रचनाकार शिवेंद्र मिश्र

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जीवन परिचय:

नाम- शिवेन्द्र मिश्र ‘शिव’

विशिष्ट पहचान-  विकलांग

शिक्षा- एम.ए, एम.एड.

सम्प्रति- शिक्षक

प्रकाशन- दैनिक जागरण समेत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

पता- ग्रा०+पो० मैगलगंज,जि०- लखीमपुर (खीरी) 261505

मो०- 9919881145

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‘कोरोना’ कुंडलिया

सतर्कता ही मात्र इक, कोरोना उपचार।
करो नमस्ते सभी से, रह कर शाकाहार।
रह कर शाकाहार, हाथ अच्छे से धोओ।
यदि हो संभव यार, न घर से बाहर जाओ।
कहता ‘शिव’ दिव्यांग, स्वच्छ तन मन जो रखता।
हरदम रहे निरोग, सदा जो रखे सतर्कता।01

फैला मैगलगंज में, कोरोना का ताप।
जो जन असुरक्षित रहे, झेलें वो संताप।।
झेलें वो संताप, न जिसकी बनी दवाई।
कोरोनो ने यार, शहर की नींद उडाई।
कहता ‘शिव’ दिव्यांग, न दिखता रैली-रैला
कोरोना का कहर, शहर में ऐसा फैला।02

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दोहे

अंतर्मन की पीर का, कैसे करूँ बखान।
भीषण ओला-वृष्टि से, खाक हुए अरमान।।1
कैसे ऋण चुकता करे, कैसे कन्यादान।
देख फसल की दुर्दशा, मुर्छित हुआ किसान।।2
उठी वेदना की अनल, टूटी दिल की आस।
भीषण ओलावृष्टि ने, किया फसल का नाश।।3
शीश हाथ रख सोचता, लख निज फसल किसान।
इस विपदा से पूर्व क्यों, गये न मेरे प्राण।।4
ध्वस्त हुए अरमान सब, नष्ट फसल को देख।
अब कैसे अपनी व्यथा, कृषक करें उल्लेख।।5
सबका ईश्वर एक है, बेशक नाम विभिन्न।
उसकी सब संतान है, क्यों करता मन खिन्न।।6
कर्मों के आधार पर, सुख-दुःख मिलता यार।
सत् कर्मो से हम करें, जीवन का श्रृंगार।।7
लोकतंत्र का हो सदा, भारत में सम्मान।
सच्चे अर्थो में तभी, होगा देश महान।।8
आज नही तो कल तुम्हें, होगा यह
आभास।
शायद तुमने खो दिया, जो था सबसे खा़स।।9
व्यर्थ गवाओं मत इसे, यह जीवन अनमोल।
सत्कर्मों से तू मनुज, द्वार भाग्य के खोल।।10
मानव सेवा से बडा़, अन्य न कोई धर्म।
स्वार्थ-भाव तज़कर करें, जीवन में
सत्कर्म।।11
गंगा में स्नान कर, तन-मन करें पवित्र।
दान-पुण्य सत् कर्म ही, तेरे सच्चे मित्र।।12
मोबाइल का हो गया, बहुत अहम अब रोल।
रिश्ते-नातों में रहे, विष नफरत का घोल।।13
मलहम ‘शिव’ देना लगा, देना तुम यदि घाव।
करना घावों पर नहीं, कभी नमक छिड़काव।।14
किसी हृदय में यदि कभी, चुभ जाऊँ बन शूल।
उस क्षण मेरी जिन्दगी, कर देना प्रभु धूल।।15

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भगवान आशुतोष के 21 नाम दो दोहों में

महादेव, जमदग्नि, शिव, नंदीश्वर योगेश।
सृत्वा, हरिशर,सिद्धिश्वर शेखर, भद्र महेश।।01

अंबरीश, सर्वेश, हवि ,मृत्युंजय त्रिपुरारि।
नीलकंठ अमरेश, हुत , चंद्रमौलि, दक्षारि।।02

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गज़ल

कोशिश कर ले हल निकलेगा।
पत्थर से भी जल निकलेगा।
बहुत घना तम छाया लेकिन-
निश्चित सूरज कल निकलेगा।
घूम रही है मौत सड़क पर-
पागल ही बाहर निकलेगा!
मत घबराकर साहस त्यागो-
धीरज रख, हर पल निखरेगा।
धर्म, जाति, मजहब, ना जाने,
कब समझोगे, छल निकलेगा,
अगर रहे ना, अपने घर में,
हर प्रयास निष्फल निकलेगा।
स्वच्छ सुरक्षित घर आँगन मे।
‘शिव’ ये संकट टल निकलेगा।

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