काव्य रस

रस शब्द प्राचीन काल से ही कई अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है, द्रव्य, निचोड़ (सार), स्वाद, विष,
मधुर, सुरा,
पारद, सोमरस, षडरस, आनंद आदि अनेक शब्द |    प्राचीन आचार्यों ने
काव्य रस को अलौकिक मन है और उसे ब्रह्मानंद सहोदर कहा है | श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के
दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस के जिस भाव से यह
अनुभूति होती है कि वह रस है वही स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार – काव्य रचना के आवश्यक अंग हैं।
परन्तु इसको अलौकिक कहने पर बहुत से व्यक्तियों ने प्रश्नचिन्ह लगाए हैं और इसे
भ्रांति पूर्ण बताया है | रस को लौकिक भावानुभूति
बताया है |

इन सब विवादों के बेच यदि रस को परिभाषित करने की कोशिश की जाए तो इसके
शाब्दिक अर्थ को देखेंगें – रस का शाब्दिक अर्थ है – आनंद |  काव्य में जो आनन्द आता
है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर
अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि “रसात्मकम्
वाक्यम् काव्यम्” अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस का आधार स्थायी भाव है, जो सहृदयों में संस्कार
रूप से विधमान है |  रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती
है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी
इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट
जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के
अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है।
दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में
मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव
रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे,
वही रस है।
रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस
अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव
दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है। रस का यह
अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय है। आचार्यों ने समस्त मानवीय भावों को दो
वर्गों में बाँटा है – स्थायी भाव और संचारी भाव | स्थायी भाव प्रबल, प्रमुख और व्यापक होते
हैं |  आचार्यों के अनुसार ये स्थायी भाव ही भिन्न भिन्न रसों में
परिणित हो जाते हैं – रति स्थायी भाव श्रृंगार रस में, शोक करुण रस में, क्रोध रौद्र रस में, हास हास्य रस में, भय भयानक रस में, घृणा वीभत्स रस में, उत्साह वीर रस में, विस्मय अद्भुत रस में, शम या निर्वेद स्थायी भाव शांत रस में परिणित हो जाते हैं |

स्थायी भाव – रस

रति – शृंगार रस      

शोक – करुण रस

हास – हास्य रस      

क्रोध – रौद्र रस

उत्साह – वीर रस     

भय – भयानक रस    

घृणा – वीभत्स रस    

विस्मय, आश्चर्य – अद्भुत रस   

निर्वेद, शम  – शांत रस