हौंसला, मानव मन बलवान।
काम सबहि मन से बने, मन ही बड़ा विद्वान।।

मन चलाए सबहि चले, जासे बचा न कोय।
जो मन को बस में करे, जगत सूरमा होय।।

मन को सब नटखट कहे, चलत दुरंगी चाल।
लाख बचाये बचा नहिं, मन ही बनता काल।।

मन स्वभाव से चंचला, रूप तुरंग समान।
लगाम मनहि लगाइये, विचलित है नादान।।

अपना मन मन्दिर समझ, पूजन बारम्बार।
पांच चोर नाहिं घुसें, खुद का पहरेदार।।

तेरे मन की गुफा में, राग द्वेष का वास।
इनहिं निकाल बाहर कर, मत बन इनका दास।।

मौज मस्त चंगा भला, मन से सबका जोड़।
बातें मन मैला करें, इनसे मन को छोड़।।

बहुरुपिया मन को कहे, पल पल बदलै रुप।
जीवन मन ऐसे जुड़े, जैसे छाया धूप।।

इच्छा है जन अनगिनत, मन है सबके बीच।
किस पै मन तेरा मिले, किस पर जाए रीझ।।

जो जन मन से मन मिले, बनि गये दोउ मीत।
मीत जगत ऐसे भये, अमर हुई मन प्रीत।।

मन पोथी सब कुछ लिखा, तू ही उसको वांच।
झूठी मिथ्या त्याग सब, मन में बैठा सांच।।

सोय भरोसा खाट मन, इसे जगा झकझोर।
एक बार जो जग गया, जीवन भाव विभोर।।

नीके नगदर मन बसैं, दोनों हरदम संग।
मर्ज़ी मालिक खुदहि है, किसे लगा तू अंग।।

मन हवेली सबही रहत, भले बुरे हैं लोग।
अलग बुरे जन राखिए, ठीक भले का योग।।

मन गुमान अच्छा नहीं, सरल भाव जो होय।
तेरे आने पर खुशी, जाने पर सब रोय।।

मन ही रहता छल कपट, करै सत्य का नाश।
दया धर्म को मार कर, मेंटे प्रेम मिठास।।

यह तोकूं अच्छा नहीं, हरदम मन की मान।
मन पथ से भटकात है, पथिक राह पहचान।।

मन तुरंग स्वभाव एक, बनते चंचल ढीठ।
जब लगाम काबू नहीं, प्यार थपथपा पीठ।।

मंता मन प्रभु चरण में, खूब लगा तू ध्यान।
कारण आना सफल है, जग तेरा कल्याण।।

                      (प्रेम)

प्रेम शब्द पावन पतित, प्रेम जगत का सार।
मोल बिकाए ना मिले, ढूंढ़त फिरौ बजार।।

घट घट प्रेमी सांइयां, अन्तर्मन में झांक।
तेरा तोकूं झट मिले, लगे प्रेम की आँख।।

मीरा प्याला जहर का, प्रेम दिवानी श्याम।
पियत घटा घट पी गयी, वाकी प्रभु का काम।।

प्रेम बंधन हम बंधे, गांठ बड़ी मजबूत।
रिश्ते नाते प्रेम के, पेट बंदरी पूत।।

प्रेम मित्रता जगत अमर, प्रीति पावनी होय।
दशा देखि करुणा अपार, धीश द्वारका रोय।।

जटायु प्रेम अमर हुआ, नोंचा रावण चोंच।
पापी ते झपटै लड़ै, तनिक नहीं संकोच।।

देश प्रेम सबसे बड़ा, जोड़ो जन जन प्रीत।
बैर भाव जन दुशमनी, नहिं मानवता रीत।।

प्रेम रंग ऐसो चढ़ो, माँ विदुरानी भात।
सुधि बुधि माता ना रही, छिलका केशव खात।।

माता शबरी सब्र करे, प्रभु आने की आस।
प्रेम मिलाया राम को, बड़ी प्रेम अभिलाष।।

अमर प्रेम प्रहलाद का, पिता क्रूर अभिमान।
खम्भा फाड़ प्रकट भये, भक्तों के भगवान।।

मांगत प्रेम मिले नहीं, नहिं पैसा से मोल।
जन परिभाषा प्रेम की, दर्पण दिल का खोल।।

निस्वार्थ प्रेम ही जन, सफल सकल प्रधान।
अन्तर्मन करुणामयी, जीवन की पहचान।।

झूठ स्वार्थ प्रेम नहिं, सांच अकेला ऐक।
अजर अमर प्रेमी भये, मन का दर्पण देख।।

सांचा प्यार हि प्रेम है, नहिं दोंनो में भेद।
घड़ा प्यार अमृत भरा, मत कर स्वारथ छेद।।

प्रेम प्यार अंतर नहीं, एक पेड़ की डाल।
लेन देन सौदा हुआ, प्रेम बिगड़ता हाल।।

सांची प्रीती सोणियां, प्रीतम रब महिबाल।
दोनों मिल एकै भये, दुनियां एक मिसाल।।

रांझा साझा प्रीति को, भयी दिवानी हीर।
मंता काहू के जख्म, होती काहू पीर।।

शीरी फराद हम सुने, प्यार चढ़ा परवान।
जब जब चर्चा प्रेम की, शीरी का गुणगान।।

मजनूँ को मत मारिए, लैला चीख पुकार।
प्रेम दिवाने अमर हैं, करे याद संसार।।

पतित प्रेम पति पावनी, यम ने मानी हार।
पति प्राणों की वापसी, प्रीतम सांचा प्यार।।

पंक्षी समझें प्रेम को, बोली मीठी बोल।
जाने सोहि जान गया, प्यार बड़ा अनमोल।।

जग में लीला प्रेम की, धरती बदरा प्यार।
झुलसत धरती देखिकैं, बरसा मेघ फुहार।।

चंदा धौली चांदनी, सजी धजी सी रात।
प्रेम पिया की बावरी, यादों बीती रात।।

चुन चुन के चुनगा चुने, भर भर लाती चोंच।
प्रेम समर्पण मात का, रोती देख खरोंच।।

मंता चिडि़या चुनगुने, चुनत बिनत संसार।।
दाता से सब जुड़े हैं, दाता सब पै प्यार ।।

मंता पूजा प्रेम है, प्रेम जगत का सार ।
प्रेम मिलाए राम को, प्रभु प्रेमा अवतार।।

                  (नशाखोरी)

नशा नाश अंतर नहीं, मन में करो विचार।
बदहाली घर में हुई, टूट गया परिवार।।

दारू की लत बुरी है, बर्तन गये बिकाय।
कलह क्लेश हर रोज का, दइया तौबा हाय।।

शराब शराफ़त है नहिं, बिगड़ैं सारे काम।
एक शराबी घर हुआ, कुनबा है बदनाम।।

शराब पियन पैसा मिले, बच्चा घर बीमार।
जो रुपया घर ना मिला, गालिन की बौछार।।

बिना शराब रोटी नहीं, कैसे बने जुगाड़।
सौ रुपया बेची घड़ी, कीमत एक हजार।।

पीने को घर से चला, लगता सूखा बेर।
ठेके से बाहर हुआ, निकला बब्बर शेर।।

पत्नी घर चिन्ता करे, देखत बच्चा बाट।
आया पीकर देर से, आज लगी है हाट।।

पी पी कर इतनी पिया, खुद का रहा न होश।
औंधे मुँह उल्टे पड़ा, सांस भयी खामोश।।

जिन गांवों में दारू नशा, वहाँ निकम्मे चोर।
स्त्रियों की है दुर्दशा, बच्चे हैं कमजोर।।

शौक मौज पहले पिया, आदत लयी बिगाड़।
शाम होत बेचैन है, करता फिरै जुगाड़।।

नशा नाश की है घड़ी, उजड़ गये परिवार।
अच्छे अच्छे बिके सब, मिट गये साहुकार।।

नशा नशाई हैसियत, सब कुछ है खाकीन।
दया धर्म सब ही गया, जब हुआ चरित्रहीन।।

नशा नशेड़ी सब बिका, बची न घर में कील।
हया शर्म सब मर चुकी, आंखिन रहा न सील।।

अति मादकता के लिये, सुर्ख सुरा है लाल।
जहर मिलाबट हो रही, पीते ही बेहाल।।

कंपन हाथों में हुआ, गुर्दे हुए खराब।
लटू लेजमा बिक गयी, छूटी नहीं शराब।।

दौआ पौआ पी रहे, बिगड़ गया परिवार।
लड़का ब्याहन को फिरैं, सबके अलग विचार।।

दारू दवा अलग नहीं, पीना दवा समान।
खाना पीना सब हजम, समझो रोग निधान।।

मदिरा है अच्छी बुरी, निर्भर है उपयोग।।
अति ज्यादा अच्छी नहीं, खुराक मेंटती रोग।।

पीने वाले पी रहे, खूब ऐश आराम।
जो मर्यादा में रहा, अच्छा उसका काम।।

मदिरा पीते पीजिए, मदिरा पिए न तोय।
मदिरा जो पीने लगी, सब कुछ अपना खोय।।

मयखाने में जाहिए, पैमाने पर ध्यान।
अपने घर को लौटिए, जैसे खडग म्यान।।

दारू पी दंगा हुआ, विना वजह की रार।
मार पीट जख्मी हुए, घर से हुए फरार।।

चढ़ता जब दारू नशा, बड़े बड़े अपराध।
अपनों के ही बीच में, अपने ही बर्बाद।।

पीते हो तो पियो जन, मन मस्ती में झूम।
यह तोकूं अच्छा नहीं, इधर उधर तू घूम।।

काहू मधु सी मीठी लगे, मधु मधुशाला नाम।
आने जाने की भीड़ में, बड़ी रंगीली शाम।।

                    "अपना देश" 

