जय शंकर पाण्डेय

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जीवन परिचय: रचनाकार जय शंकर पाण्डेय जी का जन्म उत्तरप्रदेश के बस्ती ज़िले के एक छोटे से गाँव में २० अगस्त १९६६ को हुआ। जब ये केवल दो वर्षों के थे तब माता के आकस्मिक निधन के बाद, पिता चार भाइयों और एक बहन को लेकर भिलाई नगर, मध्यप्रदेश आ गए। वह हिंदी एवं संस्कृत भाषा के प्राध्यापक थे। अट्ठारह वर्ष की उम्र में जय शंकर पाण्डेय जी भारतीय वायुसेना में सम्मिलित हो गए जहां से इन्हे मेकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा सर्टिफ़िकेट प्राप्त हुआ। बाद में इन्होने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री भी हासिल की। भारतीय वायुसेना के साथ अपने बीस वर्षों के अनुबंध को पूरा कर इन्होने सेवनिवृत्ति ले ली। अब ये मेडिकल ट्रैन्स्क्रिप्शन (चिकित्सकीय लिप्यंतरण) में प्रूफ़रीडर (प्रारूप एवं भाषा संशोधक) के तौर पर कार्यरत हैं और शोध-पत्रों की एडिटिंग (सम्पादन) भी करते हैं। जय शंकर पाण्डेय जी अंग्रेज़ी एवं हिंदी दोनों ही भाषाओं में लेखन करते हैं। इस समय ये हैदराबाद में निवास करते हैं।

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मित्र का ऋण

रक्ताभ हो रहा समरांगण, सोलह दिवस गए थे बीत,
कितने अद्भुत वीरों से, यह आर्यावर्त हुआ था रीत।
धर्म-अधर्म तो विस्मृत थे, विजय ही अंतिम ध्येय बना था,
कुरु सेना का सेनानायक आख़िर कर्ण अजेय बना था।
बढ़ चला वीर अर्जुन के पीछे, अंतिम द्वन्द की आस लिए,
द्वेष के तीर भरे तरकश में, मित्र-विजय प्रण-स्वाँस लिए।
धँसा भूमि में रथ का पहिया, कैसा था दुर्भाग्य रथी का,
धुरा नहीं ज्यूँ अघ का चक्र हो, शायद न्याय यही धरती का।
अधर्म धर्म पर भारी था, विवश हो छल का साथ लिया,
क्रोध और करुणा से भरकर, केशव ने आदेश दिया।
“गांडीव उठाओ पार्थ! अब तीर चलाओ पार्थ!”
“यह कर्ण दंड का भागी है, अब संशय का क्या अर्थ!”
आदेश कृष्ण का पाकर भी, दुविधा में था अंतर्मन,
तीर चलाए अर्जुन कैसे, थरथर काँपे सारा तन।
धँसा धरा में रथ है इसका, छल से वार करूँ कैसे,
धनुष नहीं है बाण नहीं है, निःशस्त्र कर्ण को मारूँ कैसे।
“किया निरादर पांचाली का, अभिमन्यु का घात किया,”
“कवच बना यह दुर्योधन का, दुष्ट पतित का साथ दिया,”
“अभी नहीं तो फिर ना होगा, स्व-जीवन को संकट होगा”
“यह निर्णय का क्षण है पार्थ, वध इसका फिर सरल ना होगा।”
गांडीव उठा फिर, तीर चला एक, बेधा वीर की छाती को,
हुआ धराशायी वह जड़ हो, करता आलिंगन धरती को।
निःशब्द खड़ा अर्जुन रथ पर, रोता कृष्ण का अंतर्मन,
सूर्य शौर्य का अस्ताचल को चला तोड़ जीवन बन्धन।

