रचनाकार रामानुज श्रीवास्तव

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जीवन परिचय: रामानुज श्रीवास्तव जी का जन्म २५ जुलाई १९५८ को मध्यप्रदेश के रीवा प्रान्त के धोवखरा गाँव में हुआ था | इनके पिता का नाम श्री रामदुलारे लाल है| विज्ञान में स्नातक रामानुज जी को साहित्य और संगीत में रूचि है | इन्हे कविताएं, गजल, गीत, नवगीत, दोहा, मुक्तक, कहानी, उपन्यास, व्यंग्य, समालोचना आदिलिखना पसंद है | इनकी प्रकाशित रचनाएँ हैं – सलिला (गीत, नवगीत), रोटी सेंकता सूरज(गीत, नवगीत), मैं बोलूँगा (गजल), अभी सुबह नहीं (गजल), अनकहा सच (गजल), दस्तार (गजल), अभी ठहरा नहीँ हूँ (गजल), हज़ल के बहाने (हज़ल), और हजल बन गई(हज़ल), बस एक हज़ल चाहिए(हज़ल), माटी के बोल (बघेली रचनाएँ), चल साजन घर आपने (दोहे), जिंदगी गजल बन गई (रामानुज अनुज की चुनिंदा गजलें), जूजू (उपन्यास), राग देहाती (व्यंग्य), लेलगाड़ी (कथा संग्रह), करती है सम्वाद हवा (गजल), तीसरी आंख (गजल), बनी रात की प्रहरी शाम (गजल), बोल उठी सिन्दूरी शाम (गीत, नवगीत), लामट बेटा (कथा संग्रह), मैं मौली भाग 1 (उपन्यास), मैं मौली भाग 2 (उपन्यास), मैं मौली भाग 3 (उपन्यास), डरे हुए लोग (उपन्यास), चल जोगी आकाश देख लें (ग़ज़ल), कैसी चाहत (इश्क की अनकही दास्ताँ) उपन्यास |

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“लामट-बेटा’ (कहानी)

कौन है रे तू !! ……. सुदर्शन स्वामी घर के बाहर लगे घूरे के ढेर पर दस साल के एक लड़के को देखकर बोले।
लड़का कुछ नही बोला वह पीछे फ़टी हुई आस्तीन को ऊपर चढाये हुए कचरे से ढेर से अपने मतलब के कबाड़ छांटकर झोले में भरता रहा।
” अबे बोलता क्यों नही ?? मै तुम्हीं से पूछ रहा हूँ….बहरा है क्या?? या फिर मुँह में जुवान नहीं है??’
“ये साले कबाड़ बीनने के बहाने घर खुला मिल जाये तो हाथ की सफाई दिखाने से भी नही चूकते….सुअर की औलाद हरामजादे !! सुदर्शन स्वामी बड़बड़ाते हुये भीतर आने को मुड़े ही थे वह लड़का चिल्लाकर बोला….
“साहब गाली मत दो, मैं चोर नहीं हूं और न सुअर की औलाद हूँ… सुअर से सुअर पैदा होता है, आदमी नही, आदमी का जन्म आदमी से होता है…मैं भी आप ही की तरह आदमी के अंश से पैदा हुआ आदमी हूं।”
‘हरामखोर !! मुँहजोरी करता है, अभी बताता हूँ।” उसे मारने के लिये वे हाथ मे पत्थर उठा लिये थे।
“हां.. हां मारो न…मारो मुझे पत्थर, ….फोड़ दो कपार, मेरे मां,-बाप नही है…अन्यथा, मैं भी तुम्हारे लड़को की तरह स्कूल जाता…सूटबूट पहनकर।
“तेरे मां-बाप नहीं है तो पैदा कैसे हुआ ?? सुदर्शन स्वामी एक पत्थर उसकी ओर उछालते हुये बोले।
” ई.. ई…जैसे तुम ।” वह जीभ दिखाकर घूरे से उतर कर जाने लगा।
“रुक..रुक… अभी मज़ा चखाता हूँ”….वे हाथ मे पत्थर उठाये उसे मारने को दौड़ पड़े थे..लड़का तेजी से भाग गया था।
बाहर शोर सुनकर चन्द्रा स्वामी बाहर निकल कर पूछी….क्या है ??
“कुछ नही…एक लड़का घूरे में कबाड़ बीन रहा था, उसी को भगाया है।”
“क्यों ???”