मांटी प्यारी देश की, पड़ते मांटी पांव।
शहर नगर अच्छे लगें, सुन्दर लगते गांव।।

अपने भारत देश पर, कुदरत रही दयाल।
ऋतुएं चारों आपनी, मन में करो खयाल।।

अपनी मांटी जो मिला, और न पाओ देश।
धूप छांव मिलती नहीं, काया बिगड़ा भेष।।

नदियां अपनी पावनी, अविरल बहती धार।
धरती को मांँ सींचती, करतीं जन उपकार।।

अभ्रक तांबा गर्भ धरा, भरी कोयला खान।
माणिक हीरा देश में, भारत को पहचान।।

फसलें झूमैं खेत में, श्रम में जुटा किसान।
गेंहूंँ स्वर्णिम बालियां, हरी चुनरिया धान।।

बाग लदे हैं फलों से, महके लीची आम।
धान बखारी भरी है, मेवा में वादाम।।

मका बालि झांकि रही, भुंटी चमकै ज्वार।
झुका बाजरा वजन से, धान सूखता द्वार।।

गांव गली पक्की भयी, सड़कों का निर्माण।
तेज गती है रेल की, लदा ट्रक सामान।।

मराठी पूजन गणपति, छट का पर्व बिहार।
ओणम उत्सव केरला, भारत सब त्योहार।।

दीप दिवाली घर जले, होली उड़े गुलाल।
ईद गले सब मिलत है, भरकर बाहें डाल।।

दुर्गा पूजा बांग्ला, गरवा जन गुजरात।
क्रिस्मस सारे देश की, खुशियों की सौगात।।

राज्य भाषा अलग है, अपना प्यारा देश।
अनेक में हम एक हैं, दुनियां कहे विशेष।।

                   (लापरवाही)               

शब्दकोष हिन्दी शबद, बहुचर्चित है नाम।
लापरवाही कहत सब, मचा रखा कोहराम।।

लापरवाही मन जगी, भूलि लखन की बात।
बिलखत रोति चलीं गयीं, सीता राबण साथ।।

लक्ष्मण भाभी ते कही, जाउ न रेखा पार।
भाभी बात मानी नहिं, पुष्पक भयीं सवार।।

अनदेखा करि बात को, मात हुई हैरान।
पछतावा निज भूल का, खुदहि हुआ अपमान।।

लापरवाही वजह सब, वन वन भटकै राम।
रावण की औकात क्या, भूल बिगाड़े काम।।

अनदेखा रावण किया, मंदोदरि की बात।
छितर वितर रण में हुआ, लाख पूत का तात।।

अनसुना अनदेखा जन, लापर वाही नाम।
नजर अंदाज भूल करि, सबका एकहि काम।।

रेखा अनदेखा करी, दुखी हुई फिर मात।
रामायण तुलसी लिखी, मिली हमें सौगात।।

नहीं जरुरत मात को, रेखा के उस पार।
माँ की थोड़ी अनसुनी, मच गयि हाहाकार।।

लापरवाही वजह सब, कटी बहन की नाक।
सुन रावण गुस्सा हुआ, खूब हंसा बेबाक।।

मर्यादा टूटी सबहि, लखन काट ली नाक।
अन देखी संवेदना, गिरती नारी साख।।

लापरवाही जुवां से, गयी मर्यादा डूब।
अंधों के अंधे हुए, हंसी द्रौपदी खूब।।

दुर्योधन क्रोधित हुआ, चुभा शब्द का बान।
शर्म हया नारी नहीं, मात पिता अपमान।।

मर्यादा हनन हुई , अपनों का उपहास।
दुर्योधन की चीख से, गर्जत है आकाश।।

परवाह नहीं पंडवा, लगी द्रौपदी दाव।
चीर हरण कौरव हंसत, केशब लाज बचाव।।

लापरवाही की वजह, दुर्घटना हर रोज।
रुकने का अंकुश लगे, जन उपाय कछु खोज।।

रोज सड़क पर हादसा, अपना ही नुकसान।
लापरवाही वजह है, लाखों जातीं जान।।

लापर वाही खेल में, लिया रिकॉर्ड तोड़।
चिकित्सक चीड़ फाड़ में, दिया उस्तरा छोड़।।

आगी लगी खाक हुआ, हाल तबाही जान।
घटना कारण जांच में, लापरवाही मान।।

लापरवाह मानव हुआ, अपना बंटाधार।
करनी पर पछितात है, रोता बारम्बार।।

छात्र लापरवाह हुआ, बिगड़ा उसका खेल।
पढ़ना लिखना भाड़ में, हुआ परीक्षा फेल।।

लापरवाह गृहणी हुई, निकला दूध उफान।
बच्चों पर गुस्सा करे, खुद भूली नादान।।

लापरवाही वजह से, भारत हुआ गुलाम।
मुठ्ठी भर अंग्रेज थे, अपना काम तमाम।।

लापरवाह बुजुर्ग थे, वीर हुए बलिदान।
फांसी फंदा गले में, मुक्ती हिंदुस्तान।।

विधवा हुईं सुहागिनें, मातन उजड़ी कोख।
तब जा आजादी मिली, हम सब भूले शोक।।

मेरे घर राज उनका, सहते अत्याचार।
लापरवाही बड़ो की, देश हुकूमत मार।।

परदेशी आकर बसे, अपने भारत देश।
अनदेखा परिणाम है, हाँ जू करत नरेश।।

गोरे आये देश में, सात समंदर पार।
शुरूआत व्यवसाय की, डेरा अपना डार।।

राज किया दो सौ बरस, खूब मचाई लूट।
नब्ज हमारी पकड़ ली, आपस डाली फूट।।

देश खोखला कर गये, लेकर सारा माल।
हम आपस में लड़ रहे, बीते कितने साल।।

सोने की चिड़िया कहे, दुनियां देश महान।
अपनों की कुछ खामियां, बेड़ी हिन्दुस्तान।।

जन संख्या वृद्धि में, नम्बर दो पर देश।
लापरवाही वजह है, घर में बड़ा कलेश।।

आमदनी कछु घर नहीं, लला ललिन की धारि।
पांच सेर आटा खपै, तोउ न पड़ती पारि।।

छटा बच्चा जन्म हुआ, खुशियाँ खूब अपार।
मर्ज़ी है सब राम की, वह भेजे संसार।।

रोता बच्चा एक माँ, दूजन पीता दूध।
गुस्सा तीजा खीजता, रूठत चौथा पूत।।

बच्चा पैदा एक हो, पालन अच्छा होय।
माँ बेटा स्वस्थ रहें, घर नहिं तंगी तोय।।

घर परिवार बड़ा जहां, सुविधा नहीं मुहाल।
अपनों से अपने लड़ें, पुरिखा करें मलाल।।

                     ( समय)

समय सामना को करे, हुआ न ऐसा वीर।
लूटी भीलन गोपिका, चला न अर्जुन तीर।।

समय न रोके ना रुके, हरदम चलता जाय।
रोकी सांस समय ने, फिर ना चले उपाय।।

समय के वश सबहि हुए, बड़ेहि तीरन दाज।
मिट्टी मिलत खाक भये, जिनको खुद पे नाज।।

समय हराए सूरमा, सब ने खाई मार।
टेढ़े जन सब सीधे भये, लगी समय फटकार।।

समय न काहू छोड़ता, सब कछु समयअधीन।
काहू को सब कछु दिया, काहू का सब छीन।।

समय ही मती मनथरा, मती कैकयी फेर।
पूत बिना तड़पत पिता, लिया समय जब घेर।।

समय चलाई चल गयी, चतुर सयानी चाल।
पासा फेंका समय ने, भये पण्डवा बेहाल।।

समयहि फेरे समय को, समयहि छाया धूप।
कारण समयहि वन फिरैं, समय बनाए भूप।।

अवसर समय अलग नहीं, अवसर दूजा नाम।
जो अवसर हाथों गया, फिर ना बनता काम।।

समय से पहले कछु नहिं, खूब लगा तू जोर।
समय नजर तुझ पर पड़ी देखें सब तेरी ओर।।

समझ समय आयी नहीं, समय छूटता हाथ।
आयी समझ समय नहीं, फिर काहे पश्चात।।

जो जन समझा समय को, लिया समय पहचान।
समय मीत स्वागत खड़ा, जग तू बने महान।।

समय पढ़ाई ना करी, सोया चादर तान।
मन चिन्ता में डूबता, नहिं खुशी इम्तिहान।।

समय न मुड़कर देखता, नहिं करै इन्तजार।
स्टेशन गाड़ी छूटती, देखत पथिक निहार।।

समय बीज बोया नहीं, गया खेत खरि आय।
अंकुर धरा न फूटता, किसान फेरि पछिताय।।

समय सत्य साथी सदा, दोनों रहते साथ।
जब ही सत्य अलग हुआ, समय न करता बात।।

समय सुहाना सफर है, चलती जीवन रेल।
दीपक बाती बुझ गयी, खत्म हुआ जब तेल।।

जो जन परखे समय को, समय निभाए साथ।
जन जो भूला समय को, पड़ै समय की लात।।

समय पहिया रुके नहीं, अविरल जाकी चाल।
बड़े सूरमा फंसत हैं, समय फेंकता जाल।।

काल समय अवसर घड़ी, चारो एकहि जान।
एकहु बार निकल गये, वापस फिर नहिं आन।।

समय नहीं तो बोल मत, चुप रहना ही ठीक।
जब आये तेरा समय, खूब बुझा तू हीक।।

समय सारणी बंधे हैं, जग के सारे जीव।
तत्व एक परमात्मा, सब जीवन की नीव।।

समय दुखी सब ही किए, सुखी समै संसार।
बलिहारी जा समय की, किन पर होय निसार।।

समय ही आये जन्मता, होति खुशी अपार।
आत समय सांसा रुकी, छोड़ि चला संसार।।

समय रहत कछु कीजिए, अभी न बिगड़ी बात।
एकहु बार निकल गया, फिर नहिं आता हाथ।।

                    "मानवता"

