प्रेमनारायण शर्मा

 (माध्यमिक-शिक्षक) शिवपुरी, मध्यप्रदेश|

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“मित्रता” 

मेरा मित्र ढाल सा है,काल में अकाल सा है।
सुख में रहेगा पीछे,दुख में खड़ा रहा।
मित्र पै जो कष्ट हो तो,रात को भी दौड़ा आए।
सारे दुख झेलकर,साथ में अड़ा रहा।
लेने की ना सोचे कभी,देने की ही सोचता वो,
भारी विपदा में मित्र,साथ तो खड़ा रहा।
लालची नहीं है वो तो,स्वार्थी नहीं है वो तो
कितना भी धन पैसा,पास तो पढ़ा रहा।।

नेक काम उसके हैं, झेले दुख हँसके हैं,
कार्य सारे उसके तो,दिल से पवित्र हैं।
दोस्त की कामना में,अपनी भलाई माने,
मैं तो कहूं दुनिया में,ऐसा होता मित्र है।
छोटे-बड़े ऊंच-नीच,मित्रता सभी के बीच,
दोस्ती के जुड़ने की,भावना विचित्र है।
मित्र बने आसानी से,निभाना कठिन है तो,
देश दुनिया में फैली,मित्रता सर्वत्र है।।

छल ना कपट होता,बैर ना बुराई होती,
कृष्ण सुदामा की ना,फिर से मिताई होती।
राम सुग्रीव की ना,जोड़ी कभी बन पाती,
दोस्ती की सत्यता ना,मित्र ने बताई होती।
राणा जी चेतक से थी,खुद्दारी की मित्रता,
घोड़े ने भी जान देके,मित्रता निभाई थी।
चंद्रवरदाई से थी,चौहान की मित्रता तो,
चाह एक दूसरे की,मित्र में समाई थी।।

दुख सुख बांटते वो,साथ को निभाते मित्र।
सारे गम भूलकर,राह को दिखाते मित्र।
जिंदगी के साथ भी हैं,जिंदगी के बाद भी हैं।
सारा भेदभाव भूले,चाह को दिखाते मित्र।
जिंदगी की साँस हैं वो,हर पल पास है वो।
सारे दुख दारुणों को,दूर भगाते मित्र।
मित्र और खुदा में तो,एक ही समानता है।
मित्र जब कोई बने,मित्र को बनाते मित्र ।।

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“पुकार”

मातृभूमि की खाओ कसम,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव,

भगत सिंह की फांसी तुमसे करती सवाल है
तेरे बिन वीर देखो कैसा बुरा हाल है
काहे तूने किया लाचार ओ मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

रिश्ते तार-तार हुए अब घर-घर में
खुलके न जिए सब जीते डर डर में
गरीबों को दिया दुत्कार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

घर घर में शांति की जगह तनाव है
कलयुग के काम तो बहुत ही खराब हैं
धर्म तो बना व्यापार ओ मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

हमने तो दिया था इस देश को संभालने
चोरी- धोखा- कपटी से लगे पेट पालने
क्यों हो गया तू इतना गद्दार,ओ..मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

एक दिन सबको जग से तो जाना है
मोह-माया-साथी- संगी यहीं छोड़ जाना है
काहे तूने तोड़े परिवार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

माता-पिता से गुरु होता महान है
पीढ़ी आज की क्यूँ इससे नादान हैं
क्यों टूटा है गुरु का ये दुलार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

महंगाई के मारे दम निकला ही जा रहा
सब जगह देखो मानव मानव ही को खा रहा
कैसे यह बचेगा संसार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

पहले इस देश में ऐसा नहीं होता था
पाने को सब ही था कुछ नहीं खोता था
खो गए कहां संस्कार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

अब किसी बहिना की बचती ना लाज रे
अब माएँ बेटों पर करती ना नाज रे
चारो ओर छाया दुराचार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

चारो ओर गंदगी के सब ही शिकार हैं
स्वर्ग के समान भूमि कर दी बेकार है
गंदगी पर करले विचार,ओ.. मानव
अपने शहीदों की सुनले पुकार,ओ.. मानव

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दीवानगी (मुक्तक)

दीवानगी की हद को मैं तो पार कर गया
जो किया ना मेरे साथ मेरा यार कर गया
हमने वफा को पाला तो लुटा के जिंदगी
उस धोखेबाज यार से मैं प्यार कर गया

गलियों से गुजरा उसकी तो दिल को बिछा दिया
मैंने कहा उसी को तो पागल बना दिया
जिसने कभी रखा नहीं तुमसे कोई भी गिला
अपने चाहने वाले को ही जाहिल बना दिया

उम्मीद के सहारे को लेकर खड़ा रहा
कल आएगी तू मेरे पास में अड़ा रहा
इंतजार में कटी थी वो तो रात झूठी थी
तेरी याद के नशे में आज मैं पड़ा रहा

तेरी चूड़ियों की खनखन को मैं तो सुनूँगा
चाहे कोई मुझे ना ही करे तुमको चुनूँगा
और तेरे मेरे नाम के चर्चे तो होंगे ही
अपनी बाहों के झूले में साथ लेके चलूंगा

सपनों की नींद में तू मेरे साथ होती है
जब नींद टूट जाती तब तू भाग जाती है
मैंने कहा तो नींद से तू टूट क्यों जाती
तेरी नहीं थी वो कभी तो टूट जाती है

चुप चुप के देखूं तुमको तू मुझको ना देखती
मैं आवारा तुझ पै हो गया तू कुछ ना कहती
तेरे एक एक पल का तो हिसाब जीवन में
लेकिन तुझे तो मेरी कभी याद ना आती

इतना तुझे तो चाहा था भगवान से बढ़कर
पर मानी ना थी जब भी मुझे बोली थी चिढ़कर
क्या अब चाहतों की सीमाओं को तोड़ दूंगा मैं
तू पत्र मेरा फाड़ देना पहचान से पढ़कर।।

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“ट्रैफिक नियम”
जागरण गीत (स्वरचित)

देश में ट्रैफिक है टेंशन
जन-जन में फैलाओ जागरण
नियमों को तोडेंगे,चालान कटाएँगे
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन
देश में …………………
ट्रैफिक के नियमों ऐसे आएंगे
गाड़ी चला नहीं पाएंगे
जनता को कब तक सताओगे
रोड गड्ढों को कब भरवाओगे
गाड़ी को चलाना है,साइड से चलाना है
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन
देश में………………..
ट्रैफिक पुलिस का जवाब नहीं,
लेने देने का अब कोई हिसाब नहीं
समझौते नियमों में होएंगे,
एक्सीडेंट भी होते रहेंगे
बेल्ट सीट भी लगानी है,धीमे गाड़ी भी चलानी है
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन
देश में ………………

रेड लाइट सिगनल लाल है
,गाड़ी की बंद करो चाल है
हरी बत्ती देर से जलाओगे
तब सिग्नल पार कर पाओगे
पीली बत्ती देखकर,सधके अब तू पार कर
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन
देश में…………….
गाड़ी का बीमा करा लो,
आर.सी. भी साथ रखा लो
हेलमेट हेड का मैट है
सवारियों की गिनती भी सेट है
वाहनों की आंधी चली,दुर्घटना से देर भली
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन
देश में……………………

रोड एक्सीडेंट में मरे जन,
घरवालों का लगता नहीं है मन
ट्रैफिक के नियम भी जरूरी है
ड्राइविंग बिना नियम अधूरी है
बच्चों से भी मिलना है,घर को लौट आना है
तो सारे चालक हो जाओ अटेंशन देश में………………

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“वीर जवान”
(गीत शैली स्वरचित)
तर्ज:-उड़ जा काले कावा……

उड़ जा प्यारे तिरंगा तेरे नीचे हो जावा
अमर जवान है भारत मां के शीश झुका जावा
क्या तू रे पागल रे हुआ है क्या ये तुझको हुआ
चरण पकड़ ले भारत मां के मांग ले उससे दुआ
तू भाग जा रे पाकिस्तान रे,
बचाले अपने प्राण भाग रे
उड़ जा प्यारे………..
भारत देश है सबसे प्यारा क्यूँ टकराता है
शरण में जा तू भारत मां की क्यूँ घबराता है
तुझको देखे क्या हो जाता ये तो हम ही जानें
तोड़ के सारी सीमाओं को,लड़ जाते हैं दीवाने
तू भाग जा रे…………..
वीर जवान है भारत मां के,मुंह तोड़ जवाब तो देंगे
तेरी हरकत इतनी बढ़ गई,सब का हिसाब तो लेंगे
बापों को कमजोर समझता,है तू मूर्ख प्राणी
नक्शे से मेंटेंगे निशानी,अब बंद करें ये कहानी
तू भाग जा रे………….
भारत से तू पैदा हुआ है,बाप को भूल गया है
नमक हराम है कायर तू है,आप को भूल गया
औकात तेरी हम याद दिलाएं,तेरी बुद्धिहोगई मोटी
अबकी बार बचेगा ना कोई,काटेंगे बोटी बोटी
तू भाग जा रे………….
सामने कभी तू आता नहीं है,छिपके वार किया है
हर बार ये धूल चटाई है तुझको,हम ने मार दिया है
पापी,कपटी,नीच,हरामी,तेरे पूरे होंगे ना सपने
अंतिम साँस लड़ेंगे हम सब,
चाहे प्राण चले जाएं अपने
तू भाग जा रे…………..

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“जय हो”
( स्वरचित कविता)
हे मातृभूमि जय हो जय हो जय हो-२
भारत मां का मान में गाऊँ-२इसमें मेरी लय हो…
हे मातृभूमि जय हो जय हो जय हो

कैसे मां तेरा ऋण मैं चुकाऊँ,
मां तेरा दीदार करूं।
तेरी धरा है सुंदर सबसे,
मैं तेरा उपहार करुं।।
मुझ में भर दो इतनी शक्ति-२ना किसी से भय हो
हे मातृभूमि…………………
तेरे बिना सब सूना सूना,
जो देखा है कोना कोना
तेरे बिना सब खाली खाली,
भर देती हो झोली खाली
ऐसा काम करें जग में हम-२ना किसी का क्षय हो
हे मातृभूमि…………
कहीं नदी गंगा है यहां पर,
कहीं हिमालय ताज खड़ा है
हर मानव यहां वीर हुआ है,
कहीं न कहीं रण उसने लड़ा है
कोई समर में गीता गाता-२वीर शहीदों की जय हो
हे मातृभूमि……………
कहीं भजन मीरा के गूंजे,
कोई बना उपकारी है
गाय जहां मां प्यारी अपनी,
हर जननी महतारी है
कौन बनेगा नेता अपना-२आज अभी से तय हो…
हे मातृभूमि………..