“ये साले चोरी करते हैं..मुझे तो लगता है बाहर पड़ा राजू का टिफिन कल यही लड़का या इसका कोई साथी उठा ले गया है।”
” बिल्कुल नया टिफिन था, पिछले सन्डे ही तो मार्किट से तीन सौ में लाई थी।”
दोपहर दो बजे बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने वाली वेन आकर बाहर रुकी, अन्य बच्चों के साथ राजू भी नीचे उतरा और घर की तरफ दौड़ गया।
“मम्मी..मम्मी मिल गया..ये देखो, कल स्कूल में छूट गया था, मेम ने आज दिया है।”
“अच्छा !! चलो ठीक हुआ नया टिफिन था…मेरा तो कल से पेट जल रहा था…तुम्हारे पापा नाहक में कबाड़ी लड़के को डांट रहे थे। सब्जी का छिलका डस्ट बीन में रखती हुई चन्द्रा स्वामी खुश होकर बोलीं।
वह पीठ में थैला लटकाये सड़क के दाएं-बायें झांकता हुआ धीरे-.धीरे बढ़ रहा, जहां भी उसे कागज के गत्ते, प्लास्टिक के टुकड़े, या लोहे से पीस दिख जाते थे, उसे उठाकर पीठ में लदे थैले पर सटका देता था। उसे मोड़ पर हैंड पम्प दिख गया…प्यास लग आई…”कमबख्त जरूरत भी क्या चीज है, सामने संसाधन देखते ही बढ़ आती है, वह हैंड पम्प तक पहुँच गया था…दो औरते पहले से ही वहां मौजूद थी, उन्होंने ऊपरी वस्त्र नहीं पहन रखा था, लज्जा विंदु को वे साड़ी के छोर से ढँके थीं। जो औरत हैंडपम्प ढील रही थी, उसका वस्त्र सरककर शरीर के मध्य में आ अटका, दोनो कुच स्वतंत्र आंदोलित हो रहे थे…ये दृश्य क्षणिक था, उसने तत्काल साड़ी व्यवस्थित कर ली थी।
तभी उस औरत की नज़र उस पर पड़ी जो पात्र में पानी भर रही थी…वो जोर से खीझकर बोली….
“कमबख्त क्या देख रहा.खड़ा-खड़ा।”
“हैंड पम्प की ओर इशारे से उसने प्यास लगी होने का संकेत दिया, जो नाकाफ़ी था, उस औरत ने यथार्थ से कुछ विलग समझा… वह भी वहीँ पड़े पत्थर को उठाकर मारने दौड़ी…वह वहां से भी नाशाद होकर द्रुत गति से आगे बढ़ गया।
“देखा तुमने !! कल का लौंडा, अभी से”……जाते,-जाते वह इतना ही सुन पाया था।
उसे याद आ रहा था, उसकी माँ जब मरी थी, तब वह चार साल का था। इसी तरह के सूखे उत्तलद्वय से चिपक कर तो वह रोया था….बहुत रोया था, आंखों का सरोवर रिक्त कर दिया था उसने…उसकी प्यास मर चुकी थी, धूप तेज थी, सर के ऊपर कुछ ज्यादा तपन महसूस हो रही थी..उसे लगा आज सूरज दादा सर ऊपर ही रोटी सेंक रहे हैं…उसने माथे के रास्ते चू आये पसीने को हाथ से पोंछकर सर को हल्का झटका दिया, कुछ बूंदे जमीन में पड़कर धूल की प्यास बुझा गयी थीं। अब वह मुख्य सड़क में आ गया था, थोड़ा आगे सीधा चलने पर एक खाली मैदान फिर मोड़ और मोड़ मुड़ते ही चार कदम आगे, संकरी गली में, कंचू सेठ का कबाड़-स्टॉक…यही तो उसकी मंजिल थी।
वह खाली पड़े मैदान के पास चलते-चलते ठिठक गया…कचरे के ढेर पर आराम से पसरी हुई मादा सुअर बच्चो को दूध पिला रही थी, उसने उंगली गिनकर हिसाब लगा लिया कि बच्चे आठ हैं, मादा बड़े दुलार से उनके पेट की भूख मिटा रही थी…उसे अब बिसरी हुई प्यास के साथ भूख भी लग आई थी…उसे सुअर शिशुओं की तक़दीर से रश्क हो आया था…फिर उसे न जाने क्या सूझा की आकाश की तरफ दोनो हाथ उठाकर जोर से बोला…..”ऊपर आकाश में यदि कोई है तो मेरी गुज़ारिश सुन ले, अगले जनम में मुझे आदमी की नहीं, सुअर की औलाद बनाना।” अब वह दौड़ पड़ा था…कुछ ही पल में वह कबाड़ की दूकान के सामने आ गया।