मानवता धारण करो, दाता दिल में वास।
जन सेवा ही धर्म है, सब कछु तेरे पास।।

जन अभिमान न कीजिए, मन का बड़ा विकार।
रावण का सब कुछ गया, देखो पंथ निहार।।

अलग अलग नदियां बही, तरल एक ही जान।
सब जाकर सागर मिलीं, खारी एक समान।।

ईश्वर अल्ला एक हैं, अलग अलग हैं नाम।
अंश पिता सबहि व्यापे, पिला प्रेम का जाम।।
जगत पिता सब एक है, उसकी सब संतान।
सभी धर्म आदर करो, जाति एक इंसान।।

धरती जिसका आगमन, सब भेजे भगवान।
तेरा मेरा कुछ भी नहीं, सब कछु दाता मान।।

गीता कुरान भेद नहिं, दोनों एकहि सार।
मूरख आपस लड़त हैं, लिए हाथ तलवार।।

मेरा अल्ला अलग नहिं, दिल में बसता राम।
दोनों घट में एक हैं, मानवता है नाम।।

जाति धर्म आपस लड़े, रोता भारत देश।
बैर भाव जन दुशमनी, नहिं मानवता भेष।।

आरति मेरी आस्था, अच्छी लगे अजान।
मंदिर मस्जिद सिर झुका, सबका हिंदुस्तान।।

वतन कौम नहिं जानता, जन एकहि परिवार।
आपस लड़ना ठीक नहिं, दाता सब पर प्यार।।

वतन हिफाज़त सब लड़े, बोस भगत आजाद।
वफा उल्ला हमीद की, मुल्क हुआ आबाद।

देश बपौती एक नहिं, सब धरमन अधिकार।
मिट्टी ज़फ़र दिवानगी, गुरु वारे सुत चार।।

स्वर लता का गूंजता, दिल में बसे रफी़क।
पंडित मोमिन मौलवी, इनसे लो कछु सीख।।

सैनिक सरहद पर खड़े, लिए हथेली जान।
मातृ भूमि माँ भारती, दिल में हिन्दुस्तान।।

हिन्दू मुस्लिम सब लड़े, आजादी बलिदान।
अपनी ईद दीवाली, सबकी है रमज़ान।।

अपनों से अपने मरें, बड़े शर्म की बात।
मांटी राम रहीम की, नहिं काहू औकात।।

खान शान हैं देश की, माता पूत कलाम।
बेमिसाल मांटी वफा, करता देश सलाम।।

राष्ट्र भक्ति सबसे बड़ी, अपना देश महान।
आन वान पर मर मिटे, अमर वीर बलिदान।।

निर्धनता मिलकर लड़ो, पाओ इस पर जीत।
सबका हक सबको मिले, मानवता की रीत।।

दो रोटी इज्जत मिलें, उस पर करियो आस।
जगत बड़ा संतोष धन, जो है तेरे पास।।

मुसलमान सब बुरे नहिं, हिन्दू अच्छे मत जान।
भले बुरे सब जाति में, मानवता पहचान।।

बच्चे जन्मे मात ने, हिन्दू मुस्लिम नहिं कोख।
धरम करम संसार में, मरघट मांटी धोक।।

जन ते जन जिंदा जले, जग में कछु हैवान।
हया शर्म जन मर चुकी, नहिं मानवता ज्ञान।।

हिन्दू मुस्लिम बाद में, पहले हम इंसान।
बात समझ जो आ गयी, तेरा जग कल्यान।।

जाति धर्म पर झगड़ना, मूरख जन का काम।
सबका सबमें एक है, सुमिर उसी का नाम।।

आये जन संसार में, नेक धर्म के काम।
पल दो पल की जिन्दगी, भज ले दाता राम।।

देश आपना हम वतन, समझो सब परिवार।
प्रेम भाव जन आपसी, यही रीति व्यवहार।।

इक दूजे को समझना, मिटे आपसी बैर।
नफरत काहू क्या मिला, मांगो सबकी खैर।।
दिल्ली

दिल्ली भारत आत्मा, राज्यन का साथ।
बागडोर जन देश की, प्रधान मंत्री हाथ।।

सबके दिल दिल्ली बसी, दिल्ली हिंदुस्तान।
दूतावास विदेश के, भारत की पहचान।।

लाल किला दिल्ली धरा, दिल्ली कुतुब मीनार।
मस्जिद जामा देखिए, दिल्ली की सरकार।।

यमुना बहती बीच से, दिल्ली दोनों ओर।
मंता दिल्ली छू रही, कई राज्यन छोर।।

दिल्ली राष्ट्रपति भवन, ध्वज लहराये शान।
लदी फूल से क्यारियां, खुबसूरत उद्यान।।

गेट इंडिया देश का, वीरों का पैगाम।
बलिदानी है वतन की, अमर हुआ है नाम।।

दिल्ली दौड़ें गाड़ियां, सबका दिल्ली योग।
आत जात हैं यात्री, भारत के सब लोग।।

दिल्ली के होटल बड़े, पंच सितारा नाम।
चकाचौंध की जिंदगी, रंगीन मिजाजी शाम।।

दिल्ली झुग्गी झोपड़ी, रहते अपने लोग।
इनके सिर पर छत नहीं, काटे कटे न रोग।।

दिल्ली चाँदनि चौक में, जगमग होय बजार।
मोल भाव ग्राहक करें, घूमत पाॅकिट मार।।

दिल्ली का धौलाकुआं, श्वेत भरा था नीर।
कुआं कुआं सब ही कहें, किसे कुआं की पीर।।

दिल्ली में सेना भवन, राष्ट्रपति हैं शीश।
सेना मुख्यालय यहाँ, मुख्य न्याय के धीश।।

शीश धीश दिल्ली बसे, दिल्ली में दरबार।
दिल्ली चाबी देश की, कछु सोचे सरकार।।

मंता अपराधिक खबर, रोज सुनत हैं कान।
जो दिल्ली सुधरी नहीं, कैसे हिन्दुस्तान।।

                     "गरीबी"

धन बिन जन निर्धन हुए, घर निर्धनता होय।
सिर ढकने को छत नहीं, बच्चा भूखा रोय।।

आमदनी कछु घर नहीं, नहीं मजूरी रोज।
मिले दिहाड़ी घर चले, बुरा गरीबी बोझ।।

गरीब गरीबी ज्यों त्यों, बीते कितने साल।
खूब तरक्की देश की, मरें कुपोषण लाल।।

जन गरीबी मिटी नहीं, सब बेबस लाचार।
निर्धनता असली वजह, मानव भ्रस्टाचार।।

निर्धनता सबसे बुरी, कोइ न निर्धन होय।
रोटी रोजी सब मिले, भूखा कोउ न सोय।।

गरमी पतरा छत गरम, सर्दी शीत बियार।
छत टपके बरसात में, बारिश मूसलधार।।

महानगर की झुग्गियां, मच्छर हैं भरमार।
काहू उल्टी हो रही, काहू चढ़ा बुखार।।

गरीब कई प्रकार के, कई गरीबी रूप।
कोई दरिद्र अभाव धन, कोई इच्छा कूप।।

बच्चा बुखार तप रहा, घर में नहीं छदाम।
उधार मांगे ना मिला, अपने दाता राम।।

रोटी को बोटी बिकी, भयी लाज नीलाम।
पेट भूख सब कुछ बिका, बदले में कछु दाम।।

देश गरीबी नहिं मिटे, जब तक बेईमान।
नेक भला ईमान ही, उन्नति हिन्दुस्तान।।

चोर लुटेरे देश में, निर्धनता का योग।
मानवता जन चेतना, मिटे गरीबी रोग।।

निर्धनता हर जाति में, जाति न एक समान।
घर घर हो संपन्नता, अपना हिंदुस्तान।।

रोटी कपड़ा जन मिले, सबको मिले मकान।
तीनों ही हैं प्राथमिक, पहले जन कल्याण।।

एक साथ मिलकर लड़ो, निर्धनता की जंग।
मोती मिल माला बने, सब धागा के संग।।

भूखे नंगे देश में, बड़े शर्म की बात।
खाने को रोटी नहीं, कटती रोते रात।।

दीन हीन मन से हुए, कोस रहे तकदीर।
आशा जीवन कट गया, नहिं बदली तस्वीर।।

तुमें गरीबी देखनी, भारत के कछु गांव।
तन पर कपड़ा है नहीं, नहीं जूतियां पांव।।

निर्धन सोता सड़क पर, उसका नहीं मकान।
होय गुजारा मांगकर, थोड़ा सा सामान।।

लावारिस लाशें पड़ी, नहीं मिली श्मशान।
कोई इनका है नहीं, ना कोई पहचान।

          (सरदार वल्लभभाई पटेल)

वल्लभ बल में बड़े जन, मात भारती लाल।
पुरुषों में वह लौ पुरुष, भारत की थे ढाल।।

खंड खंड करि अखंडत, अपना भारत एक।
जन जन के नायक हुए, वतन भलाई नेक।।

जन जन की यादों बसे, माता पूत पटेल।
मंत्र फूंक जादू किया, रजबाड़ों का मेल।।

त्याग समर्पण भावना, बलशाली जन धीर।
योद्धा बल के सूरमा, धरती भारत वीर।।

नमन करें हम आपको, शीश झुकाता देश।
चले बताई राह पर, भारत बदले भेष।।
( दाऊ जी)

