रचनाकार गोविंद कुमार

( स्नातक), सीतामढ़ी बिहार |

– मैं एक गाँव हूँ –

मैं एक गाँव हु,
मुझे मत टटोलो कही और
मै तुम्हारे रग-रग में बसती हूँ
अपने हरियाली के गुमान से इतराकर,
फिर जोर-जोर से हँसती हूँ।
झूमती नाचती बेलों को देखकर,
मैं मदमस्त सी रहती हूँ।
फिर भी बिना एक पल सोचे समझे,
मुझे सौंप देते हो उन चंड नेताओं के हाथ में।
जो क़त्ल का इलज़ाम लिए,
भ्रमण करते है,तुम्हारे साथ में
जो मेरी संवेदनाओ को बिना परखे,
सौपते है उन ठेकेदारो के हाथ में
मुझे डर लगता है,जब कोई तुमसे ,
विकास की व्यर्थ बातकरते है,
जो मेरी प्रकृति को विलुप्त कर,
मेरे दिल को आहत करते है
जो मेरी खामोसी की क़द्र ना करके,
अपने कमरे में राहत करते है।
शायद मेरी यह दशा तुम समझ सको
मेरी संवेदनाओ को परख सको
मैं जेठ की दोपहरी धुप में पीपल की छाँव हूँ
क्योंकि मैं एक गाँव हूँ | ———————— २३ जुलाई २०१९ |

आज रोशन हुआ है चाँद फिर पराई आग से,
खुद से रोशन होता तो ,जल गया ना होता |
लिबास हमने भी काले पहन रखे है,
सादे होते तो दाग, लग गया ना होता |
मौत का सामना हुआ था मेरे ज़र्फ़ से,
ना करते तो मै, मर गया ना होता |
घर को जुगनुओं से सजाता हूँ रात भर,
ना सजाता तो घर, उजर गया ना होता |
बेमोल वक़्त की घड़ियों का हिसाब कौन रखे,
गर गिनता एक-एक दिन, तो गुजर गया ना होता |
बड़ा एहसान है लोगों का यूं तो मुझपर कई
गर चुका ही देता, तो उबर गया ना होता |

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