रचनाकार अजीत कुमार

बेगूसराय, बिहार|

“अशआर/ग़ज़ल

वो जो दिया दगा होगा
और कोई नहीं..सगा होगा

यूँ हीं तो नहीं जाता है कोई
जरूर हमीं ने कुछ कहा होगा

हैरानी होती है मुझे सोचकर
किससे वो शख्स लिपटता होगा

उंगली उसे दिखाता है जिसकी
उंगली पकड़ के चला होगा

हालात के हाथों मरा किसान
सबने खुदकुशी समझा होगा

सो जा ‘अजीत’ सुबह होने को है,
कौन अभी तक जगा होगा? —— ३० जुलाई २०१९ |

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