माना विवश किशोरी माँ ने, किया तिरोहित गंगाजल में,
क्या त्याग सकी होगी वह तुमको, वात्सल्य भरे अंतर्मन से?
कैसा था अपराध बोध वह, माता लज्जित होती थी,
कैसा निर्मम क्षण था वह जो पुत्र से वंचित होती थी।
सारे जीवन का आशीष, किया न्योछावर होगा हार,
अश्रु झरे होंगे नैनों से और क्षीर स्तन से बारम्बार।
नहीं स्वीकारा जननी को, कैसे हृदयविहीन थे तुम,
छलपूर्ण मित्रता को धन माना, कैसे दुर्बल दीन थे तुम।
जाने कितने सूतपुत्र थे, तुम एकाकी नहीं थे कर्ण,
इस समाज के अन्यायों से, उनके मन भी थे विदीर्ण।
पीड़ा थी, सामर्थ्य भी था, करते तुम उनका चिंतन!
जो अधिकारों से वंचित थे, कर लेते उनका आलिंगन!
पीड़ित, विवश, पराजित पर कुछ उपकार किया होता,
सारे पाप क्षमा होते यदि उनका उद्धार किया होता।
सब अपमानों से भारी था, निश्चय ‘सूतपुत्र’ सम्बोधन,
पर बेच के अपना तन मन तुम, बन गए दूसरा दुर्योधन।
अंग-देश की भिक्षा तुमने, अकुलाकर स्वीकार किया,
मान मिला? सम्मान मिला? क्या एक क्षण कभी विचार किया?
निभा रहे थे मित्र-धर्म या था केवल ऋण का अनुबंध?
ले पाए क्या कभी भूलकर निर्मल प्राण-वायु स्वच्छंद?
हे दानवीर सब पुण्य तुम्हारे, क्षीण हुए कुरु-छाया में,
ह्रास हुआ सत्कर्मों का, घिर दुर्योधन की माया में।
पांचाली को वेश्या कह डाला, अर्जुन वध का हठ पाला,
बने सहायक कुरुओं के तुम, जीवन व्यर्थ गँवा डाला।
दुश्कृत्यों की श्रेणी में, अगिनत पाप सजाए तुमने,
साहस बन दुर्योधन का, अन्याय के शंख बजाए तुमने।
वध किया अनुज पुत्रों का तुमने, कैसा घोर कुकर्म था वह,
स्वधर्म किया विस्मृत तुमने, दास-धर्म का चरम था वह।

कैसे कहूँ व्यथा मन की, एक आर्तनाद सा गुंजित है,
लहू तुम्हारा बहता है, मन मेरा रक्त से रंजित है।
तुम रश्मिरथी थे, सूर्यपुत्र थे, तुम जैसा प्रताप नहीं।
कैसे कहूँ मैं वध का तुम्हारे, है मुझको संताप नहीं।
धर्ममूर्ति थे, ज्ञानमूर्ति थे, अद्वितीय थे तुम दानवीर,
परशुराम के शिष्य पुत्रवत, अतिशय धीर और गम्भीर।
कौन धरा पर था ऐसा जो विजय धनुष टंकार सहे,
कौन समर में था ऐसा जो तुमसा तीक्ष्ण प्रहार करे।
व्यर्थ गँवाया तुमने जीवन अभिशापों को गिनने में,
वरदानों का किया निरादर, गिरे दुष्ट के चरणों में।
कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में, यह तो होना उचित ही था,
भीष्म, द्रोण और कर्ण तुम्हारा, वध होना निश्चित ही था।
पक्ष तुम्हारा दुर्योधन का, अवगुण और अधर्मों का,
तुम्हीं बने थे बल उसका, और उसके दुष्कर्मों का।
लालच, द्वेष, घृणा को उसके यदि बाधित कर पाते,
अर्थहीन जीवन को सम्भवतः परिभाषित कर पाते।
कौन श्रेष्ठ था तुम या पार्थ, यह तो बस ईश्वर ही जाने,
धर्म उचित या द्वन्द्व उचित था, कर्ण तुम्हारा हृदय ही जाने।
जहाँ कृष्ण थे वहीं धर्म था, यह तो सर्वविदित ही था,
फिर भी केशव को ठुकराया, यह भी तो अनुचित ही था।
लोट रहे कुरु चरणों में, बस लक्ष्य रहा निज का पोषण,
सत्ता का क्या लाभ मिला, क्या रोक सके लघु का शोषण?
धर्म गया, परिवार गया, रथ गया रसातल में जैसे,
विद्या भूले, साहस भूले, नरसिंह बना मृग-शावक जैसे।
धूसरित धूल में देह पड़ी है, मस्तक कट कर दूर पड़ा है,
युद्धभूमि में कर्ण तुम्हारा, निष्फल जीवन सार पड़ा है।
जो युद्ध तुम्हारा था ही नहीं, अनायास अपनाया तुमने,
‘कथित’ मित्र के हठधर्मी का, दुष्फल ही पाया तुमने।
तुम जैसे वीर का ऐसा अंत, मुझसे सहा नहीं जाता,
पीड़ा का यह मर्म है ऐसा जो मुझसे कहा नहीं जाता।
सूर्य चले अस्ताचल को, यह प्रवास अब अंतिम है,
जनमानस के मन पर कर्ण, शौर्य तुम्हारा अंकित है।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि यह, तुमको भूल न पाएगी,
युगों युगों तक धरती ऐसा अद्भुत वीर न पाएगी।
आलोचक मैं नहीं तुम्हारा, अर्पित श्रद्धा सुमन तुम्हें,
शोक, वेदना और व्यथा से गर्भित है यह नमन तुम्हें।