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         *भारतवासी*
स्वरचित

तर्ज:-परदेशी परदेशी जाना नहीं..
भारतवासी भारतवासी जाना नहीं
भारत को छोड़के-२
ओ.. भारतवासी मेरे प्यारो.. वादा निभाना
तुम याद रखना कहीं भूल न जाना
भारतवासी भारतवासी………….

सच कहते थे गांधी नेता युद्ध न कर
युद्ध तो है एक शोक बुरा इस शोक से डर
गुस्सा एक दूजे के मन में पलता है
बाहर आके युद्ध में आग उगलता है
भारतवासी मेरे प्यारों युद्ध न करना
भारत की लाज रखना कहीं भूल न जाना
भारतवासी भारतवासी……..
पन्द्रह अगस्त को उत्सव हम मनाते हैं
आपस में मिलकर के खुशियां लुटाते हैं
शहीदों की यादों को ताजा करते हैं
आंखों में आंसू हम सब भर लाते हैं
भारतवासी मेरे प्यारो बदला जमाना
तुम याद रखना कहीं भूल न जाना
भारतवासी भारतवासी……..
बन गए नेता इन्होंने देश में वास किया
ना सोचा ना समझा पर्दाफाश किया
कुछ ने मिलकर भारत का बंटवारा किया
हिंदुस्तान और पाकिस्तान इसे नाम दिया
भारतवासी मेरे प्यारों साधो निशाना
तुम याद रखना कहीं चूक न जाना
भारतवासी भारतवासी………..

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 "अपनापन"

( स्वरचित कविता)
बरसों बाद लगा कोई,
दुनिया में भी अपना है।
विश्वास नहीं होता हकीकत है या सपना है।

इस छोटे से जीवन में,
कितनी बातों को जाना है।
कितने लोग कहे यह बातें,
एक आना एक जाना है।

बात जमाने की बातों में,
कैसा यह बचपन है ।
अपनों में परायापन है,
परायों में अपनापन है ।
आंखों में परायापन है,
आंखों में ही अपनापन है ।
सांसों में ताजापन है,
सपनों में पागलपन है ।

खोई चीज ढूंढने का,
कारण है अपनापन।
ना मिलने पर कोई चीज,
बेचैनी है अपनापन।
कुछ लेने से पहले,
देने में है अपनापन।
चाहे दूर रहो जितने भी,
मिलने में है अपनापन।

मोटी जंजीरों को तोड़ो,
टूटेगा ना अपनापन।
बनावट इस दुनिया में,
अच्छा लगता है सादापन।
अपनों की यादों में देखो,
आंखों में है भींगापन।
बिन अपने के करें जो कोशिश,
लगता नहीं है मेरा मन।

ऐसे भी थे दिन मेरे,
अपनों में बीता था बचपन।
उस मनभावन सी बगिया में,
खेला करता था छुटपन।
हो गए बड़े तब क्या पाया,
अब पूरे दिन की है भटकन
चिंता मुक्त कभी ना होंगे,
अब बेचैनी तन और मन।

चेहरों में है कुछ जासूसी
भावों में अपनापन है।
सपने देखे चाहे जैसे
ख्वाबों में अपनापन है ।
अंदर कुछ भी हो लेकिन
जवाबों में अपनापन है।
कितनी अच्छे है वो लोग,
जिनका किताबों में अपनापन है।
दूर चले जाओगे तो क्या होगा
यादों में अपनापन है ।
झूठ कभी भी बोल सके ना
वादों में अपनापन है।
अपने लिए न कभी कुछ मांगा
फरियादों में अपनापन है।
पता नहीं कितनी मेहनत की है
बुनियादों में अपनापन है।
जाने तो यह भी अपनापन,
मानो तो वह भी अपनापन।
ना जाने कैसा अपनापन,
माने मन वैसा अपनापन ।
खाली बैठा सोच रहा था,
कहां गया है अपनापन।
कभी नहीं सोचा था हमने,
वहां मिला है अपनापन।
अपने मन को मन में रख के,
मैंने पाया है अपनापन।
सबको छोड़ दिया है हमने,
छोड़ ना पाए हैं अपनापन।
बरसों बाद लगा कोई,
दुनिया में भी अपना है ।
विश्वास नहीं होता हकीकत है या सपना है।

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      "तेरे लिए"

( स्वरचित, गीत शैली)

किस्मत के धनी हैं हम,हमें प्यार मिला तेरा
ये तेरे लिए ही तो-२सब जीवन है मेरा

झूठ नहीं है ये,सच मेरी कहानी है
तेरी यादों में बीते,अब मेरी जवानी है
तन्हाई भरे आलम में-२तेरी यादों का पहरा
ये तेरे लिए……………..
कैसे कहूं तेरे बिन,बेचैनी सताती है
हर छोटी सी बात,तू मुझको बताती है
जो बात लगे बेकार,वो बात छुपाती है
तेरे हर दिल की धड़कन,हमें अपना बनाती है
मेरी आंखों में झूमे-२तेरा खिलता सा चेहरा
ये तेरे लिए……………….
दुनिया के दरिंदों को,कैसे समझाऊं मैं
लाख करें कोशिश,पर दूर न जाऊं मैं
अपनी हर चाहत में,तुझे अपना बनाऊं मैं
हर जन्मों में रब से,तुझको ही पाऊँ मैं
यह तेरा नहीं है अब-२ हर सपना है मेरा
ये तेरे लिए………………
किस्मत के …………..

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     *मां*

जिस मां ने तुमको पाला पोसा,दूर हो गया
सीधा सरल था तू वही,अब क्रूर हो गया
बच्चा रहेगा उसके लिए तू तो रे हरदम
तू चार दिन की चांदनी में चूर हो गया

उंगली पकड़ के जिसकी तू बड़ा जो हो गया
आशीष पाके मां का तू खड़ा जो हो गया
जो सो सकी ना रात में जगी थी वो कभी
मासूम तेरा दिल था क्यों कड़ा जो हो गया

नौ मास तुझे गर्भ में धारण जो कर लिया
मंदिर गई मस्जिद गई वो, प्रण जो कर लिया
दर्जा हमेशा देगा मां को ये सोचती थी मां
खर्चे का दूर होने का कारण जो कर लिया

रात में कई बार तेरा गीला था बिस्तर
गीले मैं सो गई थी मां समझी नहीं स्तर
उसके ऋणों को बेटा तू क्यों भूल जाता है
वो मां की ममता थी भली तू बन गया प्रस्तर

खुद भूखी प्यासी रहकर तेरा पेट भर दिया
उसका था तू तो राजा बाबू क्या तूने कर दिया
जब आ गई थी चंद्रमुखी तेरे पास तो
उस बूढ़ी मां के प्यार को बर्बाद कर दिया।

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  "मतलब की दुनिया"

इधर से जाऊं उधर से जाऊं
मिलता कहीं कोई नहीं
मतलब की दुनिया है यहां
करता भला कोई नहीं
इधर से………………
झूठी रस्में झूठी कसमें
झूठे ही तो वादे हैं
झूठी बातें झूठी रातें
झूठी ही तो यादें हैं
दुश्मन तो दुश्मन है यहां
सच्चा दोस्त कोई नहीं
इधर से………………..
हर एक सपना में भी देखूं
हर एक सपना तुम भी देखो
सपनों को सच करना जानो
तब उनको तुम अपना मानो
सपने तो अपने होंगे कहां
जग में अपना कोई नहीं
इधर से…………………………
इस जीवन को गुलशन बनाओ
चाहे नर्क बना डालो
चाहे तो मिलो दोस्तों से जाकर
चाहे फ़र्क बना डालो
इस दुनिया में प्यार के रिश्ते
से रिश्ता बड़ा कोई नहीं
इधर से………………….
देखो जमाने को आज तो तुम
इससे बुरा भी होगा क्या
हर रिश्ते को तोड़ रहे हैं
अपना कभी कोई होगा
क्या मुर्दा है ऐसे लोग जहां में
जिंदा कहीं कोई नहीं
इधर से…………………..
कितना बदला यह तो जमाना
क्या एक दिन कभी संभलेगा
हम रहे ना तुम रहो ना क्या
इतिहास इसको दोहराएगा
आज रुचि से पढ़ते हैं इतिहास
कल लेगा रुचि कोई नहीं
इधर से जाऊं उधर से जाऊं
मिलता कहीं कोई नहीं
मतलब की दुनिया है यहां
करता भला कोई नहीं

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      "आशा" 

कैसे कैसे लोगों ने मुस्कुराना सीखा
कैसे कैसे लोगों ने हंसना सीखा
तू पगले क्यों रोता है…..
कैसे-कैसे लोगों ने……….
जिनकी जिंदगी में कई मोड़ आए
गिर के उठे वो मंजिल को पाएं
वीरान गुलशन में भी फूल खिलाए
काम नया वो इस जग में लाए
आशा के भरोसे पै चलना सीखा
तू पगले क्यों रोता है…
कैसे कैसे………………
जिंदगी के दांव पर तू क्या जाने
कितनी है मंजिल कितने ठिकाने
क्यों दिल तोड़ के होता है वेगाने
कुछ अपनी तू कुछ मेरी भी माने
रुकी हुई नदियों ने बहना सीखा
तू पगले क्यों रोता है….
कैसे-कैसे लोगों ने…………..
कौन इसमें अपना है कौन बेगाना है
तेरा साथ जो दे दे वही तेरा अपना है
जो तेरे नसीब में है वो ही तेरा गहना है
मेरी बात मान लो यही मेरा कहना है
सच्ची अच्छी बातों को कहना सीखा
तू पगले क्यूँ रोता है…
कैसे कैसे………….
मीठी मीठी बातों से अपना बनाना है
यादें वफा के सपने सजाना है
आज यहां कल और ठिकाना है
जमाना तो ऐसी बातों का दीवाना है
मुरझाए फूलों ने खिलना सीखा
तू पगले क्यों रोता है…
कैसे कैसे…………………

