रचनाकार उषा कुमारी

कंकड़बाग, पटना, बिहार |

मसाले

मसालों के सौदागर,
तौल दे थोड़ी सी,
पाँच डाढ़ लग्न वाली हल्दी,
पाव भर खोइंछे का जीरा,
नज़र उतरने को पांच मिर्ची,
मेथी, सरसों की गर्म तासीर,
धनिये की शीतलता,
काली मिर्च का तीखापन,
लौंग, इलायची, दालचीनी,
कवाबचिनी, स्याह जीरा,
की भीनी-भीनी खुशबू
केसर के धागे भी थोड़ी सी
ताकि रसोई के साथ
जीवन भी मसालों सा
कभी तीखी,
कभी चटख
कभी शीतल,
कभी गर्म,
कभी सुगन्धित
कभी खुशबूदार,
बना रहे आजीवन
संतुलित जीवन
बिटिया का || ——– २२ जुलाई २०१९ |

दंश – भाग-1

मंगरु शीतलहरी में खरिहान में धान के बोझे की रखवाली पर था। शीत से तन- बदन जमा जा रहा था पर आँखे अंगार बनी हुई थी ,मन-मस्तिष्क तैयार न था इस रखवाली को।पर मंगरु की जात ही ऐसी है कि कर्ण की भाँति अपना दर्द समेटे मालिक को गहरी नींद सुला सके।आजकल गाँव में आपसी दुश्मनी में एक दूसरे के खरिहानों में धान के बोझों में आग लगा दे रहे थे।बस इसलिए जमीन मालिक अपने मातहतों का काम बढ़ा दिए थे। मंगरु की सात बरस की बेटी है ,औरत दुबारा पेट से पुर दिन में थी और मंगरु की इच्छा थी वो इस वक्त घर पर रहता, पर चाहने से क्या ?
नींद तो रात भर आईं नहीं ,उगते शुक्र को देख मन आश्वस्त हुआ कि अब किरण फूटेगा।बस इसी संतोष में नींद से बोझिल आँखे झपक पड़ी। वो मानों स्वप्न देख रहा था कि बिटिया नंगे पांव दौड़ी चली आ रही है ।पर बिटिया सच में नंगी पांव ही अर्द्ध नग्न कपड़ों में भागती हुई आई थी ,पिता को जगाने के ख्याल से मासूम ठंडे हाथों से बाबूजी के चेहरे को स्पर्श किया था।
मंगरु चिहुँक कर उठ बैठा….
सामने बिटिया को देख कहा….
अरे का होएल?
हेतना भोरे-भोरे कहाँ?
बिटिया कहती है…
मईया बड़ी दरद से बेचैन है। घरे दादी,चाची और दादा सबे जगल है राते से।
बाबूजी! घरै चला न!
मंगरु बिटिया की नन्हीं हथेली को अपनी हथेली में दबा तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ा।पूरब में ललाई तो थी पर अभी रवि की सवारी सफर में ही जान पड़ती थी। दक्खिन टोला का कलेसरा पराती गा रहा था –
“तेरा दया धर्म नहीं मन में,
मुखड़ा क्या देखा दर्पण में……”
कान तृप्त हुए जा रहे थे दिल धौकनी सा धड़क रहा था।ठंढ ने जैसे पैरों में बेड़ी डाल दी हो,जो जल्द उठ ही नहीं रहे थे,और इसका टोला तो एकदमें गाँव से बाहर था।बीस घर का टोला था। घर-दालान छोड़कर कठ्ठा-कुट्ठी से ज्यादा किसी के पास जमीन न था।करीब पूरा टोला ही ठाकुर की खेत में बनिहारी करता था।
मंगरु अप्पन टोला पहुँच चुका था ।देहरी पर कदम रखता तभी अँगना में फुलही थरिया के पीटने की आवाज कानों में पड़ी।बिटिया जो शायद थाली की आवाज पहली बार सुनी थी,चंचल जिज्ञाषु बाल मन सब कुछ जान लेने के ख्याल से न जाने कब हाथ छुड़ा कर घर में घुस गई। प्रसव कराने आई काकी कह रही थी …
बबुआ तो मक्खन नियन गोर है।
कोयला के खान में हीरा जन्मा है।
बिटिया भी काकी की बात का समर्थन करते हुए पिता से लिपट कर कहती हाँ बाबूजी अप्पन बाबू तो सबसे सुंदर हई ।इतना कह पिता की हाथ खींचते हुए घर के अंदर ले जाने को उद्धत हुई।पिता ने बेटी को दुलार से चूम कर कहा जा तू बबुआ के खूब निमन से देख हम तोहरे से सुनकर पेट भर लेहम।
मंगरु के बाबूजी खुशी से बोले पोता हुआ है।आखिर रात भर के सफर के बाद सूरज और मंगरु का बेटा चमक रहा था एक फलक पर दूसरा ममता की गोद में।
मंगरु बहुत खुश है।उ अप्पन बेटा को बनिहार नहीं बनावेगा। मालिक कह रहे थे कि अभी एतना न आंदोलन हो रहा है कि बुझाता है जल्दिये आजादी मिल जाएगा।मालिक के पैर दबाते हुए मंगरु सुना था। इस आजादी से मंगरु को का फायदा होगा ई तो न मालूम पर आने वाली सन्तान को इस बनिहारी से तो जरूर दूर रखेगा।