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काल का आमंत्रण

काल का आमंत्रण है मुझको,
ढो रहा था देह अब तक।
विष युक्त था सम्पूर्ण जीवन
अस्थि-पंजर, मांस-मज्जा,
और हृदय से रक्त तक।

नरपिशाचों की तरह था,
जागता मैं रात भर।
क्रोध, कुंठा, वेदना में
शूल सा चुभता समय था,
नर्क था प्रति-पल-प्रहर।

पीड़ा से उपजी थी हताशा,
प्रत्यक्ष थी विद्रूप मुख पर।
अश्रु बहते थे हृदय से, नेत्र से,
किंतु दुर्दिन कब बदलते
हैं विवशता देख कर?

ज्यूँ कलेजा मुँह को आए,
इस तरह क्रंदन किया मैं।
ना डूबते को तिनका मिला
और ना ‘परम’ का साथ ही,
अवरुद्ध श्वासों से जिया मैं।

क्षण-क्षण जला, पल-पल गला मैं,
खोता गया अस्तित्व मेरा।
कंकाल होती देह भी, आत्मा भी
शेष कुछ स्पंदन ही हैं बस,
मर चुका व्यक्तित्व मेरा।

भय तो बस पीड़ा का है,
मृत्यु का बिल्कुल नही।
युग से कटते कष्ट के पल,
बैसाखियों पर टिकता है बल,
हाँ! मैं हारता फिर भी नहीं।

मैं ही क्यूँ? यह प्रश्न था,
यक्ष सा मुँह बाये खड़ा।
खोज उत्तर थक चुका मन,
क्षोभ और विस्मय से अब भी
है पराजित सा पड़ा।

आस्था खंडित हुई अब,
नर में भी, नारायण में भी।
राम-हनु या हर-हरि या,
या कृष्ण-गीता का ही चिंतन
व्यर्थ सुख में, दुःख में भी।

मार्गदर्शक बन सके ना,
एक भी ईश्वर यहाँ पर।
उन निराशा के क्षणों में
कोई साहस दे सका ना,
हैं पाषाण-प्रतिमा सब यहाँ पर।

मैं भला अर्जुन कहाँ जो,
कृष्ण पाता सारथी?
जो मिले सब शल्य थे
एक ‘शल्य’ तक पहुँचा सके ना,
अब मैं हूँ दलदल का रथी।

भ्रांति में अमरत्व के,
जीता है मानव इस जगत में।
लिप्त होकर भोग में, आमोद में,
भूलता है सत्य शाश्वत
मृत्यु का आना जगत में।

मुक्ति का संदेश है यह,
हर्ष से स्वीकार मुझको।
वस्त्र बदलूँ आत्मा का,
निर्विकार हो तन से मन से
कर लूँ अंगीकार यम को।

