कवि अजीत मानव

कन्नौज उत्तरप्रदेश |

|बढ़ा कदम कि मंजिलों को इंतजार है तेरा।

थका हुआ सा ए पुरुष तू किस लिए उदास है।
तू देख खुद में झांक के दबी सी एक आस है।
तू मन मे दे बिखेर हर ख्याल को तितर बितर।
इधर उधर सवालों से तू उलझनों में न उलझ।
दिलों के अंधकार चिराग एक विशाल है।
निकाल ला तू ढूंढ के वो आस ही मशाल है।
जो आस मिल गयी नसीब बेमिसाल है तेरा।
बढ़ा कदम कि मंजिलों को इंतजार है तेरा।

निराश मन से द्वंद कर तू युद्ध कर थकान से।
अपार शक्तियां मिलीं हैं सर्वशक्तिमान से।
कदम हैं साथ मे अगर तो साथ कोई दे न दे।
बिलम्ब न कर ए पुरूष तू इंतजार छोड़ दे।
पकड़ना उंगलियां या हाथ थामना भी व्यर्थ है।
कि रास्तों को नापने में खुद ही तू समर्थ है।
तू खोज ले वो रास्ते जो आज भी अंजान हैं।
तू भिन्न है यहां नहीं कोई तेरे समान है।
तू जिंदगी को जी ले जिस तरह विचार है तेरा।
बढ़ा कदम कि मंजिलों को इंतजार है तेरा।

तू है जहां भले वहां से दिख रहे न रास्ते।
तू अंत मानकर यहीं न जिंदगी गुजार दे।
प्रहार कर दीवार पर तू कंटकों को पार कर।
नजर को फेंक दूर तक तू चढ़ किसी पहाड़ पर।
धकेल पत्थरों को मन से कर ले कुश्तियां जरा।
खुले ये बंद रास्ता जरा सी युक्तियां लगा।
तू चाहता है बैठना या चाहता बढ़ें कदम।
शुरू हो जिंदगी यहां से या हो जिंदगी खतम।
प्रकाश है तू अंधकार तो शिकार है तेरा।
बढ़ा कदम कि मंजिलों को इंतजार है तेरा।

जो आज हार पे तेरी हंसते हंसते न थके।
ये वो ही लोग हैं कभी न युद्ध मे उतर सके।
कभी न छू सके जो मुश्किलों से भरे रास्ते।
वे कह रहे हैं आज वे कभी नहीं हैं हारते।
न जीतना महान है ना हारना कलंक है।
हैं जीतते वही कि जिनको हार भी पसंद है।
जो डर गया तू हार से तो तय विनाश है तेरा।
न मार्ग आखिरी न आखिरी प्रयास है तेरा।
ये व्यंग तंज भर्तस्नाएँ तो श्रृंगार हैं तेरा।
बढ़ा कदम कि मंजिलों को इंतजार है तेरा। —————- २५ जुलाई २०१९ |

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