कवयित्री / शायरा “कृष्णा साह”

बी.एस.सी., कोलकाता, पश्चिम बंगाल |

फिर से बसंत आई है

खाली मन के सूनेपन मे,
फिर से हरियाली छाई है
बीत गया,पतझड़ अब
फिर से बसंत आई है..

सेमल के पत्तों के उपर,
फिर से आओस लहराई है
पेड़ पत्तें और गिलहरियाँ,
सबकी आशा रंग लाई है
बीत गया पतझड़ अब,
फिर से बसंत आई है..

झिलमिल करती किरणों से,
अब मन विभोर हो जाता है
प्यार भरा हुआ ये मौसम,
मन को बड़ा लुभाता है
हरसिंगार की डाली पर बैठी,
मैना ने खुशी जताई है

बीत गया पतझड़ अब,
सुहानी बसंत आई है..।। …………………….. १८ जुलाई २०१९ |

जैसे अधूरी सी कहानी

ठहरा हुआ सा जीवन मेरा,
जैसे झील का ठहरा पानी..
बेमतलब सा जीना मेरा,
जैसे अधूरी सी कहानी..

बंद कमरो मे घुटना ऐसे,
जैसे किसी से ना मिलने की ठानी..
कैद होकर रहना ऐसे,
जैसे आजादी से दुश्मनी पुरानी..

जी करता है तोड़ के बंधंन,
उड़ जाउँ खुले आसमाँ मे..
कर पूरी सारी तम्न्नाएँ,
जो कब से अधूरी है मन में…

बैठूँ अपने सपनों के सिंहासन पर,
जैसे परीयों की रानी..
ऐसे कैसे जी लूँ मैं,
जैसे अधूरी सी कहानी…।। …………………………. १७ जुलाई २०१९ |

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