“जितना प्यार तुम्हें मिलना था”
जितना प्यार तुम्हें मिलना था वो ना मिल पाया
ये सोच सोच कर तो मेरा दिल भी घबराया

मेरी राह में इतनी दीवारें कैसे तोडूं मैं
यादें वफा की कैसे भुलाऊं तुमको न छोड़ूँ मैं
इस दुनिया में कौन है मेरा कुछ भी समझ ना आया
जन्म दिया इस रब ने मुझ को क्यों इतना तड़पाया
जितना प्यार………
एक भरोसा था मेरा वह भी छूट गया है
देखा था एक सपना मैंने वो भी टूट गया है
एक सहारा ईश्वर था रब भी रूठ गया है
और मिला ना उसको कोई क्यों मुझको लूट गया
तू ना जाने तेरे बिना-२मैं सूखे फूलों सा मुरझाया
जितना प्यार …….
इतना होने पर ये सोचो मैं जिंदा किसके लिए हूं
साथ निभाना है तेरा मुझे मैं जिंदा तेरे लिए हूं
जानू मैं इतना सब कुछ यह धोखा मेरे लिए है
और बताऊं तुमको मैं क्या यह जान भी तेरे लिए है
आज खुशी है अगर तुझे तो-२ सब मैं नहीं भर पाया
जितना प्यार……..
यह सोच सोच कर तो……

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       "भारत को नमन"

नमन करूं नमन करूं
अपने देश को नमन करूं
भारत देश को नमन करूँ
भारत देश में रहते हैं हम
कितनी शांति पाते हैं हम
सब को अपना बनाते हम
प्यार ही प्यार लुटाते हम
देश पर इतने कथन करूं
नमन करूं…….
नदिया नाले झरने बहे
सब लोगों को अपना कहें
बोली भाषा भारत की प्यारी लगे
गैर भी यहां पर अपना लगे
उजड़ी बगिया को चमन करूं
नमन करूं………
आज बदल गया भारत देश
दिल ना बदले बदला भेष
और बचा भी है इसमें शेष
अब ना होगा घर में कलेश
अपने गुस्से का दमन करूं
नमन करूं……………
देश हमारा इतना महान
इससे हैं हमारी पहचान
कर लो इसका तुम गुणगान
करके भारत मां का ध्यान
भारत मां का भजन करूं
नमन करूं…………..

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प्रेम
प्रेम कभी रुकता नहीं
प्रेम कभी झुकता नहीं
प्रेम एक भाव है,
भाव कभी मरता नहीं
प्रेम को सब जान जाते
प्रेम से सब मान जाते
प्रेम एक भक्ति है ,
प्रेम कभी डरता नहीं
प्रेम कभी……….
मां को बच्चों से भाई को बहन से
पिता को पुत्र से दोस्त को दोस्त से
प्रेम एक मान है प्रेम एक सम्मानहै
प्रेम से सब खाली है
प्रेम कभी भरता नहीं
प्रेम कभी…………
प्रेम कभी जलता नहीं
प्रेम कभी पलता नहीं
प्रेम एक जुनून है
प्रेम कभी दबता नहीं
प्रेम रहता है दिल में
प्रेम कहता है दिल में
प्रेम एक गुलशन है
प्रेम कभी छिपता नहीं
प्रेम कभी………….
प्रेम खट्टा है प्रेम मीठा है
प्रेम सच्चा है प्रेम झूठा है
प्रेम एक भक्ति है
प्रेम कभी कहता नहीं
प्रेम कभी…………….

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    "बारिश की बूंदों में" 

हर किसी को लगता है सुहाना क्यों
बारिश की बूंदों में…
क्यों लगता है कोई प्यारा
बारिश की बूंदों में…
फूल खिलते हैं क्यों
बारिश की बूंदों में ..
घास भी फुदकती है क्यों
बारिश की बूंदों में …
पक्षी भी चहकते हैं क्यों
बारिश की बूंदों में…
होता है धरती और आकाश का मिलन
बारिश की बूंदों में …
बरसती है इतनी खुशी क्यों
बारिश की बूंदों में…
एक शांति की ठंडक है क्यों
बारिश की बूंदों में…
न जाने ढूंढते हैं लोग क्या
बारिश की बूंदों में …
कई कल्पनाएं करते हैं लोग
बारिश की बूंदों में …
हमेशा नए करतब हैं क्यों
बारिश की बूंदों में ..
मजबूत है भरोसा मेरा क्यों
बारिश की बूंदों में….
मंद मंद संगीत है क्यों
बारिश की बूंदों में ….
जिंदगी की घुटन से दूरी है क्यों
बारिश की बूंदों में….

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    "मेरा देश"

मां बाप से बढ़कर है देश मेरा
गोदी में पले जिसकी परिवार मेरा

इंसान खो गया है इसको कोई जगाओ
भेदभाव को छोड़ो त्यागो रिश्ता कोई बनाओ
चिड़िया की तरह हम जिसमें रोज करें बसेरा
मां-बाप से……
हिंदू न कोई मुस्लिम ना सिख कोई ईसाई
हम सब ने चोट खाई हम सब हैं भाई भाई
बिना भेदभाव सूरज करता रोज सवेरा
मां-बाप से………
कोई गोरा कोई काला राजा कोई फकीरा
सब पंचतत्व मिलकर है बनता कोई शरीरा
हट गया काला बादल छाया था जो घनेरा
मां बाप से………

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    "हूं मैं"

दीन भी हूं हीन भी हूं गरीब भी हूं मैं
पर लोगों के करीब भी हूं मैं
दीनता, हीनता, अमीरता से क्या?
जियो साफ जिंदगी कसूरता से क्या?
दया रखो दिल में क्रूरता से क्या?
सज्जनता रखो तुम गरूरता से क्या?

आज भी हूं कल भी हूं पल भी हूं मैं
रोते मन टूटे दिल का बल भी हूं मैं
एक अकेला नहीं पूरा दल भी हूं मैं
दिखता हूं कठोर पर सरल भी हूं मैं

सुबह शाम हमने यही तो बिचारा है
भाव जिसके साथ है वही तो प्यारा है
कौन इस दुनिया में अपना हमारा है
देखो जग में क्या यही सब नजारा है

क्या करें कहां जाएं फिर से विचारा है
भूल कर भी किसी को दुख नहीं देना
बिन मांगे मिला सब अब क्या लेना
जाते-जाते हमें एक बात और कहना है
सच्ची आत्मा देश का बड़ा सबसे गहना है
दीन भी हूं………
पर लोगों के………

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     "अकेलापन"

कभी अकेले कभी दुकेले,
कभी संग रहते हैं हम
संग सभी के प्यार मिला है
अकेले में तंग रहते हम

अकेलेपन की दुनिया में
चारों ओर है वीरानापन
जब साथ सभी होते हैं तो
दिखता है तब अपनापन

कभी हमारे साथ हैं कभी हमारे पास हैं
इस अकेलेपन में बस उनकी ही तो आस है

बैठ अकेली दुनिया में कैसी अजब सी प्यास है
सोच जरा थोड़ा सा आगे उनके आने की आस है

आए ऐसी वैसी बातें इसी अकेलेपन में
काटे कटती नहीं है रातें इसी अकेलेपन में
भूख लगी ना आग लगी तन इसी अकेलेपन में
शब्दों का भंडार बना मन इसी अकेलेपन में
आज खो गया है कोई इसी अकेलेपन में
याद आ गया है कोई इसी अकेलेपन में

बुरा लगे वह भी अच्छा है इसी अकेलेपन में
झूठा भी अब तो सच्चा है इसी अकेलेपन में
डोर बांधनी पड़ती सबसे इसी अकेलेपन में
बेचैनी सी बढ़ती सबको इसी अकेलेपन में

कभी उदासी कभी निराशा कभी भंग रहते हैं हम
कभी सोचमय कभी शांतमय कभी दंग रहतेहैं हम

कभी अकेले कभी दुकेले कभी संग रहते हैं हम
संग सभी के प्यार मिला है अकेले में तंग रहते हम

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    "गुरु- शिष्य"-१ 

आन अर्पित मान अर्पित,
वक्त का पल पल समर्पित।
सोचता हूं देश के बच्चों,
तुम्हें कुछ और भी दूं ।

नन्हीं नन्हीं बात से तुम देश के सपने गढ़ोगे
ले गुरु का मंत्र ले तुम आगे ही आगे बढ़ोगे

झनझनाहट सी करोगे दुश्मनों के राग रंग में।
आ पड़ेगी आन पर तो सिर कटा दोगे तुम रण में।

अपने चोले के रंगों से-२एक अमिट पहचान भी दूं
आन अर्पित……………

देश का तुम पर भरोसा देश तुम पर ही टिका है
शिष्य वो आगे गया जो नित गुरु को शीश झुका है

ना रुकेंगे हम कभी भी ना तुम्हें संदेश देंगे
चांद के हो तुम सितारे हम तुम्हें एक जोश देंगे

इन भलाईयों के पथ पै-२मैं तुम्हें बलिदान भी दूं
आन अर्पित……….

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        "गुरु-शिष्य-२"

गुरुजन का स्थान बड़ा है मैं बतलाता हूँ
शिष्यों तुमको गुरुओं का मैं ज्ञान कराता हूँ
गुरु ही ब्रह्मा गुरु ही विष्णु शीश झुकाता हूं
गुरु शिष्य का अनुपम नाता तुमको सुनाता हूं
हां सब को सुनाता हूं ….

वही शिष्य है अपने गुरु को नित शीश झुकाता है
इतिहास गवाह है वही शिष्य कुछ नाम कमाता है
गुरु शिष्य में जाति पाँत का कोई नहीं बंधन
गुरु बड़ा है माता-पिता से रोज करो वंदन

गुरु के सम्मुख चेला जब कुछ बनकर आता है
खुशी हुई है उतनी कलेजा मुंह को आता है
करते जो आदर है उनको मैं अपनाता हूं
गुरु शिष्य का अनुपम नाता सबको सुनाता हूं

शिष्य वही जो केवल अपनी मनमानी करते
समय निकल जाता है फिर दिन रात यूं ही मरते
शिष्य सीस दे देगा फिर भी ऋण ना उतरेगा
जो मानेगा गुरु वचन को क्षण ना बिखरेगा

मात-पिता की बात गुरु का बुरा नहीं माने
जो कहा गया है हित है उसमें बात सभी जाने
गुस्सा क्रोध कड़ी बातें बाहर से दिखाता हूं
गुरु शिष्य का अनुपम नाता सबको सुनाता हूं,
मैं सबको सुनाता हूँ….

