रचनाकार राजेश चौबे

सागर मध्यप्रदेश |

इक दरोदीवार है, सजदा जहां पूजा जहां ।
मां जहां है ,उस जगह से अलहदा जन्नत कहां।
मुझको नहीं मतलब है, मंदिर से या मस्जिद से।
मेरी मां की गोद से प्यारा कोई मज़हब कहां।
राम ,ईसा या नबी सब नफरतों के साथ है।
एक मां ही है ,जहां है ,प्यार है बरकत वहां।
तोड़ दो मस्जिद ,ढहा दो मंदिरों को ,गम नहीं।
मां की छाया में समाया है कोई ईश्वर यहां।
मैं कहां डरता हूं, श्रापों से या फतवों से।
मेरी मां के सामने, ईश्वर कहां,अल्ला कहां?——– ३१ जुलाई २०१९ |

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गांव के बाग का हर फूल मुबारक हो तुम्हें,
मेरे वतन की सरजमीं की धूल मुबारक हो तुम्हें।
गंगा कहां? यमुना कहां? मैं जानता नहीं उनको,
गांव की छोटी नदी का कूल मुबारक हो तुम्हें।
जहां मां है मेरी बस वो मेरा मादरेवतन,
गांव मेरा देश है ये देश मुबारक हो तुम्हें|
मुझको नहीं मतलब है गीता के कुरानों से,
होरी रहे, धनिया रहे गोदान मुबारक हो तुम्हें|

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“मृतप्राय पड़ी”

२७ जुलाई २०१९ |

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