“हांफ क्यो रहा है रे !!” देखते ही कंचू सेठ बोला।
कंधे में लटका थैला उतार कर जमीन में रख दिया और वह धम्म से जमीन बैठ गया पर कुछ नही बोला, वह अब भी हांफ रहा था..साँसे तेज चल रही थीं, शायद साँसों को सामान्य हो जाने के बाद ही उसे बोलना उचित लगा हो।
“अच्छा !! थैला वजनी था, इसीलिये…. ठीक है थोड़ा सुस्ता ले फिर रोटी खा लेना, डिब्बे में रक्खी है, मै जुमे की नमाज पढ़कर आता हूँ।” टोपी सम्हालता हुआ कंचू सेठ बाइक की तरफ बढ़ गया था।
कंचू सेठ जा चुका था, लेकिन वह अब भी उसी जगह पर बैठा हुआ था, सांसो की गति सामान्य हो गयी थीं, उसे थोड़ी राहत महसूस हुई… वह आँखे बन्द करके थोड़ा आगे की ओर अब झुक गया था…हल्की सी नींद की आहट पाकर वह जमीन में पसर कर लम्बा हो गया ….तभी कोई अदृश्य शक्ति उसे अतीत की तरफ खींचकर ले गयी, वह साफ देख रहा है कि नदी का किनारा है, लेकिन नदी जल विहीन है…तट में खड़े वृक्ष ठूँठ की शक्ल में भयावह अट्टहास करते हुए उसके मां के जिस्म को एक टक घूर रहे हैं…एक आदमकद सपाट चबूतरे पर उसकी माँ अचेतावस्था में निर्वस्त्र पड़ी है, तन के रंगीन वस्त्र बदरंग हो चीथड़ों की शक्ल में एक काले बदशक्ल ठूँठ की सूखी टहनी पर लटके हुये किसी विशाल पक्षी के डैनो के मानिंद हवा में लहरा रहे हैं…मां के एक पांव की चप्पल सीधी तो दूसरे पांव की उलटी हुई चबूतरे से दूर पड़ी थी और वह उसकी छाती से चिपका हुआ रो रहा है, सामने एक किताब रखी है, जिसमें सिर्फ पांच पृष्ठ हैं, वह स्कूल तो कभी गया नहीँ था, लेकिन जिस लिपि में पन्ने लिखे गये है, उसके अक्षरों की स्याही को वह पहचान रहा है, बखूबी पढ़ और समझ भी रहा है।
प्रथम पेज में बड़े-बड़े स्याह अक्षरों से लिखा था…”तुम इंसान की औलाद हो, लेकिन तुम्हारे जनक का पता तुम्हारी माँ तक को नहीं है..वह तुम्हे कैसे और क्या बताती, वैसे भी जब तुम थोड़ी-बहुत समझने-सुनने लायक हुये तब वह परलोक गमन कर गयी।”.
हवा के सरसराहट पाकर दूसरा पृष्ठ सामने आ गया , उसमें लिखा था, “तुम्हारा जन्म गांव में हुआ है, शहर में तुम्हारी पैदाइश मुमकिन नही थी।”
इसी तरह से पृष्ठ दर पृष्ठ खुलते गये, तीसरे में लिखा था….”यह बताना सम्भव नहीं है कि किसके योग से तुम गर्भ में आये, तुम्हारा वास्तविक पिता कौन है। वे किस मजहब के थे, यह भी बता पाना सम्भव नही है। वे इंसान की शक्ल में हिंसक पशु थे…इसलिए उनकी शक्ल की परत तुम्हारे मासूम चेहरे पर चढ़ा कर दुनिया से सामने पेश नहीं किया जा सकता था, इससे एक पवित्र नारी आत्मा का अपमान होता।
इसलिए तुम्हारी शक्ल उनसे जुदा बनाई गई है, तुम्हारा मजहब भी अलग से तज़बीज़ किया गया है, जिसे कालांतर में इंसानियत का महजब कहा जायेगा।
चौथे पेज की इबारत देसज बोली में कुछ यूँ लिखी थी…” जिसके पिता के बारे में किसी को कुछ भी जानकारी नही होती है, वह सन्तान “लामट”
कहलाती है, इस लिहाज से तुम ‘लामट बेटा” हो..तुम्हें यह नाम अगर पसन्द नहीं है तो नाम बदलने की तुम्हें अनुमति है।