शिष्य करें यदि भारी मेहनत गुरु भी करते हैं
गलत ना हो कोई ज्ञान का मार्ग वो भी डरते हैं
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है यह बात जानते हैं
कार्य सभी छोड़े हैं शिष्य के दोष छानते हैं

गुरु की महिमा गुरु ही जाने सागर है वो तो
मीराबाई के गिरधर का सा नागर है वो तो
अपने साथी गुरुजनों पर मैं इतराता हूं
गुरु शिष्य का अनुपम नाता तुम को बताता हूं
हां तुमको सुनाता हूं

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“श्री राम”

राम मुझमें भी हैं तो,राम तुझमें भी है।
सारे संसार में, समाए ही तो राम हैं
राम की कहानी कहूं, प्यार की कहानी कहूं ।
सबके दाता राम हैं,पराये नहीं राम है
राम भी चलेंगे संग, श्याम भी चलेंगे संग
हिंदुस्तान का जन, बोले राम राम है
राम के निराले काम, दुनिया में राम नाम
मर्यादा बताने वाले, घट घट राम है।

बाप एक के ही हम, बेटे सब जन है तो
माता एक धरती, हमारी ही तो माता है
ये दाना पानी देने वाला, सबका तो राम है
सारे संसार में बड़ा, ही सबसे दाता है
राम को भेजोगे तुम, राम से मिलोगे तुम।
सब जन जन के तो, वो ही एक भ्राता है ।
राम से आराम होता, नाम से ही काम होता
वो शीश चरणों में जो, उनके झुकाता है

बाग फूल के हैं हम, नहीं किसी से हैं कम ।
माला एक के ही हम, मोती कहलाए हैं।
जीव जंतु और प्राणी,राम की बसी है वाणी
पुरुषोत्तम राम की, वह ज्योति कहलाए हैं ।
राम ने अहिल्या तारी,जानती दुनिया सारी
हटाते रहे हैं वो तो, संकटों के साए हैं
समझाया रावण को, भी माना नहीं पापी वो
राम ने किया है माफ़, शरण जो आए हैं।

भेद ऊंच नीच का है, छोटे बड़े बीच का है
राम की कसम खाके, दीवारों को तोड़ दो
जमाना बदल गया, आपसी दखल गया
अपनाई जो है बुरी, आदतों को छोड़ दो
मूरख बने हैं जन, बांटते रहे हैं मन
ऐसे चोर गद्दारों के, सिर को तो फोड़ दो
राम राज्य के समय, में देश में भी भावना
आज प्रेमभाव से तो, देश को तो जोड़ दो

राम सबके प्यारे हैं, वे तो ना कोई न्यारे हैं ।
राम मुझ में है राम, तुझमें में समाया है ।
जाति, धर्म,वंश,भेद, सब छोड़ बैठो यार
दाता एक राम भिखा,री सारी दुनिया हैं
राम ने किया जो किया, बुरा ना किसी का किया
लोग जो भी पंगु बने, गिरि पै चढ़ाया है।
पुत्र, भाई ,शिष्य, मित्र, रिश्ते किए हैं पवित्र
रामचरितमानस, राम ने पढ़ाया है|

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“चुनावी दुमदार दोहे”

1.चाकी चली चुनाव की, मनो छिड़ गया जंग।
आम आदमी के दिखे,अपने अपने रंग।।
रंग में भंग पड़े ना
लोग आपस में लड़े ना

2.दारू पी हामी भरी, वोट दई कहूं जाय।
काहू की भी ना भई, पब्लिक जनता भाय।।
हमें तो मत सिखलाओ
हमें तुम तो जितवाओ

3.पैसा खूब लुटा रहे,जननायक की चाह।
बन बैठे कुरसी मिली,कर दिया देश तबाह।।
करे हमरी बर्बादी
वो है सब इसके आदी

4.जांच परख कैं वोट दो, नेता ईमानदार।
वोट अमूल्यम हो गई,मत कर बंटाधार।।
वोट मत बेचो भाई
सुनो सब लोग लुगाई

5.ऐसा नेत बनाइए ,जाकी मोटी छाप।
जनता तो दिल में बसे, कामौ का हो जाप।।
करें गांव में हल्ला
देखे सारा मोहल्ला

6.वोट मुझे दो भाइयों,कर दूँ बेड़ा पार।
जीते हि सब भूल गया, बैठे घूमे कार।।
स्वाद को ही चखि लेगौ
हमें फिर से ठगि लेगौ

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“आधुनिक नारी”

आधुनिक नारी देखो, बाने को कुचल गई
आज लीपापोती वाले, फैशन पै मचल गई
पट भारी छोटे हुए,आभूषण छोड़ दिए
सुंदरता की सादगी वो दूर से फिसल गई
खूब दौड़ा खूब भागा,फिर भी रहा है पीछे
पुरुषों से नारियाँ तो,आगे ही निकल गई
किन्ना सारा भेद सहा,ना सहेगी कोई अब
आज देखो नारियों की,सूरत बदल गई

घूंघट की लाज छोड़ी,सारी मरियादा तोड़ी
कोरी मनमानी करें,आजकल की नारियां
साड़ी से भरा है घर,दौड़ रहीं वो बाजार
नई-नई मैचिंग की,खरीद रही साड़ियां
सास से भई लड़ाई,ननंद भी तो बीच आयी
तड़ातड़,दमादम बुला रही है नारियां
कम कोई किसी से ना,काम कुछ होता ही ना
धुआंधार जीभ को चला रही हैं नारियां

रोटियां बनाने चली,बिलती नहीं रोटियां
देखो आजकल कैसी,हो गई हैं नारियां
छोरियों को छूट दी तो,छूट गई छोरियां
सिंहनी दहाड़ी जैसी,बन बैठी नारियां
आंखों में नूर लेके,सपने गरूर लेके
चारो ओर छा रही हैं,नारियां ही नारियां
चोटी के शिखर बैठी,संघर्षों को पाल बैठी
वायुयान तक भी उड़ाने लगी नारियां

मेलों में भी भीड़ बड़ी, चाट ठेलो पै वो खड़ी
रेस्टोरेंट होटलों में,जा रहीं हैं नारियां
नियम रोज का बनाए,घर में खाना ना बनाए
हर पार्टी में अब,जा रही है नारियां
गांव में भई सगाई,दौड़ के बाजार आई
धरोहर गांव की को,छोड़ रही नारियां
संस्कार भूल बैठी,फूहड़ता को पाल बैठी
भारत की वेशभूषा,भूल रही नारियां

पहले मेहमान कोई,घर जो आता ही था
देवता के तुल्य सब,समझी थी नारियां
आज कोई घर आया,संकटों का साया छाया
घर से कब जाएगा,ये सोच रही नारियां
पहले पति का था राज,आज राज पत्नी का
अंगुली इशारे पै नचाय रही नारियाँ
पीड़ित पति हुए,दर्द आम आज हुए
सब जगह पति को सता रही नारियां

पहले बात कैसे करें,साधन कोई न था
केवल रह जाती थी चढ़ाकर के त्यौरियां
आज फोन मिल गया,शर्म को भी ले गया
मोबाइल पै घंटों बतिया रही है नारियां
नारियों की उम्र पूछो,कोई ना बताती ठीक
बत्तीस को बाईस बता रही हैं नारियां
सारे दिन व्यस्त रहें,कामों में भी मस्त रहें
हर एटीट्यूड को दिखा रही हैं नारियां |

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समय का जवाब (कहानी)

आज का मौसम बड़ा सुहाना था, बसंत ऋतु की दस्तक थी, चारो तरफ बालकों के झुंड नजर आ रहे थे, सभी बच्चे अपने अपने खेल में आनंदित थे। लेकिन रोज की तरह गंभीर आज भी अकेला बैठा उस समय का इंतजार कर रहा है कि मेरे साथ खेलने के लिए कोई हो………
बालकों में बड़ी मासूमियत होती है।वह स्वच्छंद रहना चाहते हैं, किसी भी तरह की कलुषता उनके अंदर नहीं होती और ना ही अमीरी गरीबी व ऊंच-नीच तथा छल कपट का भाव ही होता है। वह अपने साथ खेलने वाले साथियों से अत्यंत प्रेम करता है। वह उनको अपने जीवन की सबसे प्रिय वस्तु समझने लगता है। और जीवन के अंत तक उनके साथ बिताए हुए किसी भी पल या किसी भी घटना को भुलाने में असमर्थ रहता है। फिर गांव के तो खेल ही निराले थे। एक खेल खत्म नहीं होता था, तभी दूसरे की शुरुआत हो जाती थी।

लेकिन गंभीर एक गरीब परिवार में पैदा होने वाला शारीरिक रूप से कमजोर ग्यारह वर्षीय बालक था।उसके साथ खेलने के लिए बच्चे तो बहुत थे लेकिन उनके माता-पिताओं का स्तर उनके पिता से ऊंचा होने के कारण उनको हीनता की दृष्टि से देखते थे। वह अपने बच्चों को कमजोर व गरीब बच्चों के साथ खेलने की मना कर देते थे।यदि कोई बालक चोरी-छिपे गंभीर के साथ खेलने लग जाता तो उसकी पिटाई करने से भी नहीं चूकते थे।

        गंभीर ने एक दिन जाकर अपनी मां से पूछा- मां... मां जब मैं घर रहता हूं, तो तुम कहती हो कि "जाओ बाहर खेलो मुझे काम करने दो"।

लेकिन जब बाहर जाता हूं तो सभी कहते हैं कि तू घर जा हम तेरे साथ नहीं खेलेंगे।

मां बोली -“बेटा तू कितने प्रश्न एक साथ करता है मेरे पास तेरे प्रश्नों के जवाब नहीं है।”

गम्भीर-“तो फिर कौन मेरे प्रश्नों का जवाब देगा।”(गंभीर ने झुँझलाकर कहा)

