रचनाकार रश्मि रानी

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जीवन परिचय: रश्मि रानी जी बिहार प्रदेश के पटना शहर की रहने वाली हैं | इन्होने गंगा देवी महिला महाविद्यालय पटना से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है | रश्मि जी का जन्म १ मार्च १९७८ को हुआ, पेशे से यह एक अध्यापिका हैं | इनकी रचनाएं पढ़ कर इनके विराट व्यक्तिव का पता चलता है, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं |

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बेचारी कविता
औंधे मुँह पड़ी थी ,
शराफत के बाजार में,
सिसक रही थी भरे दरबार में।
तभी किसी ने आवाज लगाई ,
क्या चल रहा मन में ?
क्या बोलती कविता !
कितनी आग लगी थी तन मन में!
उसने फिर कहा _
क्या शिक्षा मिली ?
कुछ तो बोलो मुँह तो खोलो !

कविता ने औंधे मुँह पड़े होने की सफाई दी !
और तभी कहानी ने अट्हास लगाई।
ग़लती तुम्हारी ही है ,
हर बार तुम्हीं ग़लत कहलाओगी ।
देख लो भाव अपने ,
देख लो भाषा अपनी ,
किस किस को समझाओगी ?
वो कहानी है कद्दावर !
तुम्हारी बात सुनी न जाएगी ।
जो वो बात कहेगी
वही समझी जाएगी …
तुम्हारी आवाज नक्कारखाने में
तूती की तरह गूंज कर
रह जायेगी।
तभी इक आवाज़ कानों में टकराई…
ओ मानिनी उठ!
बात है आनी- जानी
चल छोड़ राग तू अपना
अक्ल तेरी घुटनों में
तूने है ना बदलने की ठानी।

भरी पूरी दुनिया में,
कितनी थी वो निपट अकेली
घायल था अंतर्मन ,घायल पड़ी थी चेतना
ये बात किसी ने न जानी।

तभी स्नेहिल सा स्पर्श उसने पाया
भरी आँखों से किसी ने सहलाया
सामने थी छोटी बहना “मुक्तक”
कहा उसने __
दिल छोटा न कर
जलने वाले जल- जल मरेंगे
मैं भी तुझमें ही हूँ,तेरा मन सुंदर
तू दुनिया की सुंदरतम रचना…
क्यों घुटे तू अंदर ही अंदर।

तभी ग़ज़ल ने आवाज़ लगाई …
ओ मेरी प्यारी बहना
तुम छंदमुक्त सी सुंदर रचना
थोड़ा रदीफ़ थोड़ा सा काफ़िया मिलाना …
मन के भावों को लिख जाना
ग़ज़ल बन गुनगुनायी जाओगी
स्वर लहरी सी लहराओगी।

क्षणिकाएं भी कब पीछे रहती…
पल पल मेरे मन को पढ़ती
कहा …
न सुख ,न दुख
न सुकून ,न दर्द !
सब सम भाव से
समाहित तुझमें
इतना क्या कम है
एक पूरी नज़्म लिखने के लिए।

अब
शंकाएं तर्क- वितर्क
गलतफहमियां!
सहमे एहसास !
कितनों से था राब्ता उसका
सब को परे हटाई
संग अपनों को पा कविता मुस्काई
सधे हुए से शब्द थे इतने
नयन समझें नयन बोलें
कम शब्दों में मन के भावों को
जन -जन तक पहुंचाई।
पूरे विश्व पटल पर छाई
कविता सबके मन को भायी।

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सांस- सांस में आस बची है
मौन हुई अब वाणी है
सबकी अपनी अलग व्यथायें
सबकी अपनी अकथ कहानी है।

जिस सर पे सजना मौर है
वो बन रहा काल का कौर है।
कैसे लिखूँ अब कोई
अल्हड़ सी प्रेम कहानी
जब मर रही पल- प्रतिपल जिंदगानी है।

अक्षर -अक्षर अश्रुपूरित हैं,
शब्द- शब्द आवाह्न है।
अब तो उद्धार करो प्रभु
करबद्ध प्रार्थना स्वीकार करो
सन्नाटों और चीखों में गुजर रहा,
आहों में पसरा ये जीवन है।

कितनी मांग कितनी गोद हुई सुनी है।
हुई काजल से भी काली वेदना
और आँखों से बरस रहा सावन है।
मेरी कलम अब मौन हो रही
सूख रही अब स्याही है।

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“तुम अनहद मैं गूंज”

तुममय हो गयी हूँ
तो तलब भी कहाँ तुम्हारी
तुम रंग
मैं रूप!
तेरी आँखे
मेरी नजर !
तेरे कंठ
मेरे स्वर !
मैं नींद
तुम ख्वाब!
तुम शब्द
मैं अर्थ!
तुम अनहद
मैं गूंज!
तुम बादल
मैं बरसात !
तुम मिट्टी
मैं सोंधी खुश्बू!
तुम तरुवर
मैं छाया!
तेरा साथ
मेरा सफर !
तेरा यकीन
मेरी कुल जमा पूँजी
ख़र्चती रहूंगी
तुम पर ताउम्र! ……….. जयश्रीकृष्णराधेराधे 🙏🙏 —————–०२ अगस्त २०१९ |

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“बस समेटना चाहती हूँ”

बस समेटना चाहती हूँ
अपने शब्दों में,
उन बेतरतीब ख्यालों में
बारहा आते हो …
बेखटके, बेअन्दाज !
तब
बिखरती हैं ख्वाइशें
किर्च होती हैं उम्मीदें
बेख्याली में भी
बेतहाशा ,बेइंतहा
बेबस सा
तुम्हारा अक्स दिखता !

बन्द कर देती हूँ किताबों के
पन्ने ,हर सफ़हे में भी
तुम ही दिखते हो …

सुनो ! मत आना यूँ
बेखौफ!
बेधड़क !बेपरवाह! बेपर्दा! —————————–०२ अगस्त २०१९ |

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