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कशिश

वक्त की तख़्ती पे लिखी
कुछ प्यार की रुबाइयाँ,
कहीं इश्क़ की थीं आयतें,
कहीं प्रेम की चौपाइयाँ।

फिर खो गयीं जाने कहाँ सब,
यूँ ही यकायक, सब की सब!
बस रह गयीं ख़्वाबों की मेरे,
कुछ भटकती परछाइयाँ।

ख्वाहिशें ढलने लगीं अब,
दीवानगी थकने लगी है,
नाज़ था जिस दिल पे तुझको,
फैली हैं उस झुर्रियाँ।

दर्द जो रग-रग में बहता,
बन लहू काग़ज़ पे उतरा,
पर क्या उकेरूँ अक्स दिल का,
जकड़ीं हैं उसको बेड़ियाँ।

घिसते कदमों से है काटा,
लम्हा-लम्हा रास्तों को,
छू ना पाया मंज़िलों को
कितनी भी रगड़ूँ एड़ियाँ।

पाया नहीं, खो भी दिया,
मुट्ठी से सरके रेत जैसे,
धुआँ हुईं सारी लकीरें,
अंगारों पे हैं हथेलियाँ।

थक गयी हैं कोशिशें भी,
शाम भी गहराने लगी अब,
तू लौ सी इतनी दूर जलती,
कैसे पाऊँ गरमियाँ।

इश्क़ हमने कब किया…?
बस झेंपते डरते रहे हम,
कुछ वक़्त से खाये थपेड़े,
कुछ तक़दीर ने दी झिड़कियाँ।

चुपके से रो लेते हैं अब भी,
जो याद आए तेरा शहर,
है ये पागल प्रेम तेरा,
या वक़्त की बरबादियाँ?

छू सकूँ मैं दिल को तेरे,
यह कशिश रह ही गयी,
कुछ बेवफ़ा सी मेरी सड़कें,
कुछ सहमी सी हैं तेरी गलियाँ।

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ये मेरा शहर

जब से छूटा है मुझसे ये मेरा शहर,
बदले-बदले से हैं इसके शामों-सहर,
आशिक़ी थी पत्थरों से भी यहाँ के,
भूले-भूले से हैं अब वो रास्ते वो दर,
काश कोई टकरा जाए अपना सा,
यूँ ही अचानक भीड़ से निकलकर,
कैसे समझाऊँ इस दिल को मगर,
अब रहता नहीं वो शख़्स यहाँ पर ,
जो कभी जान देता था मेरे बग़ैर।

वो सड़कें, सर्कस, वो मीना-बाज़ार,
वो बाग़ीचे, गलियाँ, वो दरो-दीवार,
वो टूटी सी पुलिया, वो क़िस्से हज़ार,
वो धूँए के छल्लों में उड़ता ख़ुमार,
वो आँगन में गिरती सर्दी की धूप,
वो गर्मी की रातें, वो तपती सी लू,
वो बारिश की बूँदें, वो मिट्टी की बू,
वो बदलते मौसम, वो गुज़रती उमर,
अजीब है ये मेरे अहसासों का शहर।

बचपन की नादानियों से लेकर,
भीगती मसों की दीवानगियों तक,
अनचाही आवारगियों से लेकर,
झूठे इश्क़ की बर्बादियों तक,
रेंगते वक़्त के बहानों से लेकर,
परिंदे होते उम्र के परवाज़ों तक,
सबका गवाह है ये चुप सा शहर,
कभी दोस्त हुआ करता था मेरा,
अब कुछ रूठा रूठा सा है ये मगर।

कोई ज़िद है जो अक्सर मचलकर,
नन्हे बच्चे सी पैरों से लिपटकर,
अज़ीब सी कशिश आँखों में भरकर,
चाहता है मैं जान दे दूँ यहीं पर,
ये वादा है तुझसे ऐ मेरे शहर,
जहाज़ के पंछी सा थक हार कर,
लौट आऊँगा मैं भी किसी दिन,
तेरी गोद में जान देने यहीं पर,
बस मेरा इंतज़ार करना ऐ मेरे शहर।