गंभीर की माँ- “बेटा जब समय के साथ जब तुम बड़े हो जाओगे तो समय तुम्हें जवाब देगा क्योंकि समय सबको जवाब देता है।”

गंभीर- “ठीक है मां आने दो उस समय को मैं देख लूंगा।”
( गंभीर उछलता कूदता फिर से बाहर भाग गया)
एक दिन गांव के ही संपन्न घर के,बच्चे दीपक के साथ खेलने का अवसर गंभीर को मिला।वह खेलने की सारी हसरते आज पूरी करना चाहता था। वह बड़े मनोयोग से दीपक के साथ खेल रहा था,लेकिन उस मासूम को क्या मालूम कि उसकी कुंडली में यह सब कहां….. वे दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे, शायद पांचवी कक्षा के छात्र रहे होंगे, दीपक साधन सुविधाओं युक्त था, ट्यूशन जैसी अतिरिक्त पढ़ाई लेकर पढ़ने में गंभीर की अपेक्षा ज्यादा होशियार हो गया था तथा साफ सुथरा भी रहता था।लेकिन बच्चों में इस तरह के भाव नहीं होते हैं, लेकिन गंभीर बचपन में यह कभी नहीं जान पाया कि मित्रता की सही परिभाषा क्या है। वह तो आज की क्षणभंगुर कि इस मित्रता में आज डुबकी लगाकर जो आनंद ले रहा था, उसके सामने स्वर्ग के भी सारे साधन फीके नजर आ रहे थे। वह दोनों मस्त होकर गांव के खेत में खेल रहे थे, इतने मैं उनकी कुंडली में राहु केतु की तरह दीपक की मां आ गई, उसकी पैनी नजर दोनों बच्चों पर पड़ी।वह गांव की सबसे ईर्ष्यालु नारी थी। उसकी क्रोधाग्नि चरम पर थी।दीपक सहम गया। वह डर के मारे कांपने लगा।

वह गरमाते हुए बोली-“क्यों रे! दीपक,तुझे इतनी भी समझ नहीं है; कि किसके साथ खेलना चाहिए, किसके साथ नहीं,”

दीपक:- म.म.. मां(डरते हुए) “गंभीर बहुत अच्छा है।”

दीपक की मां:- “तुझे पता है यह आवारा,गँवार, गंदे, मूर्ख लोग हैं। इसका बाप अनपढ़; इसकी मां अनपढ़; मर गए खेती कर करके, इन बच्चों का स्तर नहीं सुधार पाए;अनपढ़ के अनपढ़ ही रहेंगे,नीच कहीं के।”

दीपक:- “अरे मां! चुप रहो, समय का कुछ पता नहीं बहुत छोटे घर के लोग नायक,महानायक, महापुरुष हुए हैं;इतिहास साक्षी है माँ।

दीपक की मां:-“इतनी बातें कहां से बना रहा है; तू कहीं इस गंभीर की तरफदारी तो नहीं कर रहा।”

दीपक:-” नहीं मां, ऐसी कोई बात नहीं है, यह सभी बातें मुझे और गंभीर को हमारे गुरु जी ने स्कूल में बताई।
क्यों गंभीर ?बताई थी न

गंभीर:-जी……

दीपक की मां:-” चुप रह!नासपीटे।”
दीपक की माँ:-बेटे, तू मां से ज्यादा जानता है क्या?(समझाने का प्रयास करती है) मैं जानती हूं इस तरह के बच्चों को कि,’ कुछ तो कभी बन नहीं पाएंगे और हमारे जैसे बच्चों को भी अपने जैसा नालायक बनाकर बिगाड़ देंगे।

दीपक:- मां… भगवान के लिए ऐसा मत बोलो,उसको भी कष्ट होगा।

मां:- “अरे बेटे! तुम अभी छोटे हो, नहीं समझोगे, सुनो- ‘यह लोग अपने लिए कष्ट लेकर पैदा हुए हैं, कष्ट इनके भाग्य की वस्तु है। तुम्हारे भाग्य में सुख और वैभव है। तुम इनके साथ अपने को क्यों जोड़ रहे हो? इसके तो मां-बाप को भी कभी जीवन में सुख प्राप्त नहीं हुआ और ना यह लड़के कर पाएंगे क्योंकि चूहे का बच्चा सिर्फ बिल खोद सकता है।”

दीपक:-” लेकिन मां..एक कहानी में चूहे ने ही शेर का जाल काटा था।”

मां:- “यह बच्चा जिसके साथ तू खेल रहा है,वह मजदूर या खेती कर सकता है।

दीपक:- (बीच में बात काटते हुए नादानी से बोलता है) मां ..फिर मैं क्या करूंगा?

दीपक की माँ:-अरे, मेरा राजा बेटा, एक दिन अफसर बनेगा अफसर।(प्यार से गर्व के साथ बोलती है)
( दीपक की मां उसको कान पकड़ कर अंदर ले गई चल अब तू अंदर )

गंभीर नि:शब्द होकर उनकी बातों को बड़ी गंभीरता से सुन रहा था और बिना बोले विचार करता रहा कि हे !भगवान, मेरे समय की गणना करने वाली ये औरत कैसे हो सकती है। मेरी माँ तो कह रही थी सब तेरे हाथ में है।
लेकिन उस औरत के बोले गए शब्द गंभीर को हृदय तक भेद गए।उसे..उससे, क्रूर, दुष्ट ,नीच,निर्लज्ज, कोई प्राणी दिखाई नहीं दे रहा था,लेकिन क्या करे….. वह नहीं जान पा रहा था, ये शब्द उसके जीवन में सफल होने वाला बहुत बड़ा हथियार बन सकते हैं। लेकिन गंभीर के पास इस औरत को जवाब देने के लिए न शब्द थे और ना ही आज का समय उचित था।

        समय के साथ गंभीर बड़ा होता जा रहा था, सब कुछ नया पाता रहा ....बहुत कुछ भूलता रहा... लेकिन उस औरत की बात उसके मन मस्तिष्क में से नहीं निकल पा रही थी। वह सोच रहा था -कि उसने अपनी मां से सुना है कि बेटा, समय सब का जवाब देता है, लेकिन क्या इस औरत को इसकी करनी का जवाब समय देगा?

पता नहीं शायद……
ईश्वर जाने…?

इतना विचार कर गंभीर अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया लेकिन आज तक वह लौटकर दीपक के घर के आस-पास खेलने कभी नहीं गया।
उसने गांव के पिछड़े व वंचितों को ही अपना सच्चा मित्र बनाकर खेलकूद जारी रखा। उसका दीपक की मां की बातों का इतना असर हुआ कि वह अपने जीवन में पढ़ाई के प्रति बहुत ही गंभीर हो गया जैसा नाम वैसा काम काम करने लगा हालांकि गंभीर को क्रिकेट जगत से बेहद प्यार था वह देखते ही देखते अपने क्षेत्र का एक प्रसिद्ध अच्छा खिलाड़ी बन गया। बहुत से पुरस्कार व ट्रॉफी उसने अपने नाम की। बल्लेबाजी में उसकी दाद देने वाले दर्शकों की कभी कमी नहीं रही। गंभीर के पिताजी इतने सरल स्वभाव के थे, उन्होंने गंभीर को कभी एक थप्पड़ भी नहीं मारा था, ना ही उसके किसी काम में कभी रोक टोक की,लेकिन अपने सभी पुत्रों में सबसे ज्यादा भरोसा गंभीर पर ही था क्योंकि गंभीर के पास ईमानदारी,होशियारी, निपुणता नैतिकता ,सदाचार, सद्भावना परोपकारी,गुण कूट-कूट कर भरे थे।इन सभी गुणों से एक अच्छा व बड़ा गुण उसके अंदर था, वह था सरलता।…. इस पर तो भगवान भी रीझ जाते हैं। फिर इंसान की क्या औकात है?

फिर भी एक दिन उसके पिताजी ने गंभीर को समझाते हुए कहा-“बेटा,हम गरीब व कमजोर किसान हैं; खेती एक जुआ है, जिसमें सबसे ज्यादा हारना पड़ता है। यह खेल ऐसो आराम हमारे लिए नहीं है;मेरी बहुत जिंदगी किसानी में गुजर गई ,फिर भी तुम्हारी उदर पूर्ति करने में असमर्थ हूं।”

गंभीर:-तो मुझे क्या करना चाहिए पिताजी?

पिताजी:-“बेटा, जो मेहनत तूने एक अच्छा खिलाड़ी बनने में की है… केवल इसकी आधी मेहनत तू अपनी पढ़ाई पर करेगा तो,ईश्वर ने चाहा तो एक दिन निश्चित ही सफल होगा और हमारा आशीर्वाद सदा तेरे साथ रहेगा।

उस पिता ने कितनी सरलता से उस बच्चे को समझा दिया; वह भय और पिटाई इस कार्य को शायद..ना कर पाती….
पिता के द्वारा कही गई सभी सार्थक बातें गंभीर के दिमाग में घर कर गई और उसने बेजोड़ मेहनत की, सबको पता है मेहनत कभी खाली नहीं जाती उसे सफलता मिलना तय था।और उसनेपढ़ाई पूरी करली।
इसी बीच गंभीर के पिताजी एक असाध्य रोग से गंभीर रूप से पीड़ित हो गए। लेकिन पिताजी ने गंभीर के कानों में यह खबर केवल हल्के स्तर पर ही पहुंचवाई जिससे उसकी पढ़ाई पर कोई असर न पड़े, आखिर पिता तो पिता होता है। पिताजी को लगा कि मेरी जिंदगी का क्या भरोसा, लगे हाथों गम्भीर की शादी हो जाती तो जी हल्का हो जाता।शायद समय को भी यही मंजूर था एक पास के ही गांव से भावना नाम की
लड़की की शादी बड़ी धूमधाम से गंभीर के साथ हो गई।सभी अल्पज्ञ लोग ये चर्चा करने लगे कि अब गंभीर की शादी हो गयी अब ये पढ़ा लिखा बेरोजगार घूमेगा।लेकिन भावना का सौंदर्य व सादगी देखते ही बनती थी । वह एक समझदार, सुलझी हुई स्त्री थी।शायद अपने पिता के संस्कारों की छाप उस पर थी,भाग्य की बहुत प्रबल थी उसके आते ही सफलता के सारे द्वार खुल गए।और छोटे बड़े भाई बहनों ने भी गंभीर का साथ भरपूर दिया।पिताजी के बीमार होने के बाद पूरा परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था,तब गंभीर को लगा कि मुझे भी अब काम करना चाहिए, तो फिर पढ़ा लिखा गंभीर करता क्या?और उसने एक निजी शिक्षण संस्थान में कार्य करना शुरू कर दिया।
वही उसकी मुलाकात उसी निजी शिक्षण संस्थान में कार्यरत एक योग्य व सज्जन और अनुभवी शिक्षक से हुई। वह पहले से ही उस संस्था में पढ़ा रहे थे। और गंभीर हाल ही में पहुंचा था। उनके विचारों का असर गंभीर पर होने लगा और दोनों के एक भाव,एक गुण मिलने से कुछ ही दिनों में दोनों अच्छे मित्र हो गए।उन्होंने गंभीर को हर संभव सफल बनाने का प्रयास किया।गिरते को ढांढस बंधाया; हिम्मत दी;और लगन से काम करने के लिए प्रेरित किया दोनों मित्रों में कहीं बड़े छोटे का विचार नहीं था। था.. तो केवल समभाव या सामानुभूति।

