रचनाकार जय श्री सैनी

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जीवन परिचय: शिवगढ़ रायबरेली के रहने वाले रचनाकार जय श्री सैनी का जन्म १८ अगस्त १९९४ को हुआ| बी.टेक. में स्नातक की उपाधि हासिल करने वाले जय श्री सैनी जी प्राथमिक विद्यालय कुकहा रामपुर में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं|

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माँ” 

जो लाखो कष्टों को सहती और खुश रहती है सहने को ,

जो गीले तल पर खुद सोयी तुझे सूखे पे लिटाया सोने को ,

जो केवल तुझसे ही हारी ,हरा के सारी दुनिया को ,

वो माँ होती है साहेब क्यों छोड़ा उसको रोने को ,

जब जब तेरी आँखों में आंसू की बूदें आई थी ,

ममता के ही सागर में वो बूंदें जा के समाई थी ,

जब जब तेरी रूहो में शूलो का साया आया था ,

माता के ही कर ने साहेब उनको दूर हटाया था ,

जिसने अपना रूप बिगाड़ा तेरा रूप सवारने को ,

वो मां होती है साहेब क्यों छोड़ा उसको रोने को———-०४ सितंबर २०१९

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 “बचपन” 

पागल पागल एक हो गये ,मिलकर कर दिए पागलपन ,

दिल की बात है सायक फिर याद आ गया वो बचपन ,

साईकिल की वो रेश ,घंटियों की टनटना टन,

महफ़िल वाली शाम गली में घूमता तन मन ,

किताबी बोझ तले दबकर, मनाते छुट्टियाँ खुलकर ,

शरारते निगाहों की , देखना चाहे उसे जी भर ,

गानों के बिखरे बिखरे शब्द हौसला देते थोड़ी उमंग ,

अन्ताक्षरी का खेल ,दिवाली होली के वो रंग ,

गायब कहाँ हो गये सायक वो लेकर खुशियाँ संग ,

जिनके पागलपन ने फिर याद दिलाया था वो बचपन ,———-०४ सितंबर २०१९

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रुको नहीं तुम जरी रखो ,संघर्ष से संघर्ष करना ,

बहुत निकट आ खड़े हुए हो ,अब चंद पग ही है चलना ,

थोडा धुंधल कुहासा है ,थोडा शख्त पवनो का बहना ,

बस रवि प्रताप आते ही ,प्रकाशित होगा सुन्दर सपना ,

कुछ और शर्वरी में जलकर सायक, कर दो खुशियाँ अर्पण ,

बस होते ही भोर मिलेगा वापस खुशियों का वो दर्पण ,

समस्याएं मूल चुनौती है ,दूर नहीं इनसे भगना ,

बहुत निकट आ खड़े हुए हो, अब चंद पग ही है चलना ,

एक हार से कुंठित होकर शांत नहीं बैठा करते ,

कई चोट सहकर ही पत्थर भी भगवान बना करते ,

हार मानने वालो को कभी शूरवीर नहीं कहते ,

कर्मभूमि में संघर्षरत नर अक्सर इतिहास है रचते ,

असफताओं के अग्निकुंड में कुछ और नींदों की आहुति देना ,

बहुत निकट आ खड़े हुए हो , अब चंद पग ही है चलना | ———-०४ सितंबर २०१९

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