रचनाकार धर्मेन्द्र कुमार “धरम”

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जीवन परिचय: धर्मेन्द्र कुमार “धरम” बिहार प्रदेश के वैशाली के रहने वाले हैं, इनका जन्म १२ नवंबर १९९० को हुआ था | इनके पिता श्री सोनू राय और माता का नाम स्व.फूलपरी देवी है| इन्होने बी.एस.सी. में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है| पुस्तकें पढ़ना, कविता /गजल सुनना/लिखना पसंद है|

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“धारा 370 पर आधारित मुक्तक”

हटा है धारा 370, आओ खुशियाँ मना ले हम ।
हिमालय से समन्दर तक, अखण्ड भारत बना ले हम ।
फूलों के गुलिस्ताँ में कभी नफरत न खिल पायें।
मनालो होली तुम मेरा, तुम्हारा ईद मनालें हम।

वो जो कश्मीर की घाटी में, बारूदें बिछाता है ।
हमारे देश को नफरत के शोलों में जलाता है।
उसे कह दो, यह भारत है नया, खामोश हो जाए।
सिपाही एक के बदले में दस सिर काट लाता है।

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“बिहार पृथ्वी दिवस पर आप सभी को समर्पित कुछ पंक्तियां”

हरा दरख्त न सही, खुश्क घास रहनें दे।
धरती के तन पर, कुछ तो लिवास रहनें दे।।

गुजर रही है आज, जद्दोजेहद में ज़िन्दगी।
आने वाले कल की, थोड़ी आस रहने दे।।

सड़क,भवन,कारखाने,चाहे जितनी बनाओ।
तुलसी ,पीपल और थोड़ा पलास रहने दे।।

बेघर न कर इन्हें, बड़ी तोहमत लगेगी।
इन परिन्दो का बाकी आवास रहने दे।।

मत काट इन्हें ,वर्ना पछताओगे कल “धरम”।
हमारी साँसों की साँस में कुछ साँस रहने दे।। ————————-०९ अगस्त २०१९ |

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“भारतवर्ष अखण्ड होगा”

शेर शिवाजी के सिंहों ने,
फिर से आज दहाडा़ हैं।
कश्मीर में गूँज रहा अब,
जय भारत का नारा हैं ।

राष्ट्रगान का नाम नहीं बस,
कलमा गाया जाता था।
गैर झण्डे के साथ खड़ा ,
तिरंगा शरमाता था ।

सदियों से इस गुलशन में,
नफरत का बीज उपजता था।
फूलों की क्यारी में भी ,
बंदूकें उगा करता था ।

कश्मीर की मनमोहक यह,
घाटी गैर सी लगती थी।
फूलों का आँगन, बारूदों,
की एक ढ़ेर सी लगती थी।

उदित हुआ नवसूर्य देश में,
नया सवेरा लाएँगा ।
नील गगन में कश्मीर के ,
तिरंगा लहराएँगा ।

होली में गुलाल उड़ेगा,
हर गलियों हर राहों पर।
दीप जलेंगें दिवाली में ,
लाल चौक , चौराहों पर।

कश्मीर की सेबईयाँ भी,
भारत में घर घर जाएंगी।
बेशक सलमा,श्रीकृष्ण को,
राखी बांधने आएंगी ।

राष्ट्रवाद का बीज कश्मीर ,
में अंकुरित हो जायेगा ।
घाटी का बच्चा -बच्चा तब,
वन्दे मातरम् गायेगा ।

हम कश्मीर की घाटी में,
जब प्रेम की खुशबू बिखरेंगें।
जहाँ सेअफजल निकला था,
अशफाक वहाँ से निकलेंगे।

सरदार पटेल के सपनों का,
सूर्य ‘ धरम ‘ प्रचंड होगा ।
उत्तर से दक्षिण तक अपना,
भारतवर्ष अखण्ड होगा । —————– ०७ अगस्त २०१९ |

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“चाहिए”

चमन के हर सुमन में,एक प्रीत होनी चाहिए।
हर भँवर के अधर पर , गीत होनी चाहिए ।

खान-पान, बोल -चाल, लाख भिन्न हो मगर,
मनुज का मनुज सा ही, रीत होनी चाहिए ।

जात-पात की दीवार ,तोड़कर सब एक हो।
न कोई ब्राह्मण, न ही दलित होना चाहिए।

सबका सम्मान हो, समान अधिकार हो,
देश में न अब कोई, शोषित होना चाहिए।

क्षेत्रवाद भाषा-भाषी, और धर्म के नाम पर,
देश को न फिर, खण्डित होना चाहिए।

नर – नारी हैं जहाँ के, दो पहियों की तरह,
बालक संग बालिका, शिक्षित होनी चाहिए।

तोड़ दो दीवार को, दहेज दानव मार दो,
मनचाहा सबका, मन मीत होना चाहिए।

लाख मतभेद हो, बात व्यवहार में,
प्रेम ह्रदय में, प्रतीत होनी चाहिए।

हिन्दू-मुस्लिम,सिक्ख और,ईसाई हर दिल में
जन – गण – मन संगीत होनी चाहिए।

पार्टी – सत्ता से परे, हो बात राष्ट्रहित की,
देश में “धरम” यही , राजनीति होनी चाहिए। ——————- ०३ अगस्त २०१९|

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” मनचली ”

चंदा या सितारा,
फूलों की कली |
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली |

घने बाल जैसे,
हो काली घटा |
कमल सा नयन,
और गुलाबी छटा|
हँसदे जो अगर,
चमके बिजली ।
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली।

चमन में नये,
सुमन खिल गये |
तन्हा था डगर,
हमसफ़र मिल गये|
उमंगों के गगन,
उड़ चली तितली |
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली।

मनमें हैं ललक,
देखू एक झलक |
देखता ही रहूँ,
मैं कयामत तलक|
सुंदरता से सुंदर,
भलों से भली |
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली।

सुन साथी मेरे,
अपने सातों फेरे |
और सातों वचन,
जीवन रौशन करे |
खुश रहना सदा ,
तू हमारी गली ।
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली।

खुशियों से भरे,
अपना जीवन सफर |
आँगन में बसे,
सुखों का शहर ।
भँवरा हैं “धरम”
तू मकरंद में ढली।
जन्नत की परी,
सी मेरी मनचली। ———— ०३ अगस्त २०१९ |

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