भैया दद्दा सब कहें, गांव करे सत्कार।
आदर अदब स्वभाव में, याद रहेगा प्यार।।

रो रो दीदा लाल भये, गिरती अंसुअन धार।
को थपथपयै पीठ अब, कौन करेगा प्यार।।

दाऊ मेरे पिता सम, देखि हमें हर्षाएं।
हाल चाल सब पूछि कें, मनहि खूब सिआएं।।

पिता हमारे कहत थे, भैया सम कोइ नाहिं।
जब जइयो तुम गांव में, छुइकें अइयो पांहि।।

दाऊ आप जहाँ रहें, सिर पर रखियो हाथ।
चलें बताई राह पर, सत्य न छोड़ू साथ।।

                   (नारी शक्ति)

नारी जननी जगत की, नारी नेक महान।
आदर नारी कीजिए, नारी सृष्टी शान।।

नारी नारायण जनम, खेले हरि हसि गोद।
कौशल्या के राम सुत, यशुदा बाल विनोद।।

नारी देवी त्याग की, ममता मूरति जान।
धर्म दयानिधि सुलक्षणी, घर कुटुम्ब कल्याण।।

नारी नाता नेह का, करुणा हेज अपार।
माता ममता भाव में, घर की पालनहार।।

धनी जगत जन जानिए, खुशियाँ रहें अपार ।
जिस घर नारि सुलक्षणी, खूब फलै परिवार।।

आन बान पर मर मिटी, लिए हाथ तलवार।
लक्ष्मी बाई चण्डिका, रण में हाहाकार।।

नारी से नर जगत में, इक दूजे पहचान।
नर नारी समझी नहीं, जीवन नरक समान।।

नारी घर रोशन करे, धन वैभव ही जान।
सम्मानित नारी जहाँ, घर है स्वर्ग समान।।

भगवन ने नारी रची, सृष्टी का श्रंगार।
सुन्दरता है जगत की, जन अनुपम उपहार।।

नारी जन्में कोख से, योद्धा वीर महान।
धन्य जगत नारी भयी, पूतन को बलिदान।।

देश धरम के वास्ते, नारी रण मैदान।
महलों के सुख छोड़ कर, तजती अपने प्राण।।

बिटिया बाबुल लाड़ली, खेत कलेवा जायि।
चहल पहल घर में भयी, सुता मायके आयि।।

बिटिया पूजा अर्चना, खुशी तीज त्योहार।
अभिवादन आदर करो, करो बेटियन प्यार।।

भरहि पेट परिवार का, बचा खुचा खुद खाय।
अपनी पीड़ा अपन तक, औरन नहीं बताय।।

बिटियन को शिक्षित करो, विद्या होए प्रचार।
घर बिटिया एक शिक्षिका, साक्षर कई हजार।।

पढ़ी लिखी हैं बेटियाँ, घर ही समझो स्कूल।
बिना पढ़ाये सब पढ़त, घरहि शिक्षा का मूल।।

बिटिया स्वागत कीजिए, बाबुल कन्यादान।
बेटी घर आंगन हंसी, परिजन की मुस्कान।।

नारी निबल न जानिए, शक्ती का भण्डार।
विकराल रूप धारणी, नर मुण्डन का हार।।

नारि निरादर मत करो, आदर की है पात्र।
जहाँ अनादर नारि का, बचा न एकहु मात्र।।

जगत नारि जगदंबिका, दुष्टन करैहि विनाश।
नीति धर्म रक्षा सदैव, अधर्म खींची सांस।।
20
( पाकिस्तान)

पाक पाक अब है नहीं, बड़े घिनौने काम।
आदत से मजबूर है, दुनियां में बदनाम।

बचकानी हैं हरकतें, मियां बड़े नादान।
खाने को रोटी नहीं, फिरैं चबाते पान।।

सुई बनाना इल्म नहिं, बात करें तलवार।
लिए उधारी खा रहे, हमसे छेड़े रार।।

भारत से पैदा हुआ, कहते पाकिस्तान।
रिश्ते में हम बड़े हैं, भूल गये इमरान।।

शेखी मारें शेख जी, चले न शेखी काम।
देश चलाना है मियाँ, पड़े जरूरत दाम।।

पहले देश चलाइये, अच्छी नहिं तकरार।
लोग तुम्हें थूक रहे, घटिया है सरकार।।

मंदिर में है आस्था, दिल में बसी अजान।
हिन्दू मुस्लिम बाद में, पहले हम इंसान।।

रोना धोना ठीक नहिं, समझत दुनियां लोग।
आदत से वाकिफ़ हुए, आतंकी का रोग।।

मंदिर मस्जिद मन बसे, काशी काबा एक।
सब कछु तेरे घट बसै, अन्तर्मन में देख।।

तुम बराबरी के नहीं, रिश्ते और रसूख।
जगह तुमारी और हो, करते उसके टूक।।

भारत से पंगा नहीं, होगा चैन हराम।
अच्छा है मिलकर रहो, यही तुमें पैगाम।।

बोये तुम बारुद को, युवा करे गुमराह।
भारत कुछ बिगड़ा नहिं, खुद से हुए तबाह।।

माफ किया हर भूल को, तुमें न आयी शर्म।
धोखे से हमला किया, कौन तुमारा धर्म।।

बम धमाके खूब किए, सोचा नहिं अंजाम।
खुद के अब थू थू करें, उतर गयी सब झाम।।

भारत या फ़िर पाक हो, एकहि है आवाम।
दर्द दर्द सब एक सा, नहिं समझे गुलफा़म।।

जख्म दिये गहरे मियां, मिटे न मेंटें दाग।
माता उजड़ी कोख जन, माथे मिटा सुहाग।।

बटबारे में अलग तुम, छोटा हिन्दुस्तान।
नक्शा कुछ और होता, ऊंचा भारत स्थान।।

जिन्ना जिद पर अड़े रहे, गद्दी नेहरू भूख।
मजबूर हुए गांधी, भारत के दो टूक।।

भारत कद छोटा हुआ, चुभता दिल में तीर।
नमक जले पै छिड़क कर, माँग रहे कश्मीर।।

हम तुमसे जो कह रहे, करना उस पर गौर।
बात मियां कश्मीर की, कब्जे में लाहौर।।

भारत पाक अलग हुए, अपना अपना देश।
अब मर्यादा में रहो, बदलेंगा परिवेश।।

बारूदी विस्फोट में, राख़ हुए इंसान।
लाशें देखीं रो गये, अल्ला हू भगवान।।

हिन्दू मुस्लिम नहिं मरे, असल मरा इंसान।
अपन अपन को रो रहे, हंसते है हैवान।।

मजहब ने अंधा किया, काफिर और गंवार।
बेकसूर को मारना, नहिं जन्नत का द्वार।।

अपना खाओ कमाओ, हमें तुमारी पीर।
बात हमें अच्छी नहीं, जो मांगा कश्मीर।।
(महँगाई)

महँगाई महँगे हुए, आलू बैंगन बेर।
लहसुन छूता आकाश, भिंडी सत्तर सेर।।

लंगड़ी लौकी ऐंठती, कद्दू खाता भाव।
बापू लाता धड़ी में, बेटा लाता पाव।।

सड़ा प्याज बातें बड़ी, गोभी करे गुमान।
तोले में पालक बिके, मिलती मेंथी ग्राम।।

रास नहिं धना पुदीना, थाली में सुनसान।
महँगाई यह बाबरी, सबके खींचे कान।।

दालें करतीं दिल्लगी, चना चढ़ा परवान।
मटरगश्ती मटर करे, बरी चलाती काम।।

चीनी चावल भाव सुन, मन में आती खीझ।
थोड़ी थोड़ी खाइए, होगी डायबिटीज।।

गजब करें यह गाजरें, महँगा मूली मोल।
खाद्य तेल महँगा हुआ, महँगा है पेट्रोल।।

सब्जी मंडी दिन नहीं, जायें बीती रात।
बची खुची सस्ती मिले, बनती अपनी बात।।

हल्दी मिर्च भाव तेज, तेज हुआ मिष्ठान।
असमंजस ग्राहक पड़े, लौटा बिन सामान।।

तेजी असर गरीब पर, जाकी आमदनी नाहिं।
बच्चे घर फांके करें, किन से मांगन जाहिं।।

देखि खिलौना रोत है, बच्चा काहु गरीब।
दामन में है कीमती, बेटा कहाँ नसीब।।

आम आदमी पर पड़ै, मंहगाई की मार।
आमदनी कछु घर नहीं, खर्चा सिर पै भार।।

मंहगाई की मार ने, तोड़े सब अरमान।
थैलों में रुपया होगा, जेबों में सामान।।

           (हिंदी बिंदी हिंद की) 

