ब्रह्म स्वरूप मिश्र “ब्रह्म”

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जीवन परिचय: रचनाकार ब्रह्म स्वरूप मिश्र “ब्रह्म” उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर के रहने वाले हैं| इनका जन्म २५ जनवरी १९८७ को हुआ, इन्होने एम.कॉम तक शिक्षा ग्रहण की है| अन्य उपलब्धियों के साथ-साथ इन्हे हिंदी साहित्य सेवा डॉट कॉम द्वारा आयोजित हिंदी दिवस काव्य प्रतियोगिता – २०२० में चतुर्थ स्थान प्राप्त हुआ है|

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गीत

(इस रचना मे नदी को मैंने वर्तमान पीढ़ी को एक संदेश देने के लिए चुना है कि आजादी के नाम पर आप लोग क्या खो देते हैं।)

हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए
आत्ममुग्ध हो निज स्वरूप पर कल कल मीठी तान लिए
शस्य श्यामला सिंचित करती लहराती मन बहलाती
कभी उछलती ऊपर नीचे तेज कभी मध्यम हो जाती
मोहित करती तीर तटों को कल कल का मृदु गान लिए
हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए……

वन से निकली बस्ती आई स्वार्थसिद्धि के लोग मिले
एक एक दो नहीं हैं ग्यारह समझाते ये लोग मिले
मीठे अनुभव चखने वाली नदी चढ़ी अब कंटकपथ पर
राजमहल का राजकुंवर ज्यों आज चढ़ा है रन के रथ पर
आगे नहीं गुजरना है बिन स्वर्ण पीत पहचान किए
हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए……

अधर कंठ संत्रप्त हुए तो प्यास अर्थ की जागी मन मे
लेकर श्रमिक कुदाल सभी ने लगा दिए हैं उदर खनन में
स्वार्थग्रसित दुनिया का ऐसा रूप देख भयभीत हुई
खुद से बिसर चुकी नदिया को पल मे खुद से प्रीत हुई
सिंचित पोषित किया जिन्हे कैसे माने बिन जान लिए
हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए…

(अब नदिया को अहसास हुआ।)

अहम भाव से जन्मभूमि को त्याग चला हो जो कोई,
आजादी का हर्ष मनाता भूल गया दुनिया खोई।
वही हुआ नदिया के संग में, क्या खोया अहसास हुआ
सारे दर्द छलक आए जब अपना कोई पास हुआ
तब सागर से लिपटी रोई,थकी हुई मुस्कान लिए।
हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए ……

(नीचे के पद मे सागर का खारापन और बुजुर्गों का रूखा व्यवहार क्यों होता है ये मेरी सोच है।)

तुम को जो कुछ भी मिलता है रहती बहतीं और बहातीं
लेकिन इतना चलकर जब तुम मेरे आँचल मे आ जातीं
पाकर के विश्राम स्वयं को कितना खुश कर देती हो
और उठाकर सारा बोझा मेरे सर धर देती हो
थककर आया जान तुम्हें मैं कष्ट नहीं दे पाता हूँ
और उसी को सहते सहते मैं खारा हो जाता हूँ
फिर मुझको जीना पड़ता है एक यही पहचान लिए
हिमशिखरों से चली नदी एक मृदु जल का अभिमान लिए…