कवि कुवंर नरेंद्र सिंह बुंदेला

ललितपुर उत्तरप्रदेश |

“संक्षेप में सूबेदार काले खा की कहानी, जिन्होंने झांसी को अंग्रेजों के अधीनता से मुक्त कराया”

भारत के महान सपूत १८५७ अंग्रेजी सेना के विद्रोही नेता सूबेदार काले खा का शहीद स्थल।
झांसी की अंग्रेजी सैनिक छावनी ६ जून १८५७ को सैनिक विद्रोह जिसमें सभी अंग्रेज अधिकारी सैनिक मारे गए और झांसी अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त हो गया उस मुक्तिदाता सूबेदार काले खान के जीवन का अंतिम इतिहास जानने की किसी ने कोशिश नहीं की और किसी को पता नहीं नाना साहब की तरह काले खान कहीं अज्ञातवास में चले गए ऐसा माना जाता है किंतु यह सत्य नहीं है।
यह चित्र उस स्थान का है जहां सूबेदार काले खा ने अंग्रेजों से युद्ध करते हुए शहादत पाई थी।
यह स्थान करकी गढ़ जिला निवाड़ी मध्य प्रदेश मैं है जो की बेतवा नदी के किनारे है|

मार्च १८५७ से ही अंग्रेजों की सैनिक छावनियों में भारत भर में विद्रोही की चिंगारी सुलग उठी थी अंग्रेजों की फौज में हिंदुस्तानी सिपाही भी भर्ती किए जाते थे मेरठ और लखनऊ के बाद झांसी ऐसे ही समाचार प्राप्त हुआ झांसी की अंग्रेजों की सैनिक छावनी में हिंदुस्तानी सिपाहियो विद्रोही कर दिया वह दिन था ६ जून १८५७ विद्रोही नेता थे अंग्रेजी फौज के हिंदुस्तानी सूबेदार काले खान।
बहुत से अंग्रेज मारे गए और कुछ को आगरा भागने का मौका मिला कुछ अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया और काले खान को बताई बिना झोकन बाग पर १४७ अंग्रेजों को बंदी बनाकर गोली मार दी गई। झांसी अंग्रेजों से मुक्त हो चुका था अब हिंदुस्तानी विद्रोही सैनिकों ने झांसी का राज्य रानी लक्ष्मी बाई को फिर से सौंप दिया और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए जहां सारे देश से हिंदुस्तानी सिपाही एकत्रित हो रहे थे।
दिल्ली मेरठ झांसी के विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली में एकत्रित होकर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी किंतु अंग्रेजों ने अपने ३ विशाल सेना के बलबूते इन विद्रोही सैनिकों पर विजय पाली और बादशाह के समूचे परिवार पुत्रों को काटकर दरवाजों पर लटका दिया और बादशाह बहादुर शाह को गिरफ्तार कर लिया।
काले खान अपने सैनिकों सहित दोबारा झांसी आ गया और रानी लक्ष्मीबाई की सेना में अपनी सेवाएं देने लगा। किंतु यह स्वतंत्रता अधिक देना नहीं रह सकी मार्च १८५८ में एक नई अंग्रेजी फौज यूरोप से आकर झांसी या धमकी। ८ दिन झांसी ने अंग्रेजों के विरुद्ध भीषण संघर्ष किया किंतु झांसी टूट गई और बहुत नरसंहार हुआ रानी लक्ष्मी बाई कालपी की ओर प्रस्थान कर गई और काले खान अपने सैनिकों सहित दक्षिण की ओर प्रस्थान कर किया।
काले खान की सैनिक टुकड़ी रात भर चलती रही और ठाकुर पुरा सुकमा के रास्ते बबीना के पूर्व में आते आते सुबह होने को आ गई, किंतु अंधेरे में ही कंधारी घाट के ऊपर शाम घाट बेतवा का पार करके अपना पड़ाव डाल दिया।
यह ऐसा स्थान था पड़ाव का स्थल बानपुर रियासत में था पास में ही टीकमगढ़ रियासत थी और झांसी रियासत का त्रिकोणीय संगम स्थल था जहां तीनों रियासतों की सीमाएं परस्पर मिलती थी। काले खां को भौगोलिक जानकारी नहीं थी १ मील दूर गेवरा की,गढी थी जिस पर अंग्रेजों का अधिकार १२ दिन पहले ही हो चुका था अगर गढी पर अंग्रेजों की सैनिक टुकड़ी मौजूद थी।
सुबह-सुबह अंग्रेजी सिपाहियों को पहाड़ से नीचे बेतवा किनारे सैनिक हलचल दिखाई दी तो उन्होंने अपने कमांडर को सूचित किया। सूबेदार काले खान के सिपाही रात भर के जागे और ८ दिन के लड़ाई के थके हुए आराम कर रहे थे और कुछ लोग भोजन बनाने में व्यस्त थे। अंग्रेजी सेना की टुकड़ी ने पहाड़ों की आड़ लेते हुए जोरदार आक्रमण किया इस आक्रमण के लिए काले खान के सिपाही सतर्क नहीं थे और बहुत क्षति हो गई यह स्थान आज भी काले खान के ठौर के नाम से विख्यात है।
यह लड़ाई बेतवा के किनारे से डेढ़ सौ मीटर निकट हुई काले खान के सिपाही बहुत बहादुरी से अंग्रेजों से लड़ते हुए बेतवा नदी को पार करने का प्रयास करने लगे उस पार करकी गण मैं प्रवेश कर गए वहां बहुत बड़ी बड़ी पत्थर शिलाखंड की ओट थी और उन सिला खंडो मैं मोर्चा जमा लिया।
अंग्रेजी सेना को यहां भारी विरोध का सामना करना पड़ा भीषण संघर्ष हुआ दोनों ओर से काफी क्षति हुई किंतु तरोताजा अंग्रेजी सेना ने विजय पाई इन्हीं पत्थरों के मोर्चा मैं सूबेदार काले खान शहीद हो गए।
इतिहास में काले खान का वृतांत ६ जून १८५७ के बाद नहीं मिलता है बे कहां गए उनका क्या हुआ शहीद हो गए अथवा कहीं गुमनामी जिंदगी जिया इतिहासकारों ने जानने की कोशिश नहीं की। —————————२५ जुलाई २०१९ |