हिन्दी बिन्दी हिन्द की, जानो जन की जान।
लेखन में अति सरल है, बोलन में आसान।

भाषा का आदर करो, भाषा है पहचान।
परिभाषित भाषा करे, भाषा में सम्मान।

हिन्दी अनुराग असीम, प्रेमनगर की खान।
भाषा का मृदु भाव है इसको सर्वोपरि मान।

हिंदी मेल मिलाप है, जोड़े जन- जन प्रीति।
भाषा हिंदी से मिलें, सिखलाए सच्ची रीति।

कबिरा ने दोहा लिखे, छंद लिखे रसखान।
हिंदी वाणी नानका, मीरा गिरिधर गान।

ऋषि मुनि सब हिन्दी लिखे, छन्द रचाए सूर।
तुलसी ने मानस लिखा, रत्ना ज्ञान सहूर।

हिन्दी है मृदुभाषिनी, मृदु मिस्री का घोल।
अपना मानो जगत सब,नेह शबद मुख बोल।

हिंदी पढ़ना सीखिए, महिमा बड़ी अपार।
केरल में पैदा हुए, दिल्ली में व्यापार।

निज भाषा का अदब कर, मानो मात समान।
सब भाषाओं का मिलन, हिन्दी में पहचान।

खुद गुमान अच्छा नहीं, भाषा पर अभिमान।
भांति – भांति जन जानिए, भाषा एक समान।

हिन्दी सब इकजुट करे, जाने जन की पीर।
सूरत की मुस्कान यह, अँखियन समझो नीर।

भाषा दूजी नहिं भली, हिन्दी हमको भाय।
शब्दकोश हिन्दी वतन, गोरे लिये चुराय।

मातृ भाषा पढ़ो लिखो , मातृ भूमि सम्मान।
भारत से भाषा बनीं, भाषा नेक महान ।

भाषा पावन आपनी, हिन्दी है सिरमौर।
सेवा हित जन जानिए, निज भाषा पर गौर।

भाषा सबको जोड़ती, बांटे सबको प्यार।
जन भाषा से जोड़िए, जन जन में प्रचार।

हिन्दी है आदर अदब, पढ़कर बनो सुजान।
मानुष को शोभित करे, जीवन का परिधान।

भाषाएं सब अलग हैं, हिन्दी सबका रूप।
बोलन में हिन्दी लगे, समझो छाया धूप।

भाषा अवधी मैथिली, सब हिन्दी परिवार।
सब गहने हाथन सजे, हिन्दी कंठक हार।

हिन्दी को अपनाइए, चहुँदिश होय विकास।
भाषाएं सब ही पढ़ो, हिन्दी समझो खा़स।

भाषाएं सब देश की, सार एक ही जान।
उर्दू लफ्ज़ अदब समझ, हिन्दी आदर मान।
(दीपावली)
करो प्रज्वलित दीप जन, जग मेंटो अंधियार।
अन्तर्मन के दीप से, मानवता संचार।।

दीप जलइयो नाम उन, सरहद पहरेदार ।
वतन हिफाज़त खड़े हैं, असली रिश्तेदार।।

दीपों की दीपावली, जन आती हर साल।
कुछ खोया कुछ पा गये, हरदम रहा मलाल।।

दीप जलें ऐसे जलें, जगह न छूटै कोय।
जग अंधियारा मिटै जन, घर घर खुशियां होय।।

उत्सव है उत्साह का, खुशियाँ मिलें अपार।
अभिनंदन जन बड़ो को, छोटन मेरो प्यार।।
(पर्यावरण)
1
पर्यावरण रक्षा करो, धरा न दूषित होय।
वायु जल प्रदूषित हुए, जग बीमारी रोय।।
2
जल हवा जीवन जानो, इनके बिन कुछ नाहिं।
यह दोनों दूषित भये, सांसे आयिं न जाहिं।।
3
उद्देश्य यहाँ जीव का, सब भेजे भगवान।
तेरा मेरा कुछ नहीं, सब दाता का मान।।
4
वृक्षन को नहीं काटिए, जानो धरा लिबास।
नग्न धरा ही पाप जन, लज्जा रही न पास।।
5
धरती के सब आवरण, वृक्ष वायू जल जान।
यह सब नाहीं सृष्टि में, कित रहिंहैं नादान।।
6
पहाड़ धरोहर प्राकृति, धरा सन्तुलन होय।
पहाड़ धरती ना रहे, जीव बचे नहिं कोय।।
7
बहती नदियां धरा पर, करें सदा उपकार।
धोये तूने पाप सब, भयी विषैली धार।।
8
मानुस निजहि स्वार्थ में, किया बड़ा नुकसान।
धरती को घायल किया, रुदन करे असमान।।
9
वृक्षारोपण कीजिए, धरती का श्रृंगार।
हरियाली धरती जहां, बरसा बारम्बार।।
10
वृक्षों ने कछु नहीं लिया, अपना सबहि लुटाय।
जन जानो पापी अधम, पेड़न हरा कटाय।।
11
हरी भरी धरती जहाँ, उसे स्वर्ग ही जान।
धूरि उड़ति टीलन जहाँ, समझो नरक समान।।
12
बरसा जल संचित करो, भरे पुखरिया ताल।
पानी है सब चैन में, बिन पानी बेहाल।।
13
सब पेड़ों की खासियत, अलग अलग गुणवान।
तरह तरह के फल लदे, पककर शहद समान।।
14
गाय भैंस जन पालिए, उपयोगी है खाद।
बढ़ती फसलें उपज में, खाना बड़ा सवाद।।
15
जल बहाना ठीक नहीं, बूंद बड़ी अनमोल।
बिन पानी सूखत गला, मुख बोले नहिं बोल।।
16
जल ही जीवन सब कहे, जानो जल को खास।
भोजन छप्पन प्रकार के, जल की एक पियास।।
17
जीव जन्तु जन जगत में, अपना अपना ठौर।
हमने किसको क्या दिया, दाता सब पर गौर।।
18
प्लास्टिक जन अच्छी नहिं, मत करिए उपयोग।
जबसे इसका चलन है, तरह तरह के रोग।
19
तन कपड़े पानी धुले, गूंथा पानी चून।
आंखों में पानी भरा, मिलता पानी खून।।
20
पेड़ लगाना पुण्य जन, फल खाये सन्तान।
आशीष मिलें अनगिनत, धरती का कल्याण।।
21
पहाड़ को मत काटिए, नहिं घातक विस्फोट।
धरती मात रुदन करे, लगे पहाड़न चोट।।
22
वन उपवन मत काटिए, धरती करे न माफ।
गुस्से में कम्पन हुई, करे सूपड़ा साफ।।

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“यहाँ” 

अपनी अपनी
ढपली
अपनी अपनी
ताल यहाँ
जिंदगी बन गयी
जी का
जंजाल यहां
सूखा लेकर
आते
अषाढ़यहाँ
सावन लाते
बाढ़ यहाँ
युवती रोती
घूंघट की आड़ यहाँ
धरा भी लेती
अंगड़ाई यहाँ
पल भर में
कर देती
धराशायी यहाँ
दीवारों
मकानो के
बनते खेर यहाँ
लाशों के लग
जाते ढेर यहाँ
आंखों के सामने
उजड़ता
चमन यहाँ
लाशों को नहीं
मिलता
कफन यहाँ
झूठे लोग
झूठे रसूख यहाँ
पद पैसे की
सबको भूख यहाँ
गरीबों की
उड़ाते
मस्करी यहाँ
खुले आम
हो रही है
तस्करी यहाँ
अमीरों की
चलती है
हठ यहाँ
भैंस उसी की है
जिसका मोटा
लट्ठ यहाँ
गरीबी में बच्चे
भूखे और
नंगे यहाँ
मजहब के
नाम पर
दंगे यहाँ
चमचों की
फौज यहाँ
चापलूसों की
मौज यहाँ
कौन बेचे
तरकारी यहाँ
सबको चाहिए
नौकरी
सरकारी यहाँ
कम्पयूटर का
मिसयूज यहाँ
दफ्तर में
पढ़ते न्यूज यहाँ
आदमी का
बिक चुका
ईमान यहाँ
वह बन गया
अब शैतान यहाँ
उसका मन
हो चुका
बीमार यहाँ
दुधमुंहीं
बच्चियां
होतीं हवस की
शिकार यहां
औरत की
अस्मिता
आवरु
सरेआम
लुटती यहाँ
कन्याओं के
भ्रूणों की
कोख में दम
घुटती यहाँ
हर कोई
मांगता है टिप
और बक्शीश
यहाँ।
डाक्टर वकीलों
की मोटी है
फीस यहाँ।
कविता है
अनंत यहाँ
अब लिखना
बंद कर
हनुमन्त यहाँ

“कुएँ का मेढक” 

एक दिन मैं अपने गांव में,
कुएँ से पानी भर रहा था।
मेरी नजर एक मेढक पर पड़ी,
जो कुएँ में उछलकूद कर रहा था।

मेढक के साथ में उसकी,
मेढकी भी कर रही थी सैर।
बडी़ ही आसानी से,
मेंढकी भी रही थी तैर।

मेढक शरीर से भरकम भारी था।
सुडौल छरहरी मेढकी के संग,
दोनों का भ्रमण कुएँ में जारी था।

आत्मीयता शिष्टाचार के नाते,
मैंने पूछा जी आप कैसे हैं?
कुएँ से उत्तर आया जनाब,
हम बिल्कुल आप जैसे हैं।

मैंने कहा कि भाई,
मैं पूछ रहा हूँ आपके हाल-चाल।
बोला – मालिक की दया से कुशल मंगल,
मौज – मस्ती, हम सब हैं खुशहाल।

आपसी तालमेल प्रेम और भाईचारा।
जनाब यही है सच्चा धर्म हमारा।

जलचरी जीव की बात सुनकर,
मैं रह गया हक्का-बक्का।
मेढक था अपने आप में,
बड़ा ही ज्ञानी पक्का।
मैं बोला- बात को आगे बढ़ाओ
हमें अपने बारे में और बताओ?

