कवि-शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली

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जीवन परिचय: कवि/शायर प्रदीप ध्रुवभोपाली जी का पूरा नाम प्रदीप मणि तिवारी है, वो भोपाल मध्यप्रदेश के रहने वाले है| प्रदीप जी अलग -अलग विषयों में और विधाओं में रचनाएँ करते करते हैं | उन्हें गजलें लिखना बहुत भाता है|

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अश़आर

तलाश उम्र से तो फिर मिला दिया उसने,
वो रहजनां से रहवर बना दिया उसने।

निग़ाह उसपे गई तो अलग नज़ारे भी थे,
तरस रहे थे कि चिल्मन उठा दिया उसने।

अज़ीब शै है कि ज़ीस्त भी कभी हंसाए भी,
कभी रुलाए भी ये तो बता दिया उसने।

क़त्ल हुआ है मगर ख़ता किसी की नहीं,
हुआ यही कि हुस्न जो दिखा दिया उसने।

वो जल मरा भी पतिंगे मानिन्द चिराग से,
कहे ख़ता भी न कोई ग़ुल खिला दिया उसने।

वो डूबता ही रहा उन झील सी निगाहों पे,
बताना चाहा नज़र से नज़र मिला दिया उसने।

तमाम उम्र तमन्ना में उसके जीते रहे फिर,
ज़ुदा रहेगा वो कह रमन्ना थमा दिया उसने।

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अर्कान-2122-2122-2122-212

ख्वाब टूटे आसमां से फिर ज़मीं पे आ गिरे।
यूं सितारे भी फ़लक़ से हर कहीं पे आ गिरे।

यार छूटे फिर ज़ुदाई,अश्क़ से हो तरबतर,
बांह में आ कर किसी के आतिशी से आ गिरे।

आखिरी थी सांस बोला यार भी तू आब दे,
ये सुना तो क्या कहें हम इक झड़ी से आ गिरे।

ख़ाक़ छानी ज़िन्दगी में खामखां वो बेसबब,
तिश्नग़ी ऐसी हुई फिर अज़नबी से आ गिरे।

आदमीं पहचान जब खोने लगे तो देखिए,
तंग गलियों खोलियो के इक हंसी पे आ गिरे।

ज़ाम देती हौंसला टूटे दिलों को जोड़ती,
ज़ाम से मदहोश हो कर हर किसी पे आ गिरे।

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गीत-हालत किसान की

अन्न उगाए फिर भी भूखा,हालत यही किसान की।
कर्ज़ चुकाये वो जीवन भर है संकट पहचान की।
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औने पौने दाम फ़सल तो बिक जाये बाज़ार में।
लागत के भी पड़े हैं लाले लुटता इस संसार में।
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बेंचे कहीं फ़सल जा कर वो कीमत मिले न धान की।
कर्ज़ चुकाये वो जीवन भर संकट है पहचान की।
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बिका अनाज रहा घाटे में कर्ज़ मिला उपहार में।
नहीं लगाया फाँसी अगले फ़सली के आसार में।
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साहूकारी बैंक तग़ादा आफ़त आई जान की।
क़र्ज़ चुकाये वो जीवन भर संकट है पहचान की।
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तड़प भूख से परिजन मरते जीवन जैसे ख़ार में।
फटा कलेज़ा तब किसान का मरा कर्ज़ के भार में।
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आज़ादी वो जान सका न बोली लगी है मान की।
क़र्ज़ चुकाये वो जीवन भर संकट है पहचान की।
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बिटिया पीले हाँथ की ख़ातिर बैठी बाबुल द्वार में।
रहम न आया मदत करे न कोई आज उधार में।
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बढ़े दाम जब लागत से तब सुधरे हाल किसान की।
क़र्ज़ चुकाये वो जीवन भर संकट है पहचान की।


“सरस्वती वंदना”

शारदे माँ ज्ञान का आगार मुझको दीजिए।
जो तिमिर को दे मिटा उपहार हमको दीजिए।-01

अज्ञानता से दूर हम सबको करें माँ तार दे।
ज्ञान का दीपक जला दे पुण्य माता शारदे।

अभिमान छू जाए नही वो हार मुझको दीजिए।
जो तिमिर को दे मिटा उपहार मुझको दीजिए।-02

अज्ञानता के श्राप से माँ मुक्त सब हो कर रहें।
हिन्द पावन भूमि को निज मातृभूमि सब कहें।

ज्ञान का विस्तार हो निज प्रखर प्रज्ञा दीजिए।
जो तिमिर को दे मिटा उपहार मुझको दीजिए।-03

आसुरी बल पर विजय हो ज्ञान का सम्मान हो।
ज्ञान दे माँ पर हमें न तनिक भी अभिमान हो।

आत्मज्ञान और स्वरांजलि मातु मुझको दीजिए।
जो तिमिर को दे मिटा उपहार मुझको दीजिए।-04————–११ सितंबर २०१९ |

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