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अक्सर

अधखुली आँखों से अक्सर,
देखने लगता हूँ,
शून्य में एक उभरती हुई आकृति;
जीने लगता हूँ,
पल भर में एक लम्बी सी ज़िंदगी,
सच्चाईयों से भागती सी,
और बिखरने लगता हूँ…।
कभी भीड़ में अकेला खड़ा,
ढूँढने लगता हूँ,
हज़ारों चेहरों में एक चेहरा;
घिर जाता हूँ उन्हीं परछाइयों में फिर,
और खोने लगता हूँ…।
कभी सागर के किनारे खड़ा,
छूने लगता हूँ,
उलझती लहरों को पार कर,
दूर उस किनारे पर खड़े,
अपने ही साये को,
और डूबने लगता हूँ…।
फिर सोचने लगता हूँ अक्सर,
कितना अज़ीब है सब कुछ;
नफ़रतों की काइयों पर,
गिरते-संभलते वज़ूद;
कसाई सा वक़्त,
और बोटियों में कटती ज़िंदगी;
गुजरने लगता हूँ ,
सलीबों पे लटकते अहसासों से,
सुन्न होते सँकरे रिश्तों के
अँधेरे गलियारों से;
बंद कर लेता हूँ फिर,
उन अधखुली आँखों को,
और जैसे ख़त्म होने लगता हूँ…।

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अक़्स

मसल आता हूँ मैं अक्सर
उन रिसते फफोलों को,
जो दिल की दीवारों पर
हैं बरबस उभर आए।
एक आस अब भी मगर
बाक़ी है जीने के लिए,
जाने किस दीवार पर
तेरा अक़्स निकल आए।

वो जो कदमों के निशाँ
छोड़े थे हमने रेत पर,
धुल गए भटकती लहरों की
आवारा सी चहलकदमियों में।
संभाल रखे थे वो जो
कुछ सूखते फूल यादों के,
जाने कबके उड़ गए
गुजरते वक़्त की आँधियों में।

रु-ब-रु हो पाए कहाँ हम
यूँ ही जमाने से डरते गए,
मंजर बदलता गया ज़िंदगी का
और रास्ते मुड़ते गए।
जो बच सके ना दिल की
तड़पती आवाज़ों से हम,
कभी आहों में ढाला उनको
कभी ग़ज़लो सी सुनते गए।

तेरी एक झलक को बस
क्या-क्या ना कर देखा हमने,
हर गुजरते चेहरे पे ज्यूँ
एक झरोखा सा देखा हमने।
जाने कब किस चेहरे में
तेरी सूरत निकल आए,
उम्र काटी जागते बुत सी
कभी आँखों को ना मूँदा हमने।

जाने कितनी ही मालाएँ
फेर डालीं हमने तेरे नाम की,
सुना था कभी इस तरह
मिल जाता है ख़ुदा भी।
पर इबादत से ख़फ़ा है तेरी
वो मुझसे कुछ इस कदर,
कि कट जाती है ज़ुबान मेरी
जो भूले से लूँ उसका नाम भी।

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कभी देखा है तुमने?

कभी देखा है तुमने?
सूनसान सड़कों पर भटकती हुई
रात,
जो शायद उदास है,
विक्षिप्त,
या फिर निर्विकार, निर्निमेष,
या शायद निरूद्दयेश;
मेरी या तुम्हारी तरह,
ख़त्म हो जाने की,
प्रतीक्षा में
बैठी है एक पुल पर,
या किसी खम्भे के नीचे,
जिसके शीर्ष पर लगा हुआ
प्रकाशबिंदु बिखर गया है
अब टूट कर।

कभी देखा है तुमने?
ईंट-पत्थरों से बने हुए मकान,
या
ताबूतों की शक्ल की
कुछ आकृतियाँ,
जिसमें छिपे हुए गिरगिट
या कुछ कीड़े-मकोड़े
या
ज़हरीली सी
कुछ आदमकद आकृतियाँ
हिलने-डुलने लगी हैं,
अपनी ही तरह
कुछ और
पैदा कर देने की कोशिश में,
जो फिर
दफ़न हो जाएँगे
उन्हीं की तरह
उन्हीं ताबूतों में
पैदा होकर।