वह बोला बाबू जी यहॉं,
आपस में सबका सबसे प्यार है।
अपना भरापूरा परिवार है।
हमारे बडे़ ही होनहार बच्चे हैं।
जो स्वभाव से नेक और अच्छे हैं।
दादा – परदादा, पुत्री – पुत्र, पोती – पोते
लगा रहे हैं संसार रूपी कुएँ में गोते

हमने अपने स्वभाव और ईमान से
इन गांव बालों का दिल जीता है।
हमारी न जाने कितनी पीढ़ियों का
बचपन और बुढापा इस कुएँ में बीता है।

बाबू हमने दिल की गहराईयों से
गांव बालों के दिल को छुआ है।
पवित्र रिश्ते और सम्बन्धों की वजह,
अपने गांव का यह पुराना कुआं है।

अभी पिछले दिनों यहां,
मातम छा गया था।
दुर्भाग्यवश एक जहरीला,
सांप कुएँ में आ गया था

हमारे दो तीन बच्चों को ग्रास,
बनाकर मौत के घाट उतार दिया।
गांव बालों ने बाहर निकाल कर,
सांप को पीट-पीट कर मार दिया।

बाबूजी यही है सच्चे प्यार के,
पवित्र रिश्तों की सच्ची कहानी।
दर्द हमें, उनकी आँख में पानी।

मैंने कहा आप बुरा न माने
तो एक बात पूछ सकता हूं।
वह बोला – शौक से पूछिए।

क्या आपको मालूम कि हमारे यहाँ
एक मुहावरा काफ़ी चर्चित है।
इस बात से बच्चा – बच्चा परिचित है।

मेढक बोला….
मुझे मालूम है कि लोग “कुएँ का मेढक”
बोलकर एक दूसरे को ताना मारते हैं।
बाबूजी ये वही लोग हैं जो आपस में,
“बरसाती मेढक” कहकर भी पुकारते हैं।

इन्होंने तो हर किसी का दिल तोड़ा है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भी नहीं छोड़ा है।
हमारी औकात क्या जो हमें छोड़ देंगे।
संभल कर रहना, आपको भी कहीं जोड़ देंगे।

कभी-कभी बड़ा अफसोस होता,
और हमें होती इस बात से हैरानी।
कि हम कुएँ में रहें या बरसात में निकलें,
इसमें आप लोगों को क्या परेशानी।

आप लोग हमेशा दूसरों को ही आंकते हो।
क्या कभी अपने गिरेबां में भी झांकते हो?
छोटी बात को भी खींचकर बढ़ा देते हो।
दूसरे के फटे में अपनी टांग अड़ा देते हो।

हमारे दिल से पूछो, परेशान तो हम हैं ।
आपके दिए हुए, न जाने कितने गम हैं।

आप लोगों ने –
हमें हमेशा क्लेश और कष्ट दिया है।
अपने चन्द स्वार्थ के लिए,
हमारे बंश को बेवजह नष्ट किया है।

एक छोटी सी सर्जरी होने पर,
आपकी चिंता बेचैनी बढ़ी रहती है।
शल्य कक्ष के बाहर परिजनों मित्रों की,
भीड़ हाथ जोड़कर खड़ी रहती है।

ऐसा क्यों? इसलिए कि
वह आपके अपने, हम सब पराए हैं।
क्या कभी सोचा कि जिसने तुम्हें भेजा,
वहीं से हम सब प्राणीं आए हैं।

संसार में हमारा अपना खुद का वजूद है
ईश्वर का अंश हमारे अंदर भी मौजूद है।

जब हमारी आत्मा दुखी होती है,
तब दिल फूट-फूट कर रोता है।
आपका कोई दुर्घटना में मर जाए तब,
और हमारा जिंदा में पोस्टमार्टम होता है।

बाबू जी आप ही बताओ??
हमने आपका क्या बिगाड़ा है??
फिर स्कूलों की प्रयोगशाला में बच्चों ने
बेवजह हम मेढकों का पेट क्यों फाड़ा है??

यह कौन सा कानून और न्याय है।
कि हमारी जान लेकर छात्रों को पढ़ाना
किस धर्म और ग्रन्थ का अध्याय है।

आप इतना जान लो कि हर जीव
की जगत में अपनी अपनी जगह है।
उसका इस संसार में आना,
इसकी कुछ न कुछ वजह है।

सृष्टि के रचयिता ने सब कुछ,
सोच समझ कर ही रचा है।
खुद को बचा लो दुनिया की नजर से,
बताओ? उसकी नजर से कुछ बचा है।

आप कविता के माध्यम से बताएं कि,
प्रकृति के साथ मत करो छेड़ाखानी।
बहुत हो चुका विनाश प्रकृति का,
आप सभी की और न होगी मनमानी।
हम बहुत दे चुके, अब और न देंगे, मानव
जीव- जंतु, हरे – भरे बृक्षों की कुर्बानी।

भिन्न – भिन्न जातियों प्रजातियों
नस्लों को भगवान ने बनाया है।
संसार का हर जीव जंतु प्राणी,
अपने – अपने मकसद से आया है।

भगवान ने हर किसी छोटे बड़े जीव,
को यथासंभव हर वस्तु की है मुहैया।
अब ये मनुष्यों के ऊपर निर्भर है कि,
उनका प्रकृति के साथ कैसा है रवैया।

प्रभु ने जगत के प्रत्येक प्राणी के लिए,
खान-पान,मकान,समाधान और अवस्था।
मन में सोचो विचारो और समझो कि,
कितनी सुन्दर है ईश्वर की व्यवस्था।

बाबूजी हम अपना पैतृक कुआं,
छोड़कर कहीं तालाब नदी में जाएंगे।
अपनी आदत बस हम टरराएंगे,
और बेवजह अन्य बड़े जलचरी जीव,
शिकार बना कर, बड़े चाव से खाएंगे।

मेढक बोला बाबूजी…..
शायद आप मन में यही सोच रहे होंगे कि,
हम जी रहे हैं बेबसी और लाचारी के धुएँ में।
भगवान की कसम सच कह रहा हूँ आपसे
परिवार के साथ बड़ी मौज है इस कुएँ में।

न तो यहाँ किसी का भय न डर है।
आप जिसे कहते हैं कुआंँ,
मेरे लिए तो जन्नत का घर है।
किसी से गिला शिकवा नहीं
न किसी से हमें यहां फरियाद है।
मजहब कौम जाति से दूर
आपस में न दंगा फसाद है।

न कोई छोटा न कोई बड़ा है
आज तक न कोई किसी से लड़ा है।
न कोई मीटिंग न प्रस्ताव है।
न सीमा न सरहद न कोई तनाव है।
न झंडे न बैनर न कोई चुनाव है।
न फर्ज न मर्ज न कोई जिम्मेदारी।
न ताप न ज्वर न कोई बीमारी।
न धोखा न फरेब न कोई मक्कारी।
न दफा न बेवफा न कोई गद्दारी।
न आत्महत्या न बलात्कार न कोई
बेरोजगारी।
न दौलत न शौहरत न कोई जमींदारी।
न आने की खुशी जाने का गम नहीं।
कुएँ के मेढक हैं पर किसी कम नहीं ।

बाबूजी यदि आपको वह आदमी मिले,
जिसनें “कुएँ का मेढक”का मुहावरा फेका है।
उससे इतना जरूर पूछना कि,
क्या कभी तूने कुएँ में झांककर देखा है।

मेरा कुआँ और मेरा जीवन,
मेरे लिए बड़ा ही अनमोल है।
कुआँ मेरे लिये मेरा इतिहास,
और मेरे लिए मेरा भूगोल है।
मैं और मेरा जीवन ईश्वर का दिया,
हुआ अनुपम उपहार है।
बाबूजी मेरी बात सच मानिए,
कुआँ मेरे लिए खुशियों का संसार है।

—————————————————————————–

“लापरवाही” (रामायण) – भाग १

इस बात को मैंने कभी नहीं कहा,
यह तो इतिहास की गवाही है।
हिंदी शब्दकोश का एक शब्द,
जिसकी वजह से हर जगह तबाही है।
मित्रों उस शब्द का नाम लापरवाही है।

नज़रअंदाज, अनसुना, अनदेखा,
ये इसके छोटे भाईयों के नाम हैं।
मगर लापरवाही के किस्से तमाम हैं।

इतिहास गवाह है कि इस
लापरवाही ने अच्छों – अच्छों को नहीं छोड़ा है।
हमारी और तुम्हारी औकात क्या,
सीता मैया को भी अपने आप से जोड़ा है।
क्योंकि सीता मां ने देवर की बात को,
किया था नजर अंदाज, अनसुना,अनदेखा।
लाख मना करने पर भी भाभीजी,
लांग गयीं लक्ष्मण की खींची हुई रेखा।

ज्यों ही माता ने रेखा को किया पार।
फिर क्या उन्हें रोते – बिलखते,
पुष्पक विमान में होना पड़ा सवार।

वरना लंकापति रावण की क्या थी मज़ाल।
वहाँ पर था कम्बख्त लापरवाही का कमाल।

प्रभु राम जी और भाई लखन,
वन में रुदन कर खोजते रहे।
और अपनी भूल का कारण,
दोनों भाई आपस में सोचते रहे।

सीता मैया की लापरवाही की वजह से,
उनका खुद का हरण हुआ था।
प्रभु रामजी के हाथों से रावण के साथ – साथ,
ना जाने कितने राक्षसों का मरण हुआ था।

राम जी के साथ युद्ध में वानर सेना लड़ी।
सीता माँ की एक छोटी सी भूल के लिए,
उनकी वियोग में बीती पल – पल की घड़ी।

दोस्तो हमारे देश में अधिकतर व्यक्ति,
लापरवाही की बीमारी का शिकार है।
मनुष्य के जीवन का एक बड़ा विकार है।

जीवन के हर कदम – कदम पर,
आप सभी सतर्क और सावधान रहिए।
चलो यार क्या फर्क पड़ता है,
कभी भी यह बात भूलकर मत कहिए।

“लापरवाही” (महाभारत) – भाग २

रामायण की बात को यहीं छोड़ते हैं।
अब आपको महाभारत से जोड़ते हैं।
महाभारत होने का एक मूल कारण है।
इसका हमारे पास अच्छा उदाहरण है।