 एक बार शासन ने सरकारी नौकरी के लिए विज्ञापन निकाला जिसमें गंभीर के मित्र ने उसमें भाग लेने के लिए प्रेरित किया और वैसा ही  हुआ जैसा नियति को मंजूर था ....और उसने वह भर्ती प्रतियोगी परीक्षा अच्छे अंकों से उतीर्ण की औऱ अंततः उसका चयन सरकारी सेवा में हो गया क्योंकि मेहनत ईमानदारी किसी की मोहताज नहीं होती।

           समय के लंबे अंतराल के बाद आज वह घड़ी आ गई कि वह बालक अपनी लगन मेहनत ईमानदारी और नैतिकता, मित्रों का साथ और आशीर्वाद पाकर 'गुदड़ी का लाल' साबित हो गया।

     आज का दिन बड़े हर्षोल्लास का दिन था माता-पिता दोनों ही अत्यंत प्रसन्न थे उनके गले खुशी के मारे रुँध गए थे;आंखों में खुशी के आंसू नजर आ रहे थे। 

जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति पानी की कीमत, एक भूखा व्यक्ति रोटी की कीमत, एक गरीब व्यक्ति पैसे की कीमत, एक घायल व्यक्ति दर्द की कीमत,और एक बेरोजगार व्यक्ति नौकरी की कीमत जान सकता है; उसी प्रकार आज की कीमत पूरे परिवार को समझ आ रही थी।परिवार के सभी सदस्यों के अरमान आज पूरे होते दिख रहे थे, चर्चाएं होने लगी अब पिताजी का ढंग से इलाज हो सकेगा;बेटी की शादी बड़ी धूमधाम से हो पाएगी ;शहर में मकान बन पाएगा; कर्जदारों के कर्जे चुकाये जा सकेंगे और खाने-पीने की तंगी से नहीं जूझना पड़ेगा; सेठ साहूकारों के पुट्ठे नहीं सहलाने पड़ेंगे,ऐसे बहुत सारे कांटे इस एक नौकरी से निकलते नजर आ रहे थे।
इस तरह की बातें सुनकर गंभीर के माता पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो गया था, गंभीर बार-बार ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था, माता पिता के चरणों को गंभीर ने ऐसे चूमा कि सब इनके आशीर्वाद का ही परिणाम है। और बात भी सही थी उन गरीब आत्माओं का आशीर्वाद आज फलीभूत हो गया था लेकिन जब यह बात पूरे गांव में फैल गई, गांव के लिए यह घटना एक उदाहरण बन गई ।
जब यह बात दीपक की मां के कानों में पहुंची तो उसकी छाती पर सांप लोटने लगा, वह इसको स्वीकार नहीं कर पा रही थी;वह बोली यह सब झूठी खबर है। ऐसा कैसे हो सकता है?मेरा बेटा उससे ज्यादा होशियार था जो आज तक चपरासी भी नहीं बन पाया ,वह कैसे लग सकता है। असंभव!
लेकिन समय की विडंबना बड़ी विचित्र है उसको तो जवाब देना था वह भी मयसूद के।

गम्भीर की सफलता के लिए माता पिता ने ईश्वर से जो मन्नतें माँगी थी वो आज पूरी हो गईं थीं अतः उसकी माँ ने गम्भीर के पिता को कहा कि मैं गम्भीर को लेकर ईश्वर
को धन्यवाद देने मंदिर जा रहीं हूँ,मंदिर जाकर दोनों ने ईश्वर की पूजा अर्चना की, ईश्वर को धन्यवाद दिया,पूजा करके वो दोनों मंदिर की सीढ़ियों से उतर रहे थे इतने में गम्भीर की नज़र दीपक और दीपक की माँ पर पड़ी,शायद वो भी मंदिर आये थे,गंभीर उत्सुकता से उनके पास पहुंचा और दीपक मां के पैर छुए फिर दीपक को गले लगाया,(दीपक की माँ की ओर देखकर)आपके आशीर्वाद से मेरी सरकारी नौकरी लग गयी है।

गंभीर:-लो आप मिठाई खाओ,ईश्वर ने मुझे समय के साथ सफलता दी है।

दीपक की मां:-अरे, लेकिन यह मिठाई मुझे क्यों खिला रहे हो?

गंभीर:-क्योंकि, इस सफलता में तुम भी मेरी सहायक हो।

दीपक की मां:-(आश्चर्य से )वो कैसे?

गंभीर:- यदि तुम उस दिन मुझे भला बुरा ना कहती तो शायद मेरे अंदर यह लगन की आग नहीं लगती और आज सफल नहीं हो पाता।(गम्भीर ने यह बात बड़े विनम्र भाव से कही) दीपक की मां:-ऐसा मैंने क्या अच्छा कह दिया?

गंभीर:- याद करो उस दिन के वाक्यों को जो तुमने मुझे दीपक के साथ खेलते हुए सुनाए थे उस समय मेरे पास कोई जवाब नहीं था।लेकिन आज उन सारे प्रश्नों के जवाब ईश्वर के दरबार में समय स्वयं लेकर खड़ा है।
( दीपक की मां बहुत शर्मिंदा थी)

दीपक की माँ:-बेटा,मुझे माफ कर दो (दोनों हाथ जोड़ती है)मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है। बहुत सी ऐसी दीपक की मां है उन सब को सुधरना होगा।और ओछी मानसिकता से उभरना होगा,
खैर..चलो आज मुझे अहसास तो हुआ इतना ही काफ़ी है।

गम्भीर:-अरे!आप ऐसा क्यों कह रही हैं(दोनों हाथ जोड़ते हुए)

दीपक की माँ:-सही बात है बेटा, कभी किसी की कमजोरी व गरीबी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।

गंभीर:- हमें आपस में जाति, धर्म वंश,भेद के आधार पर तथा अमीर गरीब के आधार पर कभी अलग नहीं रहना चाहिए हम सब एक हैं उस ईश्वर की संतान।

दीपक:- वाह मेरे मित्र!मुझे तुम पर गर्व है।(खुश होते हुए)

गंभीर:- लो दीपक तुम भी मिठाई खाओ( मिठाई देता है)
तुम अपनी जगह पर सही हो देख लेना तुम भी एक दिन निश्चित ही सफल हो जाओगे।

दीपक:-मां…मैंने कहा था ना कि समय सबका आता है अच्छा और बुरा भी।
फर्क केवल तुम्हारी और हमारी समझ का है।

गंभीर:-हां,दीपक मेरे मित्र, समय सबको जवाब देता है लेकिन समय से देता है; बस सब्र करना पड़ता है क्योंकि सब्र का फल मीठा होता है ।

गंभीर:-सभी को नमस्ते!
मैं चलता हूं….(गंभीर चला जाता है )

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“चुगल खोर”(मुक्तक)

१.जो लाखों में नहीं भाते वो आंखों में खटकते हैं।
मिले सम्मान ना उनको जमाने में भटकते हैं
किसी के हो नहीं सकते भला कर ही ना पाएंगे
पछतावे में आकर के वो सिर को भी पटकते हैं।

२.लोगों के भरे हैं कान लोगों की बुराई की।
जो चीज़ अपनी थी वो लोगों की पराई की।
घरों को तोड़कर ठंडक मिली थी उनके दिल में तो
कभी लड़ते नहीं लोगों ने आपस में लड़ाई की ।

३.चुगलखोरों की बातों में कभी पड़ना नहीं है यार
किसी के कान भरने पर कभी लड़ना नहीं है यार
रहेगी बुद्धिमानी जब कभी तू सत्यता जाने
बिछाए हैं तुझे कांटे कभी चढ़ना नहीं है यार।

४.बुरा तेरा वो चाहेगा तेरी कमजोरी समझेगा
वो मीठा बोलकर के तो तुझे नादान समझेगा
मतलबी काम करने को बनेगा तेरा शुभचिंतक
तू धोखा खाएगा एक दिन तभी तो तू रे समझेगा।

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“जरूरत बनाम लालच”

यह बात बिल्कुल सही है कि जरूरतें आदमी को मुसाफिर बना देती हैं लेकिन ध्यान रहे.. जरूरत इंसान को लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रेरित करती है यदि हमारी जरूरतें खत्म हो जाए तो आदमी बिल्कुल निष्क्रिय हो जाएगा।
जरूरत वह है जिसकी आवश्यकता की पूर्ति करना मनुष्य का पहला कर्म है। कभी-कभी लोग जरूरत और लालच को अपने जीवन की आवश्यक वस्तु मानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है जो आवश्यक है वही जरूरत है तथा जरूरत ही आवश्यकता है, जो व्यक्ति को पूरी करनी होती है, लेकिन लालच को पूरा करने की कोई जरूरत नहीं होती है।
उदाहरण के तौर पर मनुष्य के लिए एक घर होना तो उसकी जरूरत है लेकिन अधिक घरों की कामना करना एक प्रकार का लालच कहा जाएगा ।
दूसरे अर्थों में, पारिवारिक भरण पोषण के लिए धन कमाना तो एक जरूरत हो सकती है, लेकिन अधिक धन की लालसा में दूसरों का अहित करके धन कमाना लालच है।