कभी देखा है तुमने?
अपने आप में व्यस्त से,
या कुछ
तानाशाह से कदमों से खाकर
ठोकर,
बार-बार इधर-उधर
लुढ़कता हुआ
एक पत्थर,
गिर जाता है किसी नाली में
या
किनारे पर पड़े हुए
कूड़े के ढेर पर
रूक जाता है,
किसी डरे सहमे,
ठिठुरते हुए
लहूलूहान से कुत्ते की तरह
और वही कदम
फिर ढूँढने लगते हैं कोई नया
पत्थर।

कभी देखा है तुमने?
आज भी कुछ
प्रतिष्ठित, पढ़े-लिखे
स्नातकोत्तर,
सफ़ेदपोश,
शताब्दियों पीछे जाते हुए
उत्तरोत्तर,
मंच पर भाषण देते हुए
कुरीतियों के विरूद्ध,
घोंट रहे हैं गला,
अपने ही घर में
अपने ही लोगों की
भावनाओं का,
अपनी झूठी शान को
जीवित देख सकने को कटिबद्ध,
खुश हैं
अपनी उस भेड़-चाल के लिए
जो गिरा देगी उन्हें
किसी अंधे कूँए में,
पल भर में
समाप्त हो जाएगा
सब कुछ,
और अर्थहीन हो जाएगा
देना कोई भी
प्रत्युत्तर।

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तुम्हारा चेहरा

पलाश के फूलों सा तुम्हारा चेहरा
कुछ यूँ याद आता है हर वक़्त,
जैसे समय के दरख़्तों पर हर जगह
तुम्हारी कोंपलें फूट पड़ी हों।

याद तुम्हारी सावन की झड़ी सी
सींच जाती है मेरे अकेलापन को,
जैसे गाँव की पगडंडियों पर गिरकर
कुछ बूँदें सोंधी सी महक जाती हों।

तुम्हारे विरह की जलती सी चुभन
रातों को झुलसा देती है इस क़दर,
जैसे दूर जंगल में लगी कोई आग
हवा के झोंकों से भड़क जाती हो।

वो तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से गिरा पानी
अब भी अटका है मेरे गालों पर,
जैसे प्यार की छोटी सी निशानी
मुझसे बिछड़ जाने से डरती हो।

इंतज़ार उन काली घटाओं का है
जो बरसा करती थी इन मुँडेरों पर,
पर अब जब तुम नहीं तो जैसे
उन्हें भी मुझसे शिकायत हो गई हो।

शंख पूजा के फूँके हैं किसी ने
मेरे भटकते मन के मंदिर में,
जैसे अज़ाने हों ये तुम्हारे प्रेम की,
जो मुझे हर वक़्त सुनाई देती हों।

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चकित हूँ

चकित हूँ,
कहाँ था यह प्रेम
जो कह ना सका
तब,
जब तुम पास थीं
हर क्षण हर पल
एक उन्माद सा बिखेरती;
अपने और मेरे होने का
अहसास कराती
अपनी चहलकदमियों से;
जब पायलें झंकृत हो उठतीं
कभी दूर जाती,
कभी पास आती
तुम्हारी पदचापों से,
और तुम्हारे केवल छू लेने भर से
मैं डूब जाया करता
कितनी ही मधुशालाओं में;
नही जानता
वासना प्रेम से बहती
या
प्रेम पल पल उतर जाता
वासनाओं में
और मैं गुम हो जाता,
विलीन हो जाता कहीं
तुममें ही;
जानता हूँ,
तुम चाहतीं रहीं
मैं कह दूँ तुमसे है प्रेम;
किंतु
वही प्रेम अब नृत्य करता है
अधूरा, विस्मित सा,
हर परदे हर दीवार पर,
खोजने लगा है तुम्हें हर जगह;
कितना विस्तृत हो गया है
तुमसे बिछड़ कर,
छा गया है मेरे सारे वज़ूद पर।
बंधनों की रेल पर सरकता जीवन,
जाने क्यों
क्रमशः
भूल जाता है प्रेम,
पुनरावृत्तियों की ऊब में
कहीं खो जाता है,
किंतु परिवर्तन
वियोग का, एकाकीपन का
फिर से जगाता है प्रेम।
जाने कैसे
तुमको बांधे रखा बरसों,
तुम निभाती रहीं बरसों
पर अब जब तुम पास नहीं,
तो समझ पाया कि
बस
वो तुम्हारा होना, मेरा खोना,
और वो तुम्हारा बंध जाना,
शायद
वह सब ही था प्रेम।

