डॉ जितेंद्र कुमार लोहनी

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जीवन परिचय: डॉ. जितेंद्र कुमार लोहनी का जन्म १ जुलाई १९७५ को हुआ था, इन्होने अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. की हुई है| जितेंद्र जी को कहानी लेखन का बेहद शौक है, कहानी लेखन के अलावा घुमक्कड़ी और फोटोग्राफी का भी शौक है | कहानियों से सम्बंधित इनकी एक पुस्तक ” पलायन – एक व्यथा” प्रकाशित हो चुकी है। जितेंद्र जी वर्तमान में कुमाऊँ विश्विद्यालय नैनीताल में अध्यापन कार्यकरते हैं |

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“गुड़” (कहानी)

“टोकरी बिक जाल तो मुणि गुड़ ली आया ….. कतुक दिन बटी मन करणो खाण हुनि ……” ( टोकरी बिक जाएंगी तो थोड़ा गुड़ खरीद लाना …. बहुत दिन से खाने को मन कर रहा है ……) सिर पर निगाल की बनी टोकरी रखे हाट से लौटते रघुका को काखी के सुबह कहे शब्द याद आ रहे थे ……. काले रंग के मोटे फ्रेम के चश्मे के भीतर उनकी आँखें गीली थीं क्योंकि आज तो कोई टोकरी बिकी ही नहीं थी।

कल रात तक लंफु के उजाले में टोकरी बुनने में लगे थे ताकि ज्यादा टोकरी बिकें तो कुछ दिन के खाने का इंतेज़ाम हो जाये फिर अब चौमास भी तो लगने वाला था ……. चौमास में तो बहुत ही परेशानी होती है ……. गाँव से बाजार आना दूभर हो जाता है …… इस उम्र में तो और भी कठिन …..पहले तो कितने चक्कर लगाता था पर अब सत्तर बसन्त पार हो गए हैं ….. समय ने घुटनों से शरीर को यह एहसास दिला दिया है कि यह देह किराए की है जिसे खाली करने का समय नज़दीक आ रहा है।

धीरे-धीरे लाठी के सहारे अपने घर की ओर बढ़ रहे थे ….. पिछले महीने भी ऐसा ही हुआ था एक भी टोकरी नहीं बिकी …… कुछ दिन तो दोनों ने सोयाबीन भूट कर खाये …… और पानी पीकर सो जाना पड़ा। दो ही प्राणी थे उस घर में ….. कभी संतानो की चहक से गुंजायमान रहता था आंगन …… चार पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई ….. तब खेत आबाद थे जिन्होंने चारों की परवरिश की ….. हाड़तोड़ मेहनत कर दो जून की रोटी जुटाते थे ……. तब काखी टोकरी भी बनाती थी जिसे कका बेचने जाते थे ….. सुख-दुःख की परिभाषा में घिरी जीवन की गाड़ी चल रही थी ……..

एक दिन वह भी आया जब चारों पढ़-लिख कर चिड़िया के बच्चों की तरह अपने डैने फैलाकर परदेश उड़ गए …… अब उनका अपना संसार था जिसमें परिवार तो था बस इज़ा-बाबू की जगह नहीं थी …… गांव के शांत वातावरण से मॉल संस्कृति वाला वातावरण उनको ज्यादा रास आया वहीं बस गए गाँव आने की फुसरत नही मिलती थी और चारों यही सोचते कि और भाई तो ईजा-बाबू से मिलने जाते होंगे … एक मैं ही नहीं गया तो क्या हुआ। मेरे खर्चे भी तो ज्यादा हैं …… बाबू इज़ा तो गांव में रहते हैं उन्हें क्या चाहिए ……

कका-काखी ने भी कभी उनकी मोहताजी नहीं रखी …. शायद अंतर्यामी थे जो बच्चों के मन की गहराई में छुपे भावों को भांप चुके थे ……. दोनों एक-दूसरे का सहारा बनकर अपने बचे हुए दिन काट रहे थे …… मरम्मत के अभाव में मकान भी जर्जर हो चुका था ……. था भी तो तीन पुश्त पुराना …… कभी बरसात में समाधि भी बन सकता था …… पर कर भी क्या सकते थे ….. सब ईश्वर पर छोड़ दिया था …..

आज कदम भारी लग रहे थे ……. और घर भी बहुत दूर हो गया था …… रास्ता था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था ….. पसीना माथे पर बूंदों का रूप ले चुका था ….. उसे पोछने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह माथे से निकलकर हथेली पर फैल चुका था ……. उस हथेली पर जिसकी लकीरें चारों बच्चों के पालन पोषण में घिसकर मिट चुकी थी …… अब तो झुर्री भरा हाथ ही बचा था …… उसकी भी उंगलियों के ऊपरी भाग में बिवाइयां पड़ चुकी थीं …..

थककर कुछ देर सुस्ताने बैठ गए …… भोलेनाथ की शरण में जो उनके रास्ते में गाँव की सरहद पर पड़ता था …… आज मंदिर में पार गांव के लोग इकठ्ठा हुए थे …… शायद कोई मनौती पूर्ण हुई थी …… बड़ा सा घण्ट प्रभु को अर्पित करने आये हुए थे …… प्रसाद बन रहा था उधर चीड़ के पेड़ के पास …….

रघुका की नज़र वहां रखे गुड़ पर पड़ी तो फिर काखी के आस भरे शब्द कान में गूंजने लगे ……… मन में संकोच भी था पर फिर भी हिम्मत जुटा वहीं पहुँच गए …… रसोईया भांप गया उनकी मनोदशा को और बोला – ” कका के काम छू ….. के चै …….” (कका कुछ काम है ….. क्या चाहिए…..) कका की दृष्टि गुड़ पर टिकी हुई थी शायद उस समय वह उनके लिए संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु था उसके सामने सब कुछ तुच्छ ……

काँपती आवाज़ में बोले -” यो टोकरी धर लियो मुणि गुड़ बदल में दी दियो” (ये टोकरी रख लो बदले में थोड़ा गुड़ दे दो) इन शब्दों के कहने के साथ सांस भी फूल रही थी …… हाथ काँप रहे थे ….. रसोइए की आँखों से अविरल जलधारा फूट पड़ी ………..
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……. कका सिर पर टोकरी और हाथ में तिमिल के पत्तों में लिपटा गुड़ लेकर घर की ओर इस अंदाज में जा रहे थे कि आज सारा खजाना उन्हें ही मिल गया हो | ———– २५ अगस्त २०१९ |

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