मंगरु की औरत को दूध और घी का महक बर्दास्त नहीं है इसलिए सास और घर के लोग भी अनावश्यक खर्च से बच गए हैं।बस हरदी ,मीठा से ही काम चल जाएगा।उतना से ज्यादा तो गाय ,भैंस के खियावे पियावे परता है।
समय रेत की तरह फिसलता जा रहा था।मंगरु का बेटा भी समय के साथ निखरता जा रहा था।एकदम विशेष बालक की भाँति।कोई एक बार देख ले उसे तो गोद में लेने को मचल उठे।मंगरु का जन्म मंगलवार को हुआ था तबहीं बाबूजी मंगरु नाम धरे थे।बस इसी तर्ज पर मंगरु अप्पन बेटा का नाम सूरज रखा था।काहे कि उ दिन एतवार था और सुरजा भी तो भोरे -भोरे सूरज के सङ्गे ही तो आया था।
दिन भर कटनी,पिटनी में देह झोंकने के बाद भी बेटे की एक मुस्कान से मंगरु तरोताजा हो जाता था ।सूरज दो बरिस का हो चला था।कहते हैं अपना देश भी आजाद हो गया था। गाँव के रामलखन भाई कलकत्ता कॉटन मिल में काम करते थे।फगुआ में घर आते,त पूरे परिवार के लिए नया कपड़ा,मिठाई लाते ।अप्पन पुराना घर छोड़ के परती जमीन में माटी का ही नया घर बनाये थे।मंगरु का भी मन यहाँ से निकलने को बेचैन था।बुढ़वा मंगर के जब दुगोला हो रहा था तो बड़ी दूर- दूर से लोग सुने आये थे।वहीं मंगरु अपनी दिल की बात रामलखन भाई से कहा…..
रामलखन भाई अपन गाँव के लिए कुछो करेला तैयार थे।पास ही दोनों की बात सुन रहे चनेसर, कौड़ी,और बहुत लोग भी साथ चलने को तैयार हुए।
अगले दिन मंगरु अपनी बात घर में रखता है।
बाबूजी कहते हैं, बात त ठीक है बाकी मालिक के आदेश न होई त?
मंगरु बाबूजी को समझाने की कोशिश की कोशिश के साथ ही मालिक से भी अपनी बात कहने को मन मजबूत किया।
वैसे मंगरु तीन भाई थे।पर हिम्मती और बड़ होने के नाते बाबूजी कन्धे पर बोझ ज्यादा डाल दिए थे।
रात -भर मंगरु करवट बदलते रहा।पौ फटते ही नित -क्रिया से निबट मालिक के घर जाने को तैयार हुआ।बाबूजी जी को आशंका थी कि मालिक तैयार न होंगे।फिर भी बेटा की हिम्मत बन साथ में लाठी के सहारे मालिक के दुआर पर जा पहुचंते है।मालिक जनेऊ को कान से उतारते चले आ रहे थे।मंगरु पर नजर पड़ते ही …
.का रे !
एकदम भोरे-भोरे!!
मंगरु धड़कनों को काबू में रखकर कहता है कि मालिक अबहीं त कौनों काम न है त सोच रहे थे रामलखन भाई के साथे कलकत्ता जाते उहाँ मिल में…..
मालिक आँखे तरेरते हुए गरियाते हैं साला….
और इहाँ कौन करेगा तेरा बाप?
ई बुढ़ऊ?
मंगरु खून की घूँट पीकर रह जाता है इच्छा तो थी जुबान खींच कर हथेली पर रख दे ताकि कभी गाली क्या बोल भी न सके।पर जिनगी एक दिन की नहीं और फिर सूरज का चेहरा नजरों के सामने आते ही हाथ भिंच कर रह गया।
मंगरु कुछ कहता उससे पहले बाबूजी अपने बेटे के उम्र के सामने कन्धा पर गमछा ठीक करते दोनों हाथ जोड़े गिड़गिड़ाते हुए बोला…..
मालिक एकरा जाय द।तोर कौनों काम न रुकी ।
हम्मर अभी दु बेटा और हे।सब तोहरे लोगन के सेवा करी।
मालिक आसानी से तो नहीं पर आँखे निकालते हुए कहता है…..
जो सार तहिने…..
जे बुझाऊ से कर!
बाकि !!
अगर हमर काम रुकलऊ त घर के सभे के जोत देबऊ।
मंगरु मालिक की गर्म शीशे सी पिघलती बातों को कानों से जज्ब करते मस्तिष्क तक पहुंचने से रोकता है और नन्हीं सी खुशी से इतना खुश व हल्का महसूस करता है मानों अब उड़ पड़ेगा। बेटे को खुश ,परन्तु अपनों से दूर होने से दुखी अपनी गीली आंखों को गमछे से पोछता मंगरु घर की ओर चल पड़ा, एक आजाद भविष्य की राह पर जिसकी चमक सामने दिखाई दे रही थी। …………………………………………………….. १८ जुलाई २०१९ |

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