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आज महाराज मर्दन सिंह जूदेव 140 बी पुण्यतिथि है। सादर नमन पुष्पांजलि अर्पित करता हूं। श्री मर्दन सिंह का जन्म सन 1802 के शरद पूर्णिमा के दिन चंदेरी के किले में हुआ था। 18 11 ग्वालियर के मराठा राजा दौलतराव सिंधिया ने चंदेरी पर आक्रमण करके जीत लिया। दौलतराव सिंधिया की सेना बबीना के पास कंधारी  कला बेतवा घाट उतर कर  सर्वप्रथम गेवरा की गढी को   अपने अधिकार मैं करती हुई तत्पश्चात ननौरा और जाखलौन को विजित किया और चंदेरी पर आक्रमण कर दिया 3 महीने युद्ध के बाद चंदेरी पर अधिकार हो गया। महाराजा मोर प्रहलाद ने झांसी में मराठा राज्य मैं शरण प्राप्त की। मदन सिंह उस समय 9 वर्ष के थे धीरे धीरे युवावस्था में आते ही उन्होंने अपने पुराने स्वामी भक्त लोगों की मदद से छोटी सी सेना तैयार की और विद्रोह का बिगुल फूंक दियागेवरा और जाखलौन के जागीरदारों न भी मराठों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया तब नाना प्रकार से परास्त होकर सिंधिया ने 1828 में संधि कर ली और चंदेरी को छोड़ कर बेतवा और जामनी नदी के बीच का भाग वापस किया जिसे हम वर्तमान में आज ललितपुर जिले के नाम से जानते हैं इसमें मडावरा शामिल नहीं है क्योंकि मडावरा मदनपुर साहे गढ़ रियासत का अंग थासाहे गढ़ के राजा बखत बली ने भी 18 57 के युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था। 6 जून 18 57 को झांसी में अंग्रेजी सेना में देसी सिपाहियो ने सूबेदार काले खान के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और अंग्रेज सिपाहियों को परास्त किया तब अगले दिन बानपुर में खबर मिलते ही महाराजा मर्दन सिंह ने अंग्रेजों की ललितपुर छावनी पर आक्रमण कर दिया लेकिन अंग्रेज ललितपुर से पहले ही निकल चुके थे तब रियासत की और सभी जागीरदारों की सैनिक टुकड़ी को एकत्रित करके चंदेरी पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में ले लिया और सिंधिया के सैनिकों को मार भगाया। चंदेरी राज्य की पुनर्स्थापना हो चुकी थी जिसमें बानपुर सहित था। लेकिन चंदेरी रियासत को अंग्रेजी अधीनता से मुक्ति अधिक दिनों तक ना रह सकी और 9 माह बाद जनरल रोज के नेतृत्व में मुंबई पोर्ट पर अंग्रेजी सेना उतरी और मार्च 18 58 मैं सागर आ गई। 18 मार्च अट्ठारह सौ 58 को अमझरा और मदनपुर घाटी मैं अंग्रेजों से भीषण संघर्ष हुआ किंतु आधुनिक हथियार सुसज्जित सेना 60000 सैनिक अंग्रेजी सेना में थे और कहां 5 हजार सैनिक बुंदेली सेना में थे किंतु खून की नदियां बह गई माटी लाल हो गई अमझरा घाटी की माटी हमारे लिए तीर्थ बन गई। मदन सिंह और उनके जागीरदारों की सेनाएं वीरता से लड़ते हुए बुंदेलखंड को आजादी के इतिहास में अमर कर गई। सितंबर 18 58 मैं एक विश्वासघाती के कारण नरवर के जंगल में मर्दन सिंह को अंग्रेजी सेना ने गिरफ्तार कर लिया और सुदूर लाहौर जेल भेज दिया। 10 वर्ष लाहौर की जेल में अनेक यातनाएं सहते हुए व्यतीत की अंग्रेज वायसराय ने संधि की पेशकश की और राज्य लौटा देने का वायदा किया किंतु महाराजा मर्दन सिंह अंग्रेजों की अधीनता में राज्य करना स्वीकार नहीं किया। 10 वर्ष बाद बुंदेलखंड में विद्रोह की चिंगारी दब गई तब अंग्रेजों ने उन्हें मथुरा भेज दिया और उन्हें नजरबंद रखा गया मथुरा में ही 22 जुलाई 18 79 को बुंदेलखंड के अमर सपूत राष्ट्र की आजादी के प्रेरणा स्रोत महाराजा मर्दन सिंह का निधन हो गया। कुंवर नरेंद्र सिंह बुंदेला मधुकरवरिष्ठ साहित्यकार एवं इतिहास विशेषज्ञ। गेवरा तालबेहट ललितपुर |

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