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जी चाहता है

जी चाहता है…
कोई कविता बन जाओ तुम,
मन के भावों से निकल कर
शब्दों के पंख लगाकर
काग़ज़ पे उतर आओ तुम।

जी चाहता है…
कोई गीत रचाओ तुम,
दिल के सागर में समा जाओ तुम,
सुंदर भावों से सजी-सँवरी
मेरे अधरों पे उतर आओ तुम।

जी चाहता है…
नन्ही सी परी बन जाओ तुम,
मेरी आग़ोश में समा जाओ तुम,
मेरे जलते चितवन को,
अपने आँचल से झल जाओ तुम।

जी चाहता है…
सुंदर सी घटा बन जाओ तुम,
दिल के आकाश पे छा जाओ तुम
मेरे घर के आँगन में
छम-छम के बरस जाओ तुम।

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तुम क्या गयीं

तुम क्या गयीं…
ज़िंदगी बँटती गई
सुरासुरों के बीच
मंथन के घटकों की तरह,
अमृत तुम साथ ले गईं,
विष मैं पिया शिव की तरह।

तपिश बढ़ती गयी
जाने कितने सूरजों से,
रेत फैली, सूखता है मन,
शीतल करो इस मरु को मेरे
मारिचिकाओं की ओस से।

रातें बेचैन हो गयीं
बीमार करवटों की तरह,
स्वप्न ज्यूँ चंदन हुए, त्यूँ
लिपटे हज़ारों सर्प उनसे,
नींद अब नाचे नटों की तरह।

ज़िंदगी तप सी गयी
वृक्षहीन पथ की तरह,
श्वेदबिंदु भी अब सूखें कहाँ,
थक हार कर बैठा हूँ पथ पर
प्यासे बटोही की तरह।

जीवन साथ ले गयीं,
विरह के छाले मनस पर
सज गए तारों के जैसे,
ताकता निशि भर मैं अम्बर,
अब यूँ ही चकोरों के जैसे।

रास्ते चुन ले गयीं
थे जो नर्म मख़मल की तरह,
मैं चल सकूँगा क्या भला
इन पिघलती सड़कों पर
बेचारे बंजारों की तरह?

परिचय साथ ले गयीं,
मैं भटकता बेचैन होकर,
खोए हुए बच्चे के जैसे
दुनिया के इस मेले में अब
खुद से ही अनजान होकर।

ज़िंदगी छलती गयी
छदम चोरों की तरह,
सूनी बियाबान राहें ही हैं अब,
क्या बचाऊँ, क्या गवाऊँ,
यह गठरी सुदामा की तरह।

तुम क्या गयीं…

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लेखनी

ऐ जीवन की क्रूर लेखनी,
तू लिखती जा मैं पढ़ता जाऊँ,
घनीभूत पीड़ाओं का परिचय
तू देती जा मैं सहता जाऊँ।

वैसे तो यह जीवन-सांझ
कुछ जल्दी उतर गयी चौखट पर,
सपने थे तो कुछ मेरे भी अपने
पर जाने दे! अब क्या तुझे लजाऊँ!

अब तो लौटना हो न सकेगा
काल बहुत आगे बढ़ आया,
नित लंबी होती परछाईं से अब
क्या बचना और क्यों डर जाऊँ?

उस निश्छल शिशु-मन से कहना
जितना खेल सके खेले,
जीवन के निर्मम द्युतों की
लंबी सूची क्या उसे गिनाऊँ!