कभी ना पूरी होने वाली लालसा या भूख का नाम लालच है ।जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरत को लालच कभी न बनने दें क्योंकि लालच तो बुरी वस्तु है, जिसकी जरूरत ही नहीं है लेकिन कुछ महत्वाकांक्षी लोग लालच का सहारा लेते हैं लालच अपराध की मानसिकता को बढ़ावा देता है ।लालची व्यक्ति कोई भी अपराध करने में नहीं चूकता, इसलिए विद्वानों ने लालची लोगों से दूर रहने की सलाह दी है क्योंकि उन्हें लालच को पूरा करने के लिए मनुष्य ईमानदारी, सत्यता,परोपकार,सदाचार संतोषी, संयमी आदि ऐसे श्रेष्ठ गुणों का दमन कर देता है लेकिन इसके भयंकर परिणामों के बारे में उसको शायद पता ही नहीं होता।
लालच किसी भी वस्तु का हो सकता है लेकिन जरूरत हर वस्तु की नहीं होती, लोग जरूरत से अधिक चाहने की चाह में लालची बन जाते हैं ।लालच मनुष्य की की बुद्धि का हरण करता है, और जरूरत बुद्धि को विचारणीय तथ्य प्रदान करती है।आवश्यकता एक जरूरत है लालच एक बहुत गहरी खाई की तरह ही होता है जरूरत में इंसान उभरता है तथा मजबूत व बेहतर बनता है ,लेकिन लालच रखने वाला इतनी गहरी खाई में गिर जाता है कि वहां से निकलना इतना आसान नहीं होता।
जरूरत को तो समय के साथ पूरी होने की संभावना रहती है लेकिन लालच समय के साथ बढ़ता ही जाता है उसकी लालची भूख और प्यास में किसी भी तरह की तृप्ति नहीं हो पाती है ।जरूरत में जितना मिल जाने पर तसल्ली हो जाती है लेकिन लालच कभी पूरी ना होने वाली प्रक्रिया है।
अंततः मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि लालच बुरी बला है ,जरूरत को लालच न बनने दें, जो जरूरत पूरी हो उसमें संतोष करके ही सुख का अनुभव करना चाहिए ।

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“बागवान” – स्वरचित(गीत शैली)

हे मेरे बागवान तेरी,खेती उजड़ रही है।
पेड़ो की कैसी छाया,जड़ से उखड़ रही है।
हे मेरे बागवान…………………..
भरे हुए परिवार थे,आनंद आये बाग में
शहरीकरण बड़ा हुआ,वो तो लगे हैं भाग में
है चार दिन की चाँदनी, मिलके जियो तो भाई
जननी थी वो तुम्हारी, लगती है तेरी माई
रिश्तों के तार टूटे,अब दामन पकड़ रही है
हे मेरे बागवान………………..
बेटियां चली गईं, बेटे पड़े हुए हैं
हिस्सों को लेने बाप से,वो तो अड़े हुए हैं
कितने बड़े त्यौहार तो, जैसे कि हो गए
रिश्ते रहे ना भाव के, पैसे के हो गए
संतान आजकल की प्रतिपल, बिगड़ रही है
हे मेरे बागवान………………
पौधों की रक्षा करते, जीवन खपा दिया
फिर भी पूछे माली से,क्या वफ़ा किया
रोटी कपड़ा और मकान,सब कुछ लुटा दिया
यह बागवान की कहानी,सबको बता दिया
संकटो की बादरी ऊपर, उमड़ रही है
हे मेरे बागवान………………

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“नशा मुक्ति” – स्वरचित (गीत शैली)

आज नशेड़ी भाइयों की
आदत को हम बतलाते हैं।
जाकेट की पॉकेट में भैया
बंडल बगल दबाते हैं ।
लोग नशे में झूमे हरदम,
अपनी सरकार चलाते हैं ।
पान सुपारी गुटखा तम्बाकू
खुलकर खूब चबाते हैं ।
चीज नशे की हर जीवन
को ही बर्बाद बनाते हैं
रोक-टोक करने पर वो
शिव का प्रसाद बताते हैं।
शब्द सही निकले ना उनके
वो हर पल हक लाते हैं।
जैकेट की पॉकेट में भैया
बंडल बगल दबाते हैं।

किसी के मुंह में छाले पड़ते
किसी को पेट के लाले पड़ते।
नशे की आदत में ही पड़कर
आपस में ही लड़ते रहते ।
नशा नाश कर देगा भाइयों
डोलोगे के दाने दाने को ।
बड़ा कटोरा हाथ में होगा
फिर ना डालें कोई खाने को ।
चाल सही चल ही ना पाए
फिर भी क्यूं इठलाते हैं ।
जैकेट की पॉकेट में भैया
बंडल बगल दबाते हैं।

गांजा चरस अफीम शराबी
क्यों इनको पी जाते हैं ।
पड़ने पर लत इसकी भी तो
कुत्ते से भौंकाते हैं ।
नशा करोगे प्रतिद्वंदी को हरा
कभी ना पाओगे।
मौत मरोगे
कुत्ते की सी जीत कभी ना पाओगे
साथी चार मिलेंगे ऐसे वो तुमको
वो बहकाते हैं।
जैकेट की पॉकेट में भैया
बंडल बगल दबाते हैं ।

जीवन चार बंधे हैं तुमसे
उम्मीदों को मत तोड़ो।
अपने लिए सभी जीते हैं
उनसे मुंह को मत मोड़ो ।
नशा किया है जिसने भी
वह पूरा जीवन नहीं जिया।
कितना कमा लिया पैसा
पर ढंग का भोजन नहीं किया।

नशा मुक्ति की बात सुनो
अब सबको हम बतलाते हैं ।
खा लो सभी कसम जन भाई
नशा नहीं अपनाते हैं ।
आज नशेड़ी भाइयों की
आदत को हम बतलाते हैं ।
जैकेट की पॉकेट में भैया
बंडल बगल दबाते हैं ।

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“शिक्षक” मतगयंद – सवैया छन्द स्वरचित

शिक्षक तौ सिगरे जग में जन
नायक दीपक लौकिक भारी ।
ज्ञानन से परिपूरन होकर
जानत है जग मानत भारी ।
मात पिता गुरु मारग के सब
पंथ दिखावन साधक भारी ।
शिक्षक के बिन ज्ञान नहीं
तब पूजहिं शिक्षक कौं जगभारी।

नायक है खलनायक है,
कितने मुखड़े लगवावत है जी ।
मात-पिता सब पीछे हटे तब
थामि लयौ शिष डूबत है जी ।
कारण एकु न जानत है हम
रूप सखा गुरु देखत है जी ।
आज गुरूजन की करुणा कम
क्षोभ भयो अति पावत है जी ।

बालक आपन छोड़ि दिए
तब चेलनि कौं सब पाठ पढ़ाए।
शिक्षक का ऋण ना चुक पावत
शीश कटे शिष लाख चुकाए।
जीवन का सब सार दिया
हम खेलत कूदत पंथ बढ़ाए।
छैनि हथौड़ी की चोट बने गुरु
मूरति का निरमाण कराए ।

मात पिता गुरु मारग के पग
संकट दूर उड़ा वन हारी ।
आपन संकट झेलि रहे परि
तो पर आँच न आवन वारी ।
जो जन शिक्षक कौं कम आँकत
तापर आवत संकट भारी ।
मानत जो नहिं शिक्षक की गति
हाँसत लोगन देकर तारी।

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“राजनीति”( स्वरचित)- मनहरण छंद

१.राजनीतियों का बोझ,
देश पै पड़ा है आज
छिन्न-भिन्न हो गई है,
देश की अखंडता ।
झंझटों के झंझावत,
उलझाते हैं केस को,
राजनीति बात करे,
देश में प्रचंडता।
खाते देश में है वो,
जीते देश में है वो,
रख नहीं पाते हैं वो,
आपसी समानता ।
जाति धर्म वंश भेद
सब कर डाले यहां,
कैसे आज बचा लोगे,
देश की महानता।

२.गाड़ दिए कैसे बीज,
आपसे बचाई चीज,
सुलझी हुई समस्या को,
उलझा रहे देश में ।
बाला हरदेवी यहां,
रूप बलराम का है ।
नागरिक ठगे यहां,
सादगी के भेष में।
काम को निकाल कर,
देश को बहाल कर,
देश ना रहा तो हम ,
रहे किस देश में ।
आये हैं जहाँ से जन,
देश में बसाए तन
सीना जोरी करता तू,
मेरे ही तो देश में।

३.देश जब महान था ,
नागरिक किसान था।
चिड़िया बना सोने की,
विश्व गुरु हो गया ।
जयचंदों की भरमार ,
युद्ध होता बार-बार ,
हर छोटी बात पर,
युद्ध शुरू हो गया ।
देश पै उठाई आंख ,
दुश्मन रहा था ताक
मेरे महाराणाओं का,
भाला क्रुद्ध हो गया ।
चीर देंगे फाड़ देंगे ,
पाक तुझे गाड़ देंगे
बेटा तू रहेगा बाप
हिंदुस्तान हो गया ।

४.पुलवामा अटैक का ,
भारत मां हरेक का
हिसाब मांग रही है ।
शहीदों के त्याग का
एक वीर ऐसा जन्मा,
आ गई है याद अम्मा
पाक को दिया जवाब ,
मय सूद ब्याज का
सैनिकों के साथ धोखा
करके किया शहीद ।
पीठ पीछे वार किया ,
विस्फोटक आग का
शेरों ने दहाड़ कर ,
मारा घर घुसकर ।
फन को कुचल दिया
‘आतंकी के नाग’ का ।

५.देश के गद्दारों को,
छिपे ही मक्कारों को
भारत मां के साथ
रहने का हक छीन लो ।
भारत के भक्तजनों ,
एकमत होके सुनो
कपटी दुष्ट कायरों को ,
चुनकर बीन लो ।
भारत के बारे में तो ,
जान लो इशारों में तो
इतिहास देश का ही ,
देख लो प्राचीन लो
सैनिकों को हल्के में ,
तोल मत लेना पाक
आदेश है सैनिकों को
मामले संगीन लो ।