महाभारत में भी……..!!
अपनी जुबां के प्रति लापरवाह हो गयी,
द्रौपद नरेश की प्रिय पुत्री पांचाली।
उसने अंधे के घर अंधे ही पैदा होते हैं,
दुर्योधन को अपमानजनक बात कह डाली।

दुर्योधन ने सुना तो उसका खून खौलने लगा।
वह जोर- जोर से चिल्लाकर बोलने लगा।

इस नारी के अभिमान को करुंगा चूर – चूर
कोई मुझे बताये मेरा इसमें क्या कसूर??
यही कि अंधे पिता का पुत्र हूँ एक मात्र।
आज बन गया नारी के उपहास का पात्र।

उसे कहते वक़्त इतना भी नहीं हुआ भान।
वह कर रही अपनों से बड़ो का अपमान।

द्रौपदी की बिना सोची समझी बात पर,
वह बेचैन हो गया दिल के आघात पर,

उसकी हंसी नासूर और घाव बन गयी।
इधर सिर्फ़ युधिष्ठिर की लापरवाही से,
जुए के खेल में पांचाली दाव बन गयी।

देखते ही देखते कौरव बाजी मार गये।
दुर्भाग्यवश पांडव द्रौपदी को हार गये।

हैवानियत की हद पार हो गयी।
और मानवता शर्मसार हो गयी।
दुसाहसी दूशासन भरी सभा में,
दुखियारी द्रौपदी का चीर खींचता रहा।
द्रौपदी के पांच पांडव पतियों में,
हर पति अपनी मुठ्ठियों को भींचता रहा।
मगर सबके सब वहाँ पर नाकाम थे।
द्रौपदी की लाज बचाने के लिए घनश्याम थे।
यदि भगवान कृष्ण लापरवाही दिखाते।
भला बताओ द्रौपदी की लाज कैसे बचाते??

देखा आपने द्रौपदी की एक छोटी सी भूल,
जुबां के प्रति लापरवाही का परिणाम।
कुरुक्षेत्र में पूरे अठारह दिन तक चला था,
कौरव पांडवों के महाभारत का संग्राम।

“लापरवाही” (बढ़ती हुई जन संख्या) – भाग ३

देश में निरन्तर बढ़ती हुई जन संख्या का
हमारे सामने एक प्रश्न चिह्न और सवाल है
यदि सोचा जाए इस समस्या का मूल कारण
हमारी अपनी खुद की लापरवाही का बबाल है

जो मैं लिख रहा हूँ आप सभी देशवासियों,
इस बात को मानें या न मानें मर्ज़ी आपकी।
जन संख्या पर नियंत्रण रखना कर्तव्य है,
और मूल जिम्मेदारी है हर माँ – बाप की।

आज दुनियां के उन तमाम देशों में,
हम जन संख्या की दृष्टि से बड़े हैं।
इसलिए आज पूरे संसार में भारतीय,
चीन के बाद दूसरे पायदान पर खड़े हैं।

जगह जमीन जितनी थी उतनी ही है,
मगर आबादी लगातार बढ़ रही है।
इसलिए आज भारत सरकार के पास,
नागरिकों के लिए जमीन कम पड़ रही है।

बढ़ती जन संख्या से आर्थिक तंगी है।
उन्हीं की संतान भूखी और नंगी है।
क्योंकि आमदनी कम, खर्चा ज्यादा है।
इससे न तो देश को, न हमें कोई फ़ायदा है।

यदि हर माता – पिता की संतान कम है,
तो उनका लालन – पालन होगा अच्छा।
माताओं और पिताओं को यही सोचना है कि,
क्या फर्क पड़ता बच्ची हो, या फ़िर बच्चा।

हमारे देश में कुछ लोग नासमझ नादान।
यदि उनके घर में, कन्या पैदा हो गयी तो,
समझ लो उनके ऊपर गिर गया आसमान।
दिमागी संतुलन बिगड़ा या फिर “भेजा” फ्राई।
विचारे बेटे के लिए बार – बार करते हैं ट्राई।

बेटा नहीं हुआ, तो बेटियों की कतार हैं
पत्नियां ताने सुन – सुन कर बीमार हैं
आपकी सहमति हो या ना हो,
मेरे पास इसके उदाहरण हजार हैं ।

बढ़ती हुई जन संख्या पर हम सब को
मिलकर हर हाल में अंकुश लगाना है।
और सोये हुए लापरवाह लोगों को,
उनके हित के लिये उन्हें जगाना है।

हम और आप सभी अपने आसपास के,
लोगों को जानकारी देकर जागरूक बनाएं।
देश को, बढ़ती हुई जन संख्या से बचाएं।
और लोगों को लापरवाही से मुक्त कराएं।

दोस्तो जन संख्या की बात यहीं छोड़ते हैं
आपको हम एक नये अध्याय से जोड़ते हैं।

लापरवाही” (देश की गुलामी) – भाग ४

दोस्तो आज से हम लापरवाह नहीं,
मुद्दतों से, हमारे किस्से तमाम हैं।
हमें खुद को, खुद का पता नहीं,
मगर हम सारी दुनिया में बदनाम हैं।

कुछ तथ्यों को सोचो कि….
हमारे बुजुर्गों के दिमाग में जरूर ही,
लापरवाही का कीटाणु मौजूद था।
अन्यथा मुठ्ठी भर फिरंगियों का,
हिंदुस्तानियों के सामने क्या वजूद था??

फिरंगी भली भांति जानते थे कि कुछ,
भारतियों के दिमाग में कीटाणु व्याप्त हैं।
हम विलायती हजारों की संख्या में,
करोड़ों भारतीयों के लिए पर्याप्त हैं।

अंग्रेजों ने यहाँ पर छानबीन कर,
हमारे पूर्वजों की नब्ज टटोली।
वे अच्छी तरह से जान चुके थे कि,
भारत देश की आवाम बहुत भोली।

ईस्ट इंडिया कंपनी का तो बहाना था।
धीरे – धीरे हमारे देश में पैर जमाना था।

हमारे अब्बा, बब्बा आपस में लड़े,
कुछ लापरवाही के नशे में सो गये।
हमें भनक भी न लगी और अंग्रेज,
अपने मकसद में कामयाब हो गये।

भारत को हर हाल में, पाना और हथियाना,
उनके दिल दिमाग जुनून और जज्बे में धा।
फिर क्या देखते देखते एशिया महाद्वीप का,
विशाल भारत छोटे से इंग्लैंड के कब्जे में था।

हमारे ही देश में, और हमारे ऊपर,
चंद फिरंगी हुकूमत को चलाते रहे।
हमारे पूर्वज तरसते रहे छाछ को,
वो ऐशो आराम में मलाई खाते रहे।

मजहब,कौम,धर्म,जाति के नाम पर,
अब्बा बब्बा को आपस में लड़ाया।
कूटनीतिक अंग्रेजों ने भारतीयों को,
फूट डालो राज करो नीति को अपनाया।

भारत का दुर्भाग्य समझिए,
या फिर यों कहें कि भाग्य फूटा।
दो सौ साल की गुलामी में,
गोरों ने देश को जमकर लूटा।
बेकसूर देशवासियों पर जुल्म ढाये
हम अपने ही घर में हो गये पराये।

इसका एक तथ्य निकलता है कि,
कहीं न कहीं हम लापरवाह और नाकाम हुए
इसी भूल की वजह से हम गोरों के गुलाम हुए

गुलामी की बेडियों को तोड़ने के लिये,
भारत को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
ना जाने कितने बेकसूर बेगुनाहों को,
आजादी के लिए अपनी जान गंवानी पड़ी।

क्या हमारे मन में कभी यह विचार आया है
कि नंगी तलवारों ने रक्त से नहाया है
वीरों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर
वतन के लिए अपना लहू बहाया है।

हम सब आजादी के बाद पैदा हुए
शायद इसलिए सब कुछ भूल गये
कि इस आजादी के लिए ना जाने कितने
राष्ट्र भक्त फांसी के फंदे पर झूल गये।

फिर वह दिन आया जब आजाद हुए,
और आखिर में अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया।
लेकिन हमें अपनी अंग्रेजियत से जोड़ दिया।
अंग्रेज़ियत नस्ल के लोग अपने भारत को,
अपना भारत न समझ वतन को लूट रहे हैं।
मेहनतकश मजदूर किसानों का हक छीन कर देश विदेश में ऐशो आराम की चांदी कूट रहे हैं।

“लापरवाही” (चिकित्सक) भाग ५

मित्रों मैं कुछ पल आपका ध्यान,
अपनी तरफ़ मोड़ना चाहता हूँ।
और चिकित्सक वैद्य हकीमों को,
आपके मन से जोड़ना चाहता हूँ।

चिकित्सक और बीमार मरीजों का,
बड़ा ही अनमोल नाता और रिश्ता है।
अस्पताल में बीमार आदमी के लिए,
डाॅक्टर ही भगवान और फरिश्ता है।

दोनों के बीच विश्वास आस्था और,
पवित्रता प्रेम का अटूट बंधन है।
सबके दिलों में चिकित्सक वैद्य,
सदैव आदरणीय और वंदन है।

दुर्भाग्य की बात है कि कुछ डाॅक्टरों ने,
अपने आपको लापरवाही से जोड़ा है ।
लोगों के मन का विश्वास, भरोसा
और उम्मीद की डोर को तोड़ा है ।

जिस अस्पताल में डाॅक्टरों के ऊपर,
लापरवाही का भूत सवार होगा।
कोई हमें इतना बताए कि,
वहाँ मरीजों का बेड़ा कैसे पार होगा?