मातृ-गर्भ से गर्भ-धरा तक
कितनी क्रीड़ा, कितना आंदोलन,
आल्हादित हूँ या उद्वेलित हूँ?
अब तक मैं यह जान न पाऊँ।

माँ के गर्भ की याद आती है
कैसा वह अभेद्य कवच था,
थी शय्या उड़नखटोले सी वह
वह निर्बाध स्पंदन कहाँ से लाऊँ?

मैं ‘अज्ञेय’ का ‘हारिल’ बनकर
तिनका तिनका किया बटोरा,
कर्म, भक्ति या सांख्य कहूँ, यह
किसका दंड है जान न पाऊँ।

जीवन की अंतिम मधुशाला में
पंच-तत्व के प्याले छलके,
पीड़ा अश्रु, श्वेद या रक्त की गहरी
मैं यह भेद कहाँ कर पाऊँ।

ऐ जीवन की क्रूर लेखनी,
तू लिखती जा मैं पढ़ता जाऊँ…

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मौन

तू मौन रह तू मौन रह, तू मौन रह तू मौन रह…

मौन का ये अर्थ है कि शब्द सारे व्यर्थ हैं,
वेद सारे लील जाए, मौन यूँ समर्थ है।
चीख़ चीख़ शब्द उड़ें, शांत स्मित मौन है,
मौन की ही मार से शब्द सब स्तब्ध हैं।
शब्द सीमित हैं मगर, मौन तो विस्तार है,
श्रम ही श्रम है शब्द में, मौन में विश्राम है।
मौन में ही शक्ति है, मौन में ही भक्ति है,
ध्यान में भी मौन है, मौन में विरक्ति है।
प्रेम और करुणा के भाव सारे मौन हैं,
शांत रह तू मौन रह, शोर में आसक्ति है।

क्रोध में तो शोर है, विध्वंस में भी शोर है,
मन के विष में शोर है, तृष्णा में भी शोर है,
लालसा में शोर-शोर, वासना में शोर है,
डमरू डोले शिव का तो तांडव में शोर है,
खुल गया त्रिनेत्र तो संहार में भी शोर है।
गूढ़ जितने तत्व हैं, सब के सब वो मौन हैं,
चीखता है दर्प ही, विनय तो बस मौन है,
चीख़ है बलात् हठ में, समर्पण तो मौन है,
झूठ के हैं लाखों शब्द, सत्य शाश्वत मौन है,
शोर से निकल के रह, तू मौन रह तू मौन रह।

सूर्य चन्द्र मौन हैं, आकाश सारा मौन है,
धैर्य जो धारण करे यह धरा भी मौन है।
शब्द क्या पढ़े, जो मौन ही ना पढ़ सका,
पार्थ हो या बुद्ध हों, ज्ञान मौन में खिला,
मौन में ही प्रश्न था, मौन में उत्तर मिला।
मौन रह के हिम गला, मौन ही गंगा बही,
ज्ञान कृष्ण का लिये, मौन ही गीता चली।
मंदिर-मस्जिद शोर, शोर अर्चना-अज़ान हैं,
पथ दिखाती प्रेम का लौ दीये की मौन है,
मन की वीणा से झरे संगीत सारे मौन हैं।

मंजिलें तो शांत मौन, रास्ते भी मौन हैं,
क़िस्से हज़ार मगर, कहने वाला मौन है।
मौन मील की शिला, जो न पूछे क्यों चला,
मौन धूल का वो फूल, जो न जाने क्यों खिला,
दुख ना कर क्या गया, सुख ना कर क्या मिला।
हाँ, प्रश्न हैं डगर डगर, लड़ना है समर समर,
मौन रह प्रहार सह, मौन ही प्रतिकार कर,
भूल जा अगर मगर, सोच तुझको क्या है डर?
यात्रा ये मौन की है, अंत जिसका मौन है,
तू पथिक है चलता रह, मौन निर्झर सा तू बह।

तू मौन रह तू मौन रह, तू मौन रह तू मौन रह…