डॉ. पं. सिनोद कुश

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जीवन परिचय: डॉ.पँ.सिनोदकुश उत्तरप्रदेश के सहारनपुर शहर के रहने वाले हैं | उनके अनुसार जीवन को छूकर, कुछ विशिष्ट क्षणों ने जब अहसास की परतों को उकेरा , तो शब्दों ने जीवन की दिशा-दशा का निर्धारण करने का मार्ग प्रशस्त किया | गाँव में जन्मे पँ.सिनोदकुश और साथ जन्मी अविस्मरणीय अनुभूतियाँ एवं संवेदनायें जो परिपूर्ण सत्य की काव्यात्मक और लयात्मक अभिव्यक्ति मात्र है, जिसे उन्होंने हृदय में पूर्ण आन्तरिकता के साथ प्रत्येक क्षण में सहेजा, जिया और भोगा भी | वो कहते हैं कि आध्यात्मिक और सामाजिक सफ़र अविरल नदी की धारा है, जिधर जिधर वह बहती है उधर उधर घाट बनते जाते हैं ! कवि की आत्मा कुशल तैराक की तरह प्रत्येक घाट की अनन्त गहराई की तह तक पहुँचकर अपने सम्बन्ध बना लेते हैं | हर तरह का सृजन गीत, कविता, गज़ल, भजन, हाइकू | उनकी प्रकशित पुस्तकें हैं “दैनिक पूजन विधि”, “ज्ञान मुक्ति मार्ग”, और “श्रीश्री पंचमुख हनुमान चालीसा” |

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“श्री बाला बजरंग शिव अवतारी”

श्री बाला बजरंग शिव अवतारी, जय कपिश प्रभु रूद्र अवतारी,
पवन तनय सन्तन हितकारी, जय कपिश प्रभु रूद्र अवतारी,..

मंगल मूर्ति मारूत नन्दन, सकल अमंगल मूल निकन्दन,
जय आदित्य अमर अविकारी, जय अरिमर्दन जय गिरधारी,
गर्व हरण गुण शील निधाना,… 2
हे कपिश प्रभु रूद्र अवतारी……..

नाथ सदा शिव कर अवतारा, गर्व शून्य जग कपि तन धारा,
जलधि निशाचर कीन्ह प्रहारा, ताहि निपाति लंकिनीहि मारा,.
खल दल हत भू भार उतारा,…. 2
हे कपिश प्रभु रूद्र अवतारी….

तुममें तुमसे है जग सारा, सारी सृष्टि में वास तुम्हारा,
रूद्र रूप जग गुरू करूणा कर, जयति जयति जै जै कमलेश्वर,
तात-मात सखा, जग के स्वामी,…. 2
हे कपिश प्रभु रूद्र अवतारी,………

शरणागत पालक प्रति पालक, भव भय भंजन सृष्टि नायक,
पावन परम पवित्र प्रिय प्यारा, अगम अगोचर नाम तिहारा,
कण कण वासी अन्तर्यामी,… 2
हे कपिश प्रभु रूद्र अवतारी…….. ———————– १५ अगस्त २०१९ |

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“सरस्वती वन्दना”

करूँ मैं वन्दना तेरी हे विद्या ज्ञान वर दाते…
तर्ज……??
करूँ मैं वन्दना तेरी, हे विद्या ज्ञान वर दाते,
तेरी कृपा से महके है, सारा संसार जग माते,
करूँ मैं वन्दना तेरी,………..

देव अवतार ऋषी योगी, पायें वरदान माते से,
ज्ञान बुद्धि कला सागर, वीणा सरगम है माते से
है विद्या सप्त स्वर तू ही, सृष्टि आधार है माते,
करूँ मैं वन्दना तेरी,…….

हँस वाहन तेरा आसन, उडे जलथल तू नभ पलमें,
तेरी मरजी से शुक शारद, गायें नारद भी वीणा में,
तेरी झँकार की गूँजन, देव अवतारों में माते,
करूँ मैं वन्दना तेरी,……….

सबसे ऊँचा तेरा आसन, दयादृष्टि करो माते,
तनहै निर्बल, मनहै चंचल, संभालो अब मुझे माते,
“कुश” की वाणी पे आ बैठों, अरज चरणों में है माते,
करूँ मैं वन्दना तेरी,…….. १० अगस्त २०१९ |

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