कुछ डाॅक्टरों ने लापरवाही पर,
विजय हासिल कर रिकॉर्ड तोड़ दिया ।
टीवी और अखबार की सुर्खियों में खबर थी कि,
डाॅक्टर ने कैंची को मरीज के पेट में छोड़ दिया।
अस्पताल में अफरा – तफरी मच गयी।
किस्मत अच्छी थी दुबारा आप्रेशन कर
उस विचारे मरीज की जान बच गयी।

आंखों के अस्पताल में एक मरीज,
जोर – जोर से रो – रो कर चिल्ला रहा था
विचारा बार – बार छाती पीट – पीट कर
डाॅक्टर की लापरवाही को बता रहा था

कह रहा था कि…..
मेरी जिस आंख की नजर कमजोर थी,
आप्रेशन करना था, उसे तो छोड़ दिया।
अच्छी खासी आंख का आप्रेशन कर,
लापरवाह डाक्टर ने उसे भी फोड़ दिया।

मेरी रोजी रोटी का, चौपट हो गया धंधा।
डाॅक्टर की लापरवाही से हो गया अंधा।

कुछेक डॉक्टरों की कहानी अजब,
बड़े ही गजब के हिसाब हैं।
गांव कस्बों में झोलाछाप डाॅक्टरों के पास,
आल राउंडरी के खिताब हैं ।
उनके झोले में ही, हर बीमारी के इलाज हैं ।

इनके झोले में दो – तीन तरह के ही टेबलेट,
मरीज की हर बीमारी में चल जाते हैं।
इंजेक्शन लगाने में इतने एक्सपर्ट,
कि लगाते ही मरीज दर्द से उछल जाते हैं।

मरीज की बीमारी कुछ और,
उसका इलाज कुछ और होता है।
ठीक होने की बात तो बहुत दूर,
विचारा जिंदगी भर रोता है।

यह सच्चाई है कि कुछ डाॅक्टर,
खुले आम मरीजों से लूट कर रहे हैं।
और चरित्र और पेशे को बदनाम कर,
अपनी जेबों को नोटों से भर रहे हैं।

अंग्रेजी में इन्हें डाॅक्टर तो हिन्दी में,
चिकित्सक वैद्य के नाम से जानते हैं।
भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लोग,
डाॅक्टर को भगवान का रूप मानते हैं।

डाॅक्टर को भगवान मानना भी चाहिए,
क्योंकि यह बात शत प्रतिशत सही है।
हम आप तो साधारण मनुष्य हैं,
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी कही है।

जब मेघनाद के बाण प्रहार से लखनजी,
मूर्छित होकर कोमा में थे, या कहो बेहोशी।
भगवान की वानर सेना में छा गई खामोशी।

तब विभीषण ने प्रभू राम को बताया उपाय।
सुषैन वैद्य को लंका से बुलाने की दी राय।

वैद्य जी ने आते ही नब्ज देखी और बोले,
भगवन यदि भैया लखन की जान बचानी है।
सूर्य के निकलने से पहले संजीवनी लानी है।

इतना सुनते ही पवन सुत ने भरी उड़ान।
रातों – रात पर्वत लेकर आ गये हनुमान।

संजीवनी बूटी को सूंघने मात्र से ही,
राम – राम कह कर लखन खड़े हो गये ।
तब भगवान राम ने कहा था कि,
वैद्य जी आप कद में मुझसे भी बड़े हो गये।

भगवान राम ने कहा कि वैद्य जी…..
आज से संसार के सभी मनुष्यों के ऊपर,
डाॅक्टर वैद्य हकीमों का एहसान रहेगा।
और कलयुगी समाज में आप सभी,
चिकित्सक वैद्यों का ऊंचा स्थान रहेगा।

आज डाॅक्टर विशेषज्ञों को समझना होगा,
कि डाॅक्टर भी मरीजों का जीवन दाता है।
संसार में भगवान का दूसरा रूप है डाॅक्टर,
हर मरीज आपके पास बड़ी उम्मीद से आता है।

आपका सही सुझाव और परामर्श।
इंसान के जीवन में भर सकता,
खुशियां, उत्साह, उल्लास और हर्ष।
मरीज को परिवार का सदस्य मानिए।
आप उनके दिल के हाल को जानिए।
निष्ठा लगन वफा और ईमान से,
अपने पेशेंट्स का इलाज़ करिए।
देश और अपने आप पर नाज़ रखिए।

——————————————————————————————-

“हिंदी बिंदी हिंद की” 

हिन्दी बिन्दी हिन्द की, जानो जन की जान।
लेखन में अति सरल है, बोलन में आसान।

भाषा का आदर करो, भाषा है पहचान।
परिभाषित भाषा करे, भाषा में सम्मान।

हिन्दी अनुराग असीम, प्रेमनगर की खान।
भाषा का मृदु भाव है इसको सर्वोपरि मान।

हिंदी मेल मिलाप है, जोड़े जन- जन प्रीति।
भाषा हिंदी से मिलें, सिखलाए सच्ची रीति।

कबिरा ने दोहा लिखे, छंद लिखे रसखान।
हिंदी वाणी नानका, मीरा गिरिधर गान।

ऋषि मुनि सब हिन्दी लिखे, छन्द रचाए सूर।
तुलसी ने मानस लिखा, रत्ना ज्ञान सहूर।

हिन्दी है मृदुभाषिनी, मृदु मिस्री का घोल।
अपना मानो जगत सब,नेह शबद मुख बोल।

हिंदी पढ़ना सीखिए, महिमा बड़ी अपार।
केरल में पैदा हुए, दिल्ली में व्यापार।

निज भाषा का अदब कर, मानो मात समान।
सब भाषाओं का मिलन, हिन्दी में पहचान।

खुद गुमान अच्छा नहीं, भाषा पर अभिमान।
भांति – भांति जन जानिए, भाषा एक समान।

हिन्दी सब इकजुट करे, जाने जन की पीर।
सूरत की मुस्कान यह, अँखियन समझो नीर।

भाषा दूजी नहिं भली, हिन्दी हमको भाय।
शब्दकोश हिन्दी वतन, गोरे लिये चुराय।

मातृ भाषा पढ़ो लिखो , मातृ भूमि सम्मान।
भारत से भाषा बनीं, भाषा नेक महान ।

भाषा पावन आपनी, हिन्दी है सिरमौर।
सेवा हित जन जानिए, निज भाषा पर गौर।

भाषा सबको जोड़ती, बांटे सबको प्यार।
जन भाषा से जोड़िए, जन जन में प्रचार।

हिन्दी है आदर अदब, पढ़कर बनो सुजान।
मानुष को शोभित करे, जीवन का परिधान।

भाषाएं सब अलग हैं, हिन्दी सबका रूप।
बोलन में हिन्दी लगे, समझो छाया धूप।

भाषा अवधी मैथिली, सब हिन्दी परिवार।
सब गहने हाथन सजे, हिन्दी कंठक हार।

हिन्दी को अपनाइए, चहुँदिश होय विकास।
भाषाएं सब ही पढ़ो, हिन्दी समझो खा़स।

भाषाएं सब देश की, सार एक ही जान।
उर्दू लफ्ज़ अदब समझ, हिन्दी आदर मान।

17 thoughts on “रचनाकार हनुमन्त सिंह

  1. Respectfully pranaam and salute to you,
    for these poems. Your poems are praiseworthy and respectable. “YOG DIVAS BANE MAHAAN” is the best poem for me because it has great importance of Yoga Day and a suitable meaning of Yog. 🙏🙏🙏🙏

  2. Really heart touching and besed on real facts what actually happened in our society . One of the best poem which I like to much is about the girl child.
    I am big fan of your poets
    Jai Hind Jai bharat

    1. Waw so very nice. Hanuman ji aapki rachnau ko pd kr mja hi aa gye.kya rus bhri kvitaye h aapki.lajvab. keep it up .Hm aapki saflta ki kamnaye krte h. Thanks .

  3. Really heart touching and besed on real facts what actually happened in our society . One of the best poem which I like to much is about the girl child.
    I am big fan of your poems
    Jai Hind Jai bharat

  4. यूँ ही घटा बन बरसते रहिये ।
    शाख हिन्दी की, सखा साथ बने रहिये ।
    खुला पिटारा है उजियारे आनंदमय है।
    “शब्दों की शान” है यू गरजते रहिये ।।

    1. अलग अलग विषय पर , सरल ,सुंदर रचना आप’ने बहुत ही बढिया तरीके से की है. इनमे से कुछ अनुभव ऐसे है,जिने सभी परिचित होते हैं,मगर हर कोई इतने भावपूर्ण शब्दो मे ,उसे कविता का रूप नहीं दे सकता है. आप पे देवी सरस्वती की कृपा हमेशा बनी रहें.

  5. You are great. It’s really very hard to comment on your limitless and beautiful poems..They inspire everyone who go through them once for positive change in life.

  6. आप की कविताएं उच्च कोटि की है । भावनाएं यथार्थ और सच्चाई के शब्दों मे लोट पोट होकर मानव मूल्यों और जीवनशैली की गरिमामयी प्रस्तुति प्रदान कर रहीं है। आत्म मुग्ध मनुष्य को भी मंत्र मुग्ध कर दें ।

  7. आज आपकी रचनाओं के साथ शाम गुजारी।
    मेरे यहाँ सभी साथी अधिकारी गण आपकी कविताओं द्वारा देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर कवि हनुमंत जी को धन्यबाद एवं आभार प्रकट किया ।
    जय हिंद।

  8. होली के दिन आपकी रस भारी रचनाये धायं मगन कर पड़ीं बहोत आनद आया। आसा करता हूँ कि आप की रचनौओ के ख्याति फैले, धन्यवाद
    हरवीर सिंह, होनोररी लियूटेनन्त (रेटिएड) इंडियन नेवी

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