पांचवा पृष्ठ रिक्त था, उसमें कुछ नही लिखा था…सिर्फ फक्क कागज पर कलम की आकृति का स्पष्ट उभार नज़र आ रहा था। वह कलम की ओर एकटक देख ही रहा था कि उसके कानों में कराहती हुई आवाज़ सुनाई दी…”उठ बेटा लामट !! कलम उठा, लिख ले मनचाही तकदीर।” यह आवाज़ उसके स्वर्गीय मां की थी।
वह अकबकाकर विद्युत गति से खड़ा हो गया, लेकिन उधर कुछ नही, न वो चबूतरा, न वो ठूँठ न नदी…सब कुछ अदृश्य…यहाँ तो उसके और कबाड़ के ढेर के सिवा कुछ नही था… वह जोर से चिल्लाया…” हां.. हां… मै “लामट हूँ… मेरा नाम “लामट बेटा ” है। यह नाम मै स्वीकार करता हूँ…मैं अपनी तकदीर स्वयं लिखूँगा, जरूर लिखूंगा, ऐसी तकदीर जो आज तक विधाता ने किसी भी इंसान की नही लिखी होगी।
वह चीख-चिल्लाकर बेहोश हो गया था। उसके आस-पास बस्ती-बस्ती कबाड़ बीनने और कंचू चाचा की दूकान में लाकर बेचने वाले कबाड़ी लड़के जमा हो गये थे। कंचू चाचा भी जुमे की नमाज़ अता कर मस्जिद से लौट आये थे…वे उसके मुँह पर पानी के छीटे मारकर होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। एक कबाड़ी लड़का अपनी कमीज़ हैंड पम्प के पानी से गीली कर लाया था वह अब उसका मुँह पोछ रहा था। लेकिन उसकी बेहोशी टूटने का नाम नही ले रही थी, उन लोगों ने अपनी सूझ से हर सम्भव उपाय किये लेकिन उसे होश में नही ला सके।
“इसे अस्पताल ले जाना ठीक रहेगा।” कबाड़ बीनने वाले लड़के ने सुझाव दिया।
” नहीं..नहीं इसे अस्पताल ले जाना वाज़िब नहीँ होगा, पुलिस केस बनेगा..कौन है ?? कहाँ काम करता है ?? कहाँ का रहने वाला है, इसके मां-बाप कौन है ?? सब तो पुलिस पूछेगी।” घबराये हुए कंचू चाचा बोले।
“इसमे छिपाने वाली बात कौन सी है ?? बता देना।”
“और तो ठीक है लेकिन इसके घर का पता, इसके मां-.बाप का पता मुझे नही मालुम… क्या बताऊँगा पुलिस को।”
“गजब करते हो चाचा ये तुम्हारे पास चार-पाँच साल से है, तुमने इसका ठौर-ठिकाना पता करने की कोशिश नही की ??”
“की थी लेकिन किसी ने बताया नहीं… इसे भी कुछ नही मालुम, यह तो मुझे नदी के तीर वाले क़ब्रिस्तान में रोता हुआ मिला था, रहम ख़ाकर इधर काम पर रख लिया।”
“रहम ख़ाकर….वाह चाचा तुम और रहम…क्या बात कही है।”.बेहोश पड़ा हुआ वह लड़का कुटिल हँसी के साथ जमीन में पड़े-पड़े ही बोला।
“अरे !! ये तो होश में था, देखा कमीने को…. कैसे सब को बेवकूफ़ बना दिया।”कंचू चाचा पैर की उंगली उसके पेट मे गूलते हुये बोले।
“चाचा तुम उमर में मुझसे बहुत बड़े हो, इसलिये तुम्हारी बात का जवाब नही दूँगा…पर मै अब इधर नही रहूँगा।’ यह कहता हुआ वह सीधा तनकर खड़ा हो गया।
“अच्छा !! बता तो सही किधर को जायेगा ??
वह मेघाच्छदित आकाश की ओर इशारा कर के बोला….”उधर”
“तेरा बाप है क्या उधर ?? देखा साले की अकड़ “रस्सी खाक हो गई, लेकिन ऐंठन बरक़रार है… हुँह”… हिकारत भरी नजर ड़ालकर कंचू चाचा बोला।
“उधर मेरा भी बाप है और तुम्हारा भी बाप है चाचा, और इन सबका भी।”
बहुत-बहुत समझाने-बुझाने के बाद भी “लामट बेटा” रुका नही, वह निकल गया था भीड़-भाड़ वाली सड़क की तरफ अपनी हाथों से अपनी मुकद्दर लिखने | ————— १२ अगस्त २०१९ |

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