६.धर्म जाति के हैं अंधे ,
कर रहे उल्टे धंधे
देश में अशांति के ,
भाव को फैला रहे ।
जिस मां का दूध पिया ,
उसी मां को नोच खाया
राक्षसों के दूत हैं वो ,
फन को फैला रहे
देश को किया गरीब ,
दुष्टों के वो हैं करीब
भोली भाली जनता को ,
रात दिन सता रहे
मेरा देश महान है ,
विश्व गया जान है
मेरे इस देश का तो
भेद क्यों बता रहे ।

७.दुष्टों को शरण दी है ,
लाज शर्म छोड़ दी है
गंदी राजनीति का वो
खेल खेला करते हैं ।
धन से भरे हैं घर ,
सोचते नहीं है पर
उनके अत्याचारों को
ये वीर झेला करते हैं ।
सीमा पर डटे हैं वीर ,
शत्रु को देते हैं चीर
आग में वीरों को तो
वो धकेला करते हैं ।
लाख-लाख कोटि कोटि ,
उनको प्रणाम है तो ,
काम देश रक्षा का तो
वो अकेला करते है ।

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“उम्मीद”( स्वरचित कविता)

रात के अंधेरे में सुबह के प्रकाश की उम्मीद होती है।

कायरता से हार की बहादुरी से जीत की उम्मीद होती है।

निराशा से असफलता की और आशा से सफलता की उम्मीद होती है।

क्रोध से विनाश की और प्रेम से प्यार की उम्मीद होती है।

अकेले में मौत की और साथ से जिंदगी की उम्मीद होती है।

बैठने से कुछ ना होगा चलने से मंजिल की उम्मीद होती है।

चांद तारे चाहे जा डूबे लेकिन चमकने की उम्मीद होती है।

मंदिर मस्जिदों में ना मिले भगवान,
फिर भी उनके होने की उम्मीद होती है।

रोज करो नित नए काम तो देश के विकास की उम्मीद होती है।
एक लिखूं मैं आज पंक्ति कल चार की उम्मीद होती है

कल्पना के देखूं सपने कल साकार होने की उम्मीद होती है ।

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वो बचपन कहां है?(लेख)

एक सुबह मैं रोज की तरह बिस्तर से उठा, मेरे मन मस्तिष्क को एक पीड़ा परेशान कर रही थी ।मैं अपने दोनों मासूम बच्चों को करुणा भरी दृष्टि से देखते हुए, जो कि सुबह विद्यालय जाने के लिए आनाकानी कर रहे थे। मैंने उनकी तरफ देखकर अपने आप से प्रश्न किया कि, हमारे जैसा बचपन आज कहां रह गया है, मुझे सबसे ज्यादा करुणा आज के प्राथमिक विद्यालय के बच्चों पर आती है जो निजी शिक्षण संस्थाओं के एक बंधुआ विद्यार्थी हैं। उन नौनिहालों के साथ इतना क्रूर व्यवहार देखकर जब हम अपने बचपन की तुलना करने लग जाते हैं, तो याद आता है कि हमारा बचपन बाल गोपाल श्री कृष्ण की तर्ज पर व्यतीत हुआ था, लेकिन आज के बचपन की व्यथा लिखने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं, क्योंकि हमारे बचपन के सब खेल ही निराले थे।और आज बचपन रह ही नहीं गया।शायद हम लोग आज भी अपने बचपन को याद करते हैं।और सोचते हैं काश… फिर वह समय लौट आए ,बचपन में दिनभर खिलौनों से खेलना, मां के बुलाने पर भी छुप जाना, बचपन के मित्रों के साथ भरपूर मस्ती।

अब इस दौड़ भाग कि जिंदगी में बच्चे भी व्यस्त हो गए हैं ,उनका बचपन मानो खो सा गया है।
सुबह से स्कूल जाने की डरावनी भागदौड़ शुरू हो जाती है ।वह शाम को ट्यूशन पर जाकर खत्म होती है। जो समय मिलता है वह टीवी देखने पर चला जाता है। या फिर आज के सबसे खतरनाक खिलौने मोबाइल पर।

उनके हाथ से तो खिलौने शायद छूट से गए हैं बाजार और मेलों में रखे खिलौने बच्चों के इंतजार में रखे रहते हैं लेकिन खिलौनों के नसीब मैं अब केवल सूनापन है ।
जैसे हम लोग अक्सर कहते हैं कि काश …..मेरे बचपन के दिन फिर से लौट आएं, लेकिन कल यह आधुनिक बच्चे बड़े होकर अपने बचपन में, द्वारा आने की कल्पना करने से डरने लगेंगे क्योंकि, इनका बचपन भार युक्त हो गया है हमारा बचपन बिल्कुल स्वच्छंद था।
इन मासूमों के साथ खेलने को संयुक्त परिवार नहीं रहे।
एकल परिवार हो गए, दादा दादी का साथ छूटा ,चाचा चाची दूर हो गए ,पिताजी को अपने दफ्तर नौकरी से समय नहीं, मां के पास काया श्रंगार व मोबाइल की बनावटी दुनिया से समय नहीं ,रिश्तेदार आते जाते नहीं ,
घर द्वार सूने हो गए ,मैदान और दालानों का अभाव हो गया, रहने के लिए जगह बहुत सीमित हो गई ,
खाने को पौष्टिक आहार नहीं रहे, ऊपर से पढ़ाई के बस्ते का बोझ ।

ढेर सारा गृह कार्य और आधुनिक खेल उपकरण मोबाइल का अत्याधिक प्रयोग।
इस तरह की अत्याधुनिक सुविधाओं में बचपन का दम घुट रहा है अब बताइए वह फूल सा बचपन अब कहां है? वह दादी की कहानी, दादाजी के कंधे ,
बाल गोपाल कृष्ण की तरह धूल भरा सौंदर्य बिखेरता वह बचपन आज कहां है?
आज घर में मेरे खुद के ही बच्चे आपस में खेलते हैं, वह बच्चों की टोली वाला बचपन अब कहाँ है?

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“नेता” (सवैया छन्द)

नेतनि की जब वोट परी तब,
हाथन जोरि परे लिपटाई।
जीत गए तब पास नहीँ किस,
हालन में सब लोग लुगाई।।
आपन काम बनाकर देखत,
लोगन की नहिं बात सुहाई।
बोलत शाम सुबेरिन झूठ,
बनावत मूरख हैं सब भाई।।

वोटन कौं जब माँगि चले तब,
मीठीनि वानीनि बोल रहे हैं।
पूछि रहे हर हालन कौ जन,
हाथन से दुख बांट रहे हैं।
भोजन साथ में बैठि करैं,
सबकौं घर पाठ पढ़ाय रहे हैं।।
पैरन में सिर धाय दयौ कह,
तो बिन आजहुँ हारि रहे हैं।।

23 thoughts on “प्रेमनारायण शर्मा

  1. बहुत सुंदर लेखनी है आपकी आप इस विद्या में और शिखर तक पहुंचो।

    आपका शुभ चिंतक
    एल एन कुशवाह
    शिवपुरी

    1. बहुत सुंदर लेखनी है आपकी,,, जिसका कोई वर्णन नहीं किया जा सकता
      मैं आपके उज्जवल की कामना करता हूं

    2. प्रेम आपकी कविताओं ने मन मोह लिया आप तो छुपे रुस्तम निकले मास्टर जी

  2. श्रीमान ,
    आपका आशीर्वाद रहेगा तो जरूर होगा,

  3. बहुत ही श्रेष्ठ काव्य संग्रह सराहनीय ।ऐसे ही साहित्य जगत में नाम कमाओ और आगे बढो ।

    1. आदरणीय बहुत ही सुंदर व मार्गदर्शक काव्य है
      बहुत बहुत साधुवाद

  4. इसी प्रकार लिखते रहे, काव्य रसमयता और धारा प्रवाह सुगमता लाये🙏

  5. बहुत सुन्दर,
    आशा करता हूं कि आप अपनी ऐसी सारगर्भित रचनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य को सदैव अलंकृत करते रहेंगे।
    जय हिन्द,जय मां भारती।।

    1. बहुत ही सुन्दर लिखते है आदरणीय बड़े भाई साहब हम्हे आपकी कविता में जीवन से जुडी गहराई से परिचय हुआ lakshya ,! कविता बहुत अच्छी लगी

  6. बहुत सुंदर है श्रीमान जी आपकी कविताएँ God bless you

  7. आप तो महान कवि बन गये साथी
    आपकी कविताओं में देशप्रेम, मां की ममता, देशभक्ति , प्रकति प्रेम, पर्यावरण संरक्षण, कर्तव्यनिष्ठता तथा भारतीय संस्कार और संस्कृति का विस्तृत साकार चित्रण किया गया है।

    धन्य हुए हम सब मां भारती के ऐसे लाल को पाकर
    जय हो
    जय श्री कृष्ण

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जादौन जी
      आप उत्साहवर्धन हमें ऊर्जा देता रहेगा

  8. बहुत ही सुंदर और सटीक रचना ऐसे ही रचनाएं करते रहो और साहित्य में अपना नाम रोशन करते रहो।

  9. आपकी रचनाएँ । आपके व्यक्तित्व की छबि को दर्शाती है मित्र।

    आशा है आप मित्रता पर एक कविता लिखें ।

    ईश्वर आपको इस क्षेत्र में उचाईयों तक पहुंचाए।

    आपका मित्र
    एक शिक्षक साथी

  10. मित्रता पर आपने जो कबिता मेरे आग्रह पर लिखी उसके शब्दों ने मेरा मन मोह लिया । प्रेम पर कबिता की रचना वाह क्या शब्दों का बेजोड़ संगम किया है जैसा नाम बैसी ही रचना।

    मैं एक बार फिर आपके उज्ज्बल भविष्य की कामना सह्रदय से करता हूँ।

  11. प्रेमनारायण शर्मा जी, आपकी कुछ कविताएं मैंने पढ़ीं, जो बेहद अच्छी लगीं । । आप साहित्य के इस प्लेटफार्म पर हमारे धौलपुर शहर का नाम रौशन कर रहे हैं । मां सरस्वती के भंडार में इसी तरह श्रीवृद्